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राजावादी दलों में एकता का अभाव, लिङ्देन और थापा की आपसी खींचतान

 

काठमांडू, 24 मार्च । नेपाल के पूर्वराजा ज्ञानेन्द्र शाह हाल ही में काफी मुखर नजर आ रहे हैं। पिछले प्रजातंत्र दिवस पर उन्होंने “अब समय आ गया है” कहते हुए देश को बचाने के लिए जनता से समर्थन की अपील की थी। इसके बाद वे लगातार मंदिरों और मठों का दौरा कर रहे हैं।

पूर्वराजा के इस आह्वान से उत्साहित राजतंत्र समर्थक दल और संगठन अब सड़कों पर उतर आए हैं। उनका कहना है कि अब गणतंत्र काफी हो गया, देश को फिर से राजसंस्था की जरूरत है। बीते फागुन २५ (मार्च) को इन राजावादी संगठनों ने गणतंत्र समर्थक दलों को स्पष्ट रूप से चुनौती भी दे दी। पोखरा में एक महीने बिताने के बाद जब पूर्वराजा काठमांडू लौटे, तो हजारों की भीड़ ने उनका अभिनंदन किया और “राजा को गद्दी पर वापस लाएंगे” जैसे नारे गूंजने लगे।

राजावादी दलों में एकता का अभाव

हालांकि, राजशाही की वापसी की मांग करने वाले ये संगठन खुद ही आपस में बंटे हुए हैं। मुख्य रूप से तीन गुट— राजेन्द्र लिङ्देन की राप्रपा, कमल थापा की राप्रपा नेपाल और दुर्गा प्रसाईं के नेतृत्व वाला राष्ट्र, राष्ट्रीयता, धर्म, संस्कृति और नागरिक बचाओ महाअभियान नेपाल— इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं।

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हालांकि, इन सभी का लक्ष्य एक ही है—राजसंस्था की पुनः स्थापना, लेकिन वे आपस में एकजुट नहीं हो पाए हैं। फागुन २५ के कार्यक्रम में पूर्वराजा के अभिनंदन में भागीदारी को लेकर दुर्गा प्रसाईं ने लिङ्देन और थापा पर “सिर्फ श्रेय लेने के लिए कार्यक्रम में शामिल होने” का आरोप लगाया।

लिङ्देन और थापा ने इस आरोप का सार्वजनिक रूप से खंडन तो नहीं किया, लेकिन अपनी पार्टी की बैठक में कहा कि ऐसे आरोप-प्रत्यारोप से किसी का फायदा नहीं होगा।

दुर्गा प्रसाईं का अलग तेवर

दुर्गा प्रसाईं लंबे समय से खुलकर राजावादी खेमे में नहीं थे। वे पहले माओवादी और फिर एमाले (नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी) में सक्रिय थे, लेकिन हाल के वर्षों में उन्होंने खुद को एक प्रमुख राजावादी नेता के रूप में स्थापित किया है। अब वे लिङ्देन और थापा को अधिक महत्व नहीं देते। “सिर्फ श्रेय लेने के लिए आए थे” वाला उनका बयान इस बात को साफ दर्शाता है।

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लिङ्देन और थापा की आपसी खींचतान

राजावादी आंदोलन में लंबे समय से सक्रिय रहे लिङ्देन और थापा भी एकजुट नहीं हो पाए हैं। हालांकि, दोनों की मांग एक ही है—राजशाही की वापसी और नेपाल को सनातन हिंदू राष्ट्र बनाना, लेकिन उनके बीच समन्वय की कमी बनी हुई है।

बीते पृथ्वीजयंती से पहले लिङ्देन और थापा के बीच दो दौर की बातचीत हुई थी। दोनों ने “मिलकर आगे बढ़ना चाहिए” जैसी सहमति भी बनाई थी, लेकिन इसे अमल में नहीं लाया गया। फिलहाल, दोनों अपने-अपने रास्ते पर चल रहे हैं।

कमल थापा कुछ ज्यादा लचीले नजर आ रहे हैं और वे पार्टी एकता को लेकर सकारात्मक संकेत भी दे रहे हैं, लेकिन लिङ्देन की ओर से ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई है।

पार्टी एकता की असफलता

राप्रपा नेपाल के महासचिव राजाराम बर्तौला का कहना है कि पार्टी एकता की संभावना खत्म नहीं हुई है। वे कहते हैं, “एकता होनी ही चाहिए, क्योंकि एक हाथ से ताली नहीं बजती।”

पूर्वराजा की नई रणनीति और नई चुनौती

पूर्वराजा ज्ञानेन्द्र शाह की सक्रियता के बीच नवराज सुवेदी की अध्यक्षता में ‘राजसंस्था पुनर्स्थापना संयुक्त जनआंदोलन समिति’ का गठन किया गया है। कहा जा रहा है कि यह संगठन खुद पूर्वराजा की पहल पर बनाया गया है।

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लेकिन लिङ्देन और थापा को यह महसूस हो रहा है कि इस नए संगठन के जरिए पूर्वराजा ने उन्हें ही दरकिनार कर दिया है। इसलिए वे इस समिति के नेतृत्व को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

अब आगे क्या?

राजावादी आंदोलन भले ही जोर पकड़ रहा हो, लेकिन इसमें नेतृत्व की स्पष्टता और एकता की भारी कमी है। ‘राजा को वापस लाने’ की मांग करने वाले दलों और संगठनों को खुद पूर्वराजा से ही दरकिनार किए जाने का डर सता रहा है।

लिङ्देन और थापा “देखो और इंतजार करो” की स्थिति में चले गए हैं, जबकि सुवेदी का नया संगठन आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में राजावादी खेमे की आंतरिक खींचतान गणतंत्र समर्थकों के लिए फिलहाल राहत की बात हो सकती है।

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