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मधेश की राजनीति चौराहे पर खड़ी है : भरत विमल यादव

 


भरत विमल यादव की राजनीतिक यात्रा : विद्यार्थी जीवन से ही शुरु हुई है । सन् १९९० अर्थात् वि.सं. २०४७ साल चैत २७ गते नेपाल सद्भावना पार्टी में ज्वॉक्ष्न करने के बाद वे सक्रिय रूप से राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखे । प्रथम आम चुनाव में महोत्तरी के क्षेत्र नं. ४ से उम्मेदवारी भी दी थी । लेकिन जीत हासिल नहीं कर सके । वि.सं. २०४७ से लेकर वि.सं. २०६४ भाद्र महीने तक नेपाल सद्भावना पार्टी से जुडेÞ रहे । उनकी राजनीतिक यात्रा व देश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति के बारे में बातचीत की । पेश है हिमालिनी के साथ बातचीत का मुख्य अंश —
 नेपाल सद्भावना पार्टी परित्याग करने की वजह
२०६२,०६३ के जनआंदोलन में मधेश का नेतृत्व सिर्फ नेपाल सद्भावना पार्टी (आ.) ने ही की थी । उस समय मैं उपाध्यक्ष था । इस आंदोलन के दौरान नेपाल सद्भावना पार्टी दो धड़ों में विभक्त हो गयी । एक धड़ा तत्कालीन राजा ज्ञानेन्द्र के पक्ष चली गई, जिसका नेतृत् बद्रीप्रसाद मंडल जी कर रहे थे । अन्य सहयोगी थे लक्ष्मणलाल कर्ण एवं देवेन्द्र मिश्र । और हम लोकतंत्र के पक्ष में थे । हृदयेश त्रिपाठी, राजेन्द्र महतो, अनिल झा, खुशीलाल मंडल, सरिता गिरी आदि मेरे साथ थे । तत्कालीन सरकार को समर्थन करने के लिए मुझ पर चारों तरफ से दवब आया । यहां तक कि देश के बाहर से भी दवाब आया । मैंने यह कहकर इन्कार किया कि मैं जिस कौम से प्रतिनिधत्व कर रहा हंू, उस कौम में राजनीतिक चेतना बहुत कम है । अगर हम सरकार में जाते हैं, तो हमारी पार्टी बर्बाद हो जाएगी । इस तरह की गलती मुझसे नहीं होगी । मैं मधेशियों के साथ गद्दारी नहीं कर सकता । लेकिन यहां की शक्तियां मेरी बात को एगो के रूप में ले ली और मेरे विरुद्ध षड़यन्त्र करने लगे । यहां तक कि नेपाल सद्भावना पार्टी (बद्रीप्रसाद मंडल) और नेपाल सद्भावना पार्टी (आ.) के बीच एकीकरण की बात करने लगे । कार्य समिति की बैठक में भी यह प्रस्ताव रखा गया । जबकि मैं इस प्रस्ताव के बिपक्ष में था । दूसरी तरफ मेरे बिरुद्ध मनी, मसल और पॉवर सभी शक्तियां लगाकर कार्यसमिति की बैठक में मुझे अल्पमत कर दिया । अंत में मैंने अपनी मर्यादा को ख्याल रखते हुए पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया ।
 मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल में ज्वॉइन् करने की वजह
उपेन्द्र यादव ने अपनी पार्टी में शामिल कराने हेतु डॉ. रामस्वार्थ राय, योगेन्द्र राय यादव, अभिषेक प्रताप शाह और पत्रकार सुरेश यादव को मेरे पास भेजा । बातचीत के दौरान मैंने कहा कि मैं सम्मान की राजनीति करता आया हंू । पैसा कमाना मेरा उद्देश्य नहीं है । गजेन्द्र बाबू ने भी नेपाल ऑयल निगम, नेपाल खाद्य संस्थान जैसे निकायों में जाने के लिए कहा था, लेकिन उन्हें भी मैंने कहा था कि पैसा ही कमाना रहता तो डि. एफ. ओ की नौकरी क्यों छोड़ता ? अगर उपेन्द्र जी मुझे सम्मान देना चाहते हैं, तो मुझे उनके साथ काम करने में कोई दिक्कत नहीं होगी । अंतिम समय में उपेन्द्र जी ने कहा कि आज आपको राजनीति में सम्मान नहीं करुंगा तो कल मुझे लोग क्यों सम्मान करेगा । मैं आपको सम्मान में कोइ चोट नहीं पहुंचाउंगा । मैं आपको बरिष्ठ नेता के रूप में सम्मान करुंगा । इस प्रकार मैंने दूसरी संविधान सभा चुनाव के २,३ महीने पूर्व फोरम नेपाल ज्वॉइन् किया ।
संविधान सभा चुनाव के दौरान मेरे ही नेतृत्व में एक निर्वाचन परिचालन समिति बनाई गयी । मैंने ईमानदारी से कार्य किया । समानुपातिक की तरफ से मेरा नाम १ नं. में भेजा गया । लेकिन अंतिम सूची भेजने के दौरान मेरा नाम हटा दिया । मेरी इज्जत और प्रतिष्ठा को चकनाचुर कर देने की बात हुई । मेरा राजनीतिक योगदान को तहस–नहस कर दिया । गैरराजनीतिक और नैतिक पतन चरित्र वालों के साथ राजनीति नहीं करना है, यह कहकर मैंने सगरमाथा टेलीविजन के जरिये फोरम नेपाल परित्याग करने की घोषणा की । तब से लेकर आज तक मैं सोया नहीं हंू, मधेशवाद के लिए जागा हुआ हूं । समय की सापेक्षिक आवश्यकता हुई, तो मैं सांगठनिक रूप से सामने आ सकता हंू ।
 मधेश की राजनीति का अनुशीलन
मधेश की राजनीति करने वाले लोग दो स्कूलिंग्स से आए हैं । एक है मधेशवाद और दूसरा है अवसरवाद । इसलिए मधेश में हमेशा द्वन्द्व रहता है । फलतः मधेश की राजनीति चौराहे पर खड़ी है । इसी संदर्भ में मैं कहना चाहंूगा कि एक धार के लोग ‘देश में मधेश होना चाहिए’ मानने वाले हैं, जिसका प्रतिनिधित्व मैं स्वयं कर रहा हंू । दूसरी धार के ऐसे कुछ लोग हैं जिनका ध्येय है कि ‘मधेश में देश होना चाहिए’ । देश में हथियार उठाए बिना मधेश को अधिकार प्रप्त हो ही नहीं सकता, जिसका प्रतिनिधित्व जयकृष्ण गोइत व ज्वालासिंह जी कर रहे हैं । इसी प्रकार तीसरी धार के लोगों का कहना है कि हम शान्तिपूर्ण तरिके से ‘मधेश में देश बनाएंगे, जिसका नेतृत्व सी.के.राउत जी कर रहे हैं ।
‘देश में मधेश’ अपनाने बाले लोगों में एक ऐसे शख्स निकले जो एक कदम आगे बढ़ गए । वे कहा करते थे कि संविधान संशोधन से कुछ नहीं हो सकता, पुनर्लेखन ही होना चाहिए । उनसे मेरा यही सवाल है कि संविधान का पुनर्लेखन क्यों ? गणतंत्र को छोड़कर राजतंत्र लाएंगे, संघीयता को छोड़कर केन्द्रीकृत करेंगे । साफ है कि ऐसी बातें करने वाले शख्स दरबारियों के द्वारा प्रभावित होता आ रहा है । तत्पश्चात् उन्होंने यह भी कहा कि हमें जो उपलब्धियां मिली हैं, उनकी रक्षा के लिए हमें चुनाव में शामिल होना चाहिए । जबकि उन्होंने कहा था कि संविधान संशोधन और हम मधेश में चुनाव होने ही नहीं देंगे । रातों रात क्या ऐसी घटना घटी जो मधेश के अधिकारों की रक्षा करने के लिए चुनाव में जाना पड़ा । अंतरिम संविधान में मधेश की अस्तित्व और अस्मिता को स्वीकारा था । नागरिकता के सवाल पर भी जो प्रावधान रखा गया था, उस प्रावधान को भी मौजूदा संविधान से हटा दिया । क्या इसी उपलब्धि को रक्षा के लिए उपेन्द्र यादव चुनाव में शामिल हुआ । एक कहावत है — दाल में कुछ काला है । क्या इस ओर इसका संकेत नहीं है ।
इसी प्रकार मधेश के चौथी धार के लोग कहते हैं कि तब तक चुनाव में शामिल नहीं होंगे, जब तक संविधान में संशोधन नहीं हो जाता । ऐसी राजनीति करने वाली पार्टी राजपा नेपाल अप्रत्यक्ष रूप से दो भागों में विखर गयी । एक पक्ष चुनाव को बहिष्कार करते हैं, तो दूसरे पक्ष चुनाव को समर्थन करते हैं । यहां तक की चुनाव में उम्मेदवारी भी दी । समग्रतः कहा जा सकता है कि मधेश के आम जनता ने जो कल्पना की है, उस कल्पना को साकार करने के लिए राजपा नेपाल के नेतागण खरे नहीं बन पा रहे हैं । वे अपनी लोकप्रियता व विश्वसनीयता को गुमाते जा रहे हैं
मधेश की मांगें पूरी होंगी या नहीं
मांगें पूरी करने के लिए ही हम आंदोलनरत हैं । और मांगें तभी पूरी होंगी जब तक हम ईमानदारी के साथ आगे नहीं बढेंगे । लेकिन अभी की स्थिति ‘मुख में राम बगल में छुरी’ जैसी हो गयी है । मधेश की पहली शक्ति कहलाने वाली पार्टी राजपा नेपाल के नेताओं की अभिव्यक्ति से पता चलता है कि संविधान संशोधन हो या न हो, लेकिन तीसरे चरण के चुनाव में भाग लेंगे । इसी प्रसंग में मैं कहना चाहंूगा कि शत्रु से उतना डर नहीं होता है जितना कि गद्दार से होता है । मधेश में गद्दारी करने वाले लैंडुप दोर्जे, मिर्जा, जयचंद जैसे लोगों की कमी नहीं है । और जब तक ऐसे लोगों के हाथों में मधेश की राजनीति रहेगी, मधेश की मांगों को संबोधन करने की सोच रखते हैं, तो अच्छी बात है, लेकिन विश्वसनीय होना अपने आप को धोखा देने जैसा है । इसलिए सर्वप्रथम मधेशियों को ऐसे गद्दारों से सावधान रहना होगा । मधेश स्कूलिंग्स से आए नेताओं को आगे बढ़ाने की सोच होनी चाहिए । इसलिए कि अवसरवाद की स्कूलिंग्स से आए नेता आपको धोखा दे सकता है, जिस तरह मधेश के मसीहा कहलाने वाले उपेनद्र यादव ने धोखा दिया है ।
क्या है समाधान ही राह
राज्य की मानसिकता है कि मधेश की वफादारी नेपाल की ओर न होकर भारत प्रति ज्यादा है । अगर मधेश को स्वायत्त कर देंगे, तो मधेशी मधेश को नेपाल से अलग कर भारत में मिला देंगे । दूसरी तरफ मधेश की धारणा है कि राज्य मधेशियों को नेपाली नहीं मानते हैं । मुख्य द्वन्द्व यही रहा है । ’मधेश नेपाल का ही एक हिस्सा है, मधेशी भी नेपाली ही हैं‘,’ इस सोच को यहां के शासक वर्ग अंगीकार करते हैं, तो मधेशियों की मांगें पूरी करने में कोई दिक्कत नहीं होगी । उन्हें यह भी समझना चाहिए कि मधेश की समस्या सिर्फ मधेशियों की ही समस्या नहीं है, बल्कि पूरे देश की समस्या है । इस सोच के साथ आगे बढे, तो समस्या अविलंब समाधान हो सकती है ।

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