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मधेशियों के लिए वाहनों पर भंसार, अंग्रेजों के लगान से कम नहीं : संजय यादव

 

जनकपुरधाम 6 अगस्त

 

मधेश/तराई के भू-भाग को पहाड़ी शासकों ने हमेशा एक दुधारू गाय समझा। शासकों द्वारा नेपाल के तराई भाग को भ्रष्टाचार का अड्डा बनाया गया चाहे वो भंसार हो, नागरिकता कार्यालय हो, मालपोत,अड्डा अदालत हो या पुलिस प्रशासन कार्यालय हो। पुरानी इतिहास भी देखा जाए तो अन्न का भण्डार मधेश की भूमि को हमेशा दोहन किया गया है । इस भूमि को शासकों द्वारा अपने आय आर्जन का स्रोत और जिन्दगी जीने का जरिया बनाया गया। विकास के नाम पे सदियों से मधेशियों को ठगा गया और बेवकूफ बनाया गया जबकि मधेश के  अर्थ तन्त्र के मेरुदंड कृषि है जानते हुए भी कृषि के ऊपर न्यून लगानी किया गया उसमें भी अधिकतर लगानी को पहाड़ी जिलों मे भेजा गया उस बजट को पहाड़ी क्षेत्रों में भरपूर रूप से दुरुपयोग किया गया।

इस देश में जितने भी सीडीओ, एसपी, बड़े रैंक के ऑफिसर हैं जिसको भी अधिक पैसे कमाना है ओ तराई मधेश को ही चुनते हैं और अपना ट्रांसफर वहीं कराना चाहते हैं वह यह सोच कर की देश की आय का सब से बड़ा हिस्सा मधेश है जहां से होकर पूरे देश के जरूरत भर का खाद्यान्न नमक से लेकर तेल तक आता है और वो यहां आकर गैर तरीके से मधेश से पैसा निचोड़ सकें। देखा जाए तो देश के पूरी आय में मधेश/तराई भूभाग का पचास फ़ीसदी से भी अधिक लगानी है। इस राज्य ने तराई क्षेत्र के भंसार से ख़ूब कमाया लेकिन इस भूमिपुत्र मधेशी को बिहारी और यू पी वाले कह के अवहेलना करते रहे। शुरु से ही शासकों ने ज़मीन को तो अपना माना पर मधेशियों को कभी नही अपना भाई बना पाया और नहीं अपना पाया।

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पुराने इतिहास को खंगाला जाए तो उस वक्त के पहाड़ी शासकों को अंगरेजो ने युद्ध में सहयोग करने के वापत मधेश तराई भू भाग को तोफे के तौरपर दिया था ताकि समतल भू भाग से तत्कालीन पहाड़ी शासकों का अन्न और खाद्यान्न मिल सकें। तभी से अंग्रेजो ने इस मधेश के पवित्र भूमि को लावारिश बना के छोड़ गया। इंडिया आज़ाद हुआ लेकिन यह पवित्र मधेश की भूमि लावारिश ही रह गया। हमेशा मधेश को ऐसी समस्यायों से जूझना पडा जहाँ पहाड़ियो ने मधेशियों को इंडियन समझा और इंडिया ने मधेशियों को नेपाली। जिसके फल स्वरुप इस भूमि पर न राजनीतिक स्थिरता रही नहीं ठोस और स्थायी रूप से विकास हो पाया। आज परिस्थिति यह है कि मधेशी अपने अधिकर के लिए आंदोलन करे तो सीने में गोली खानी पडती है। एक भंसार और नो मैन्स लैंड ही ऐसी जगह थी जहां मधेशी अपने आपको सुरक्षित महफूज़ करता था। अब वहाँ भी रहने की स्थिति नही रही। अब वहाँ खड़ा होने के लिए भी आईडी कार्ड की जरूरत पड रही है परिस्थिति यह है कि आज के दिन में मधेशी असुरक्षित और भय में जी रहा हैं। पौराणिक काल से ही नेपाल और भारत का रोटी और बेटी का सम्बन्ध रहा पर अब इस संबंध को किसी की नज़र लग सी गई है। ऐसा महसूस होने लगा है कि राम और सीता के प्रेम में दूरियां बढने लगी है।

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मधेशी अपने अधिकारों को लेकर नेपाल सरकार से पीड़ित था ही अब भारत द्वारा लगाया गया भंसार से भी रहेगा। सदियों से हमारा सम्बन्ध ऐसा रहा है की हमारा बॉर्डर से प्रति दिन का आना जाना रहा है साथ ही सबसे ज्यादा क्रॉस बोर्डर शादियाँ मधेश मे ही होती है जिसकी वजह से ज्यादातर मधेशी का ही बॉर्डर से आना जाना होता है। ऐसे में खुद के राज्य से सताए गए मधेशी रोज रोज का भंसार के लिए पैसे कहाँ से लायेंगे। यह पूरी तरह इण्डिया सरकार द्वारा मधेशियो के उपर किया गया अन्याय से कम नहीं है। एक तरह से यह ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भारत सरकार द्वारा मधेशियों से लगान लेने की कोशिश की जा रही है। हालत दिन पर दिन ऐसी बनती जा रही है कि हम मधेशी जाय तो जाए कहा और कहे तो कहे किसको। न अब रोटी अपनी रही न ही बेटी।।

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