या तो मौत या मुक्ति
ओमप्रकाश सरार्फ, बीरगंज,६ फरवरी |

सभी वर्गो की इसमे आज भी सहानु भूति है और जन जन में आन्दोलन है हर मन में क्रान्ति है। आन्दोलन के ठेकदार लोग इस जन सैलाब के दम्भ में अपने आप को मधेस का एकलौता मसीहा साबित करने की राह में जनता की भावना का कदर नहीं किया और एक दूसरे को अन्डर स्टीमिट करते हुए निषेध की राजनीति की और जन भावना के मुताबिक ना आन्दोलन का पुनरावलोकन किया नाही महा गठबंधन बनाया और नही कोर्इ कार्यगत एकत ही की जिसके कडवा सत्य यह है कि जिस नेतृत्व का गुण गान होना चाहिए वहाँ निराशा और आक्रोश है। इस आन्दोलन में आन्दोलनरत दल में ना कोर्इ पिछ्ले दुर्घटना क्रम से सीख का प्रतीत हुआ ना ही वो उदार का भावना ना ही बडा सीना दिखा, दिखा तो सिर्फ दम्भ ,अहंकार और निषेध की राजनीति ,यहि सब कारणें से भी आन्दोलन अनाथ हो गया है। जो आन्दोलन में साथ और समर्थन मिला है उसके सब से बडा कारक है आन्दोलन का एजेन्डा और सरकार की संस्थागत बेइमानी ना कि नेतागन के कुशल नेतृत्व ,नेतागन ये समझने मे चूक रहे हैं कि जनता जनार्दन होती है और जनता सब जानती है। नेता का काम जनता के भावनाओं की कदर करना है ना कि सिर्फ काठमाडौ मे बैठकर बार्गेनिङ करना ।
इतने बडे और लम्बे आन्दोलन मेंं मधेसी जनता ने बारम्बार साबित किया है कि हम राजा जनक और भगवान बुद्ध के सन्तति हैं इस लिए सरकार के तमाम उक्साहट के बावजुद भी आपसी सदभाव और मेलमिलाप के भावना को जिन्दा रखा और सहिष्णुता को कायम रखा।हर एक सच्चा मधेसी आज भी दिल में जय मधेस के क्रान्ति के लिए लड रहा है हर गाँव के बस्ती बस्ती में पाँच साल के बच्चे भी जय मधेस का जय कारा माना रहा है। जब भी हम कोर्इ गाँव में जा रहे हैं हर माँ पूछ रही है कि क्या हमारी माँग पूरी होगी,जब शैक्षिक संस्था सन्चालन में आइ तो बच्चे बच्चे पूछ रहे थे कि क्या हमारी माँग पुराी हो गयी ? अर्थात आज भी हर मधेसी के दिल मे मुक्ति खातिर क्रान्ति है बस तलाश है तो कुशल ड्राइवर की, तलाश है सच्चे मधेस के पहरेदार की ,क्यों सभी की एक ही आवाज है कि शहिद का सपना सकार करने लिए ,गलामी के जंजीर तोडने के लिए मसाले जलती रहनी चाहिए क्योकि मौत मन्जूर है परन्तु गुलामी नहीं ,इसके लिए आन्दोलन का नवीकरण जरुरी है,नेतृत्व परिवर्तन जरुरी है ।


