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सारा आकाश समेटो अपनी मुठ्ठी में, जो भी हो लेकर उसको जीना सीखो : डा राणा

 

सारा आकाश

डा कृष्णजंग राणा

सारा आकाश समेटो
अपनी मुठ्ठी में जो भी हो,
लेकर उसको जीना सीखो
उन्मुक्त हँसी हँसकर जग में,
पाना सीखो, खोना सीखो ।।

शैशव की किलकल बीत गई,
जैसे झरनों की फुहारें ।
बचपन का भोलापन बीता,
कैसी चिंता कैसी हारें ।
बिन जाने खुशियाँ जग भर की,
हमने बटोर कर रख ली थी ।
तब किसने सोचा क्या होगा,
फिर क्या होगा अब मत सोचो ।।

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यौवन का जोश भरा जीवन,
जैसे बिजली की थी कड़कन ।
सारे दुनिया को जैसे कि,
झकझोर दिया हो रे जबरन ।
कैसा आगा कैसा पीछा
कैसी चिंता कैसा चिंतन ।
वो पर्वत जैसा हिम्मत अब,
तुम मत तोड़ो, तुम मत छोड़ो ।।

तेरे इस ढलते जीवन में,
शैशव की किलकन बाकी है ।
बचपन की खुशियां बाकी है,
यौवन का हिम्मत बाकी है ।
फिर ऐसे सुखमय जीवन में,
कैसी चिंता कैसी हारें ।
सारा आकाश समेटे तुम,
सारी खुशियाँ पाना सीखो ।।

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