विद्यालयों की वर्तमान स्थिति एवं समाज की भूमिका पर राष्ट्र सेविका नेपाल की शैक्षिक संगोष्ठी संपन्न ।

काठमांडू, 11 जुलाई। राष्ट्र सेविका नेपाल के आयोजन में “विद्यालयों की वर्तमान स्थिति तथा हमारी भूमिका” विषयक एक दिवसीय शैक्षिक संगोष्ठी सम्पन्न हुई। संगोष्ठी में विद्यालय शिक्षा की वर्तमान चुनौतियों, मूल्यपरक शिक्षा, सांस्कृतिक चेतना तथा राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों और समाज की भूमिका पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया।
कार्यक्रम की संयोजक एवं वरिष्ठ संस्कृतिविद् प्रो. डॉ. वीणा पौड्याल (पूर्व विभागाध्यक्ष, संस्कृति केन्द्रीय विभाग, त्रिभुवन विश्वविद्यालय) ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बताते हुए कहा कि विद्यालय केवल ज्ञान प्रदान करने का केन्द्र नहीं, बल्कि संस्कार, चरित्र और राष्ट्रीय चेतना के निर्माण का सशक्त माध्यम है। उन्होंने वर्तमान समय में विद्यालय, परिवार और समाज के बीच समन्वय को और अधिक सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम में बागमती सम्भाग संचालिका चन्द्रा खडका सहित डा. रमा भट्टराई, डा. जानुका नेपाल, शारदा पौडेल, डा. शशी थापा, डा. माला खरेल, अन्जु थापा, मञ्जु झा, डा. प्रभा चित्रकार, डा. पूजा जैसवाल, एलिना बाँस्कोटा, श्रिमती पुनम दास, सह प्रध्यापक प्रतिमा चौधरी, कल्पना गिरी, रीता तिवारी, नीता मजुमदार, विष्णु घिमिरे रिमाल तथा गीता काफ्ले सहित विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं त्रिभुवन विश्वविद्यालय से सम्बद्ध शिक्षाविदों, प्राध्यापकों और प्रधानाध्यापकों की उल्लेखनीय सहभागिता रही।
वक्ताओं ने कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों से युक्त, अनुशासित, संस्कारित एवं राष्ट्रनिष्ठ नागरिक तैयार करना भी है। उन्होंने विद्यालयों में चरित्र निर्माण, भारतीय एवं नेपाली सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण, अनुशासन, सेवा-भाव और सामाजिक उत्तरदायित्व आधारित शिक्षा को सुदृढ़ बनाने पर विशेष बल दिया।
संगोष्ठी में सहभागी शिक्षाविदों ने विद्यालय, परिवार और समाज के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित कर शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने तथा नई पीढ़ी में राष्ट्रप्रेम, सामाजिक संवेदनशीलता और सांस्कृतिक चेतना विकसित करने की आवश्यकता पर एकमत व्यक्त किया।
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी वक्ताओं, शिक्षाविदों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे वैचारिक संवादों को निरंतर जारी रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। 

