मधेश प्रदेश में आज मनाया जा रहा है जुड़शीतल लोक पर्व
काठमांडू, २ वैशाख

कहते हैं भगवान विष्णु को यदि प्रसन्न करना हो तो यह मास अर्थात् वैशाख का मास है । यह प्रिय मास है भगवान विष्णु के लिए । साथ ही सभी मास का अपना अपना महत्व रहा है लेकिन वैशाख को सबसे उत्तम मास माना गया है । अब बात करें मधेश की तो आज मिथिला में नववर्ष के रुप में शीतलता का लोक पर्व जुड़ शीतल मनाया जा रहा है । विभिन्न क्षेत्र में इसे अलग अलग नाम के साथ मनाया जाता है । बहुत से जगहों पर इसे सतुआइन कहा जाता है तो बहुत से जगहों पर वैशाखी के नाम से भी जाना जाता है । जुड़ शीतल का मतलब होता है शीतलता की प्राप्ति । आज के दिन घर के बड़े बुजुर्ग एक दिन पहले रखे जल से बच्चों को जुड़ाते हैं और आशीर्वाद देते हैं कि हमेशा हंसी खुशी से रहें । उसी जल से अपने अलग बगल में रह रहे हरेक चीज, गृहस्थी के सभी समान,पशु–पक्षि सभी पर में जल देते हैं । यहाँ तक कि पेड़–पौधों में भी यानी उन्हें भी जुड़ाया जाता है ताकि वो अपनी शीतलता को बरकरार रखें । हमें अपनी छांव देती रहे ।
इस पर्व में सत्तू को बहुत महत्व दिया गया है तो इसका भी एक कारण है –एक तो यह समय गर्मीं का हो जाता है जब बहुत गर्मी होती है तो घर में पके व्यंजन बहुत ही जल्दी खराब हो जाता है । ऐसे समय में सत्तू बहुत दिनों तक खराब नहीं होता है । और दूसरा कारण यह कि मिथिला में बेसन तथा सत्तू की नयी पैदावार इसी समय होती है ।
जुड़ शीतल का प्रकृति से सीधा संबंध भी दिखता है । इस लोक पर्व के अवसर पर पेड़ पौधों में जल डालने की शुरुआत की जाती है ताकि गर्मी के मौसम में भी पेड़–पौधे हरे भरे रहें और सूखे नहीं । मिथिला के लोगों का मानना है कि पेड़– पौधे भी उनके परिवार का हिस्सा हैं और वह भी हमारी रक्षा करते हैं ।
समय के साथ इस पर्व में भी बदलाव आया है । जैसे पहले आज के दिन चुल्हा नहीं जलाया जाता था । सभी बासी खाना खाते थे । बासी भोजन ही भगवान को भी चढाई जाती थी । आज के दिन बासी बड़ी, भात,सोहिजन की सब्जी, आम की चटनी तथा विभिन्न तरह के तरुआ तीमन भगवान को चढ़ाते हैं तथा स्वयं भी खाते हैं । लेकिन अब लोग बासी नही. खाना चाहते हैं तो थोड़ा सा सिर्फ चढ़ाने के लिए रात को ही बचाकर रख लेते हैं । पूजापाठ खत्म करने के बाद प्राय चूल्हा जलाते हैं ।
जुड़शीतल के अवसर पर आज मधेश प्रदेश में सार्वजनिक छुटुटी दी गई है ।

