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श्वेता दीप्ति की कहानी ‘निदान’ नारी-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में : डा.संध्या सिंह

 

भूमिका

समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य में नारी-विमर्श केवल स्त्री की पीड़ा का आख्यान नहीं है, बल्कि उसकी अस्मिता, अधिकार-बोध, स्वायत्तता और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के प्रतिरोध का वैचारिक विमर्श है। प्रस्तुत कहानी ‘निदान’ इसी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कहानी एक ऐसी विवाहित स्त्री स्नेहा की त्रासदी को प्रस्तुत करती है, जिसे पति द्वारा केवल इसलिए अस्वीकार कर दिया जाता है कि वह पुत्र को जन्म नहीं दे सकी। अंततः सामाजिक उपेक्षा, मानसिक प्रताड़ना और भावनात्मक अकेलेपन से टूटकर वह आत्महत्या कर लेती है। कहानी का शीर्षक ‘निदान’ व्यंग्यात्मक है, क्योंकि जिस आत्महत्या को समाज समस्या का समाधान समझ सकता है, वह वास्तव में किसी समस्या का निदान नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था की असफलता का प्रमाण है।

पितृसत्तात्मक व्यवस्था का उद्घाटन

नारी-विमर्श का सबसे प्रमुख पक्ष पितृसत्ता की आलोचना है। इस कहानी में राजन उसी पितृसत्तात्मक मानसिकता का प्रतिनिधि है, जिसके लिए पत्नी का मूल्य उसकी संतान, विशेषकर पुत्र-जन्म देने की क्षमता से निर्धारित होता है। वह अपनी पत्नी को दोषी ठहराते हुए दूसरी स्त्री के साथ रहने लगता है और इसे “वंश बढ़ाने” की आवश्यकता का नाम देता है।

वास्तविकता यह है कि पुत्र या पुत्री का निर्धारण स्त्री नहीं, बल्कि पुरुष के गुणसूत्रों द्वारा होता है। फिर भी सामाजिक अज्ञान और पुरुष-प्रधान मानसिकता का बोझ स्त्री पर ही डाल दिया जाता है। कहानी इस वैज्ञानिक सत्य और सामाजिक विडम्बना के बीच के विरोधाभास को उजागर करती है।

स्त्री का वस्तुकरण और उपयोगितावादी दृष्टि

स्नेहा का चरित्र उस स्त्री का प्रतिनिधित्व करता है जिसे पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि पुरुष की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली वस्तु के रूप में देखा जाता है। जब तक वह पति की अपेक्षाओं के अनुरूप है, तब तक वह प्रिय है; किन्तु जैसे ही वह पुत्र को जन्म नहीं दे पाती, उसका समर्पण, प्रेम और बीस वर्षों का वैवाहिक जीवन अर्थहीन हो जाता है।

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इस प्रकार कहानी यह प्रश्न उठाती है कि क्या विवाह केवल वंश-वृद्धि का माध्यम है? क्या पत्नी का अस्तित्व केवल मातृत्व और वह भी पुत्र-जन्म तक सीमित है?

स्त्री का मौन और उसकी सामाजिक निर्मिति

स्नेहा प्रतिरोध नहीं करती। वह चुपचाप सब कुछ सहती रहती है। यह मौन उसकी व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि उस सामाजिक संस्कार का परिणाम है जिसमें स्त्री को बचपन से ही सहनशीलता, त्याग और समर्पण का पाठ पढ़ाया जाता है।

उसका यह कथन—

“हमारा स्कूल कॉलेज सब यह घर ही है।”

उसकी सीमित दुनिया का प्रतीक है। शिक्षा से वंचित रह जाना उसके आत्मविश्वास, आर्थिक स्वावलम्बन और वैचारिक स्वतंत्रता को भी सीमित कर देता है। यदि उसके पास शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता होती, तो सम्भवतः उसके जीवन के विकल्प भिन्न होते।

शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रश्न

कहानी अप्रत्यक्ष रूप से यह स्थापित करती है कि स्त्री की शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व की सुरक्षा का माध्यम भी है। रूपा बार-बार स्नेहा को पढ़ाई पूरी करने की सलाह देती है, किन्तु वह परिवार को ही अपना संसार मान लेती है।

नारी-विमर्श के अनुसार आर्थिक निर्भरता स्त्री-शोषण का एक बड़ा कारण है। स्नेहा की त्रासदी यह भी है कि उसके पास अपने लिए स्वतंत्र जीवन चुनने की सामाजिक और आर्थिक शक्ति नहीं है।

स्त्री बनाम स्त्री नहीं, बल्कि व्यवस्था का प्रश्न

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कहानी में दूसरी स्त्री (विधवा) का उल्लेख आता है, किन्तु लेखिका उसे खलनायिका नहीं बनाती। आलोचना का केन्द्र राजन की मानसिकता है। यह नारी-विमर्श की परिपक्व दृष्टि है, क्योंकि वास्तविक समस्या स्त्री नहीं, बल्कि वह सामाजिक संरचना है जो पुरुष को अनेक नैतिक छूट प्रदान करती है और स्त्री को दोषी ठहराती है।

आत्महत्या : प्रतिरोध नहीं, व्यवस्था की विफलता

कहानी का सबसे मार्मिक पक्ष स्नेहा की आत्महत्या है। कथावाचिका स्वयं प्रश्न उठाती है—

“आत्महत्या या हत्या?”

यही प्रश्न कहानी की वैचारिक शक्ति है। यह मृत्यु व्यक्तिगत निर्णय कम और सामाजिक हत्या अधिक प्रतीत होती है। पति की उपेक्षा, मानसिक हिंसा, सामाजिक अपमान और भविष्यहीनता मिलकर उसे उस स्थिति तक पहुँचा देते हैं जहाँ जीवन असहनीय हो जाता है।

नारी-विमर्श आत्महत्या को समाधान नहीं मानता। यह उसे उस सामाजिक संरचना की विफलता मानता है जिसने स्त्री को जीने के विकल्प नहीं दिए।

रूपा : संवेदनशील लेकिन सीमित प्रतिरोध

रूपा शिक्षित है, महानगर में रहती है और प्रश्न उठाती है। उसके भीतर नारीवादी चेतना दिखाई देती है। वह स्वयं स्वीकार करती है—

“मुझे उन्हें कुरेदना चाहिए था, शायद मैं उन्हें कुछ समझा पाती।”

यह आत्मस्वीकृति केवल व्यक्तिगत अपराधबोध नहीं, बल्कि उस शिक्षित समाज की संवेदनहीनता की भी आलोचना है, जो पीड़ा को पहचानता तो है, पर समय रहते हस्तक्षेप नहीं करता।

शीर्षक ‘निदान’ की सार्थकता

कहानी का शीर्षक अत्यन्त अर्थगर्भित है। सामान्यतः ‘निदान’ का अर्थ समाधान होता है, किन्तु यहाँ लेखिका स्पष्ट करती है कि आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है।

अन्तिम पंक्ति—

“किन्तु उनकी समस्या का यह निदान तो हरगिज नहीं था न?”

पूरी कहानी का वैचारिक निष्कर्ष बन जाती है। यह पाठक को झकझोरते हुए यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि वास्तविक निदान स्त्री की मृत्यु नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता में परिवर्तन है।

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शिल्पगत विशेषताएँ

कहानी प्रथम पुरुष (“मैं”) शैली में लिखी गई है, जिससे आत्मीयता और विश्वसनीयता बढ़ती है। वर्तमान और स्मृति (फ्लैशबैक) के बीच सहज आवागमन कथा को मनोवैज्ञानिक गहराई प्रदान करता है। घरेलू जीवन के सूक्ष्म विवरण, ग्रामीण परिवेश, भोजपुरी संवाद और आत्मसंवाद कहानी को यथार्थपरक बनाते हैं। प्रश्नवाचक शैली—”क्यों?”, “आत्महत्या या हत्या?”—कहानी को वैचारिक तीक्ष्णता देती है और पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।

निष्कर्ष

नारी-विमर्श की दृष्टि से ‘निदान’ एक प्रभावशाली और विचारोत्तेजक कहानी है। यह केवल एक स्त्री की आत्महत्या का वृत्तांत नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था, पुत्र-प्रधान मानसिकता, स्त्री की आर्थिक निर्भरता, शिक्षा से वंचित होने की त्रासदी और वैवाहिक असमानता का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है। कहानी यह स्थापित करती है कि स्त्री की गरिमा उसकी प्रजनन-क्षमता या पुत्र-जन्म से नहीं, बल्कि उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व, मानवीय अधिकारों और सम्मानजनक अस्तित्व से निर्धारित होती है। स्नेहा की मृत्यु एक व्यक्ति की हार नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था की नैतिक पराजय है जो स्त्री के त्याग को तो स्वीकार करती है, पर उसके अधिकारों को नहीं।

नारी-विमर्श की कसौटी पर यह कहानी स्त्री-अस्मिता, लैंगिक असमानता, मानसिक हिंसा और सामाजिक न्याय जैसे प्रश्नों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उठाती है तथा पाठक को यह सोचने के लिए विवश करती है कि वास्तविक “निदान” स्त्री के आत्मबल, शिक्षा, आर्थिक स्वावलम्बन, कानूनी अधिकारों और समाज की मानवीय संवेदना के विस्तार में निहित है।

डा संध्या सिंह

पटना

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