राम का इतिहास उस भारतवर्ष से है जो एक बृहत भूखण्ड था : डा.श्वेता दीप्ति
पहले इसे क्लिक करें
भानु जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री ओली का यह कहना कि भारत स्थित अयोध्या नकली है और राम वहाँ के थे ही नहीं वो नेपाल के थे और उनकी अयोध्या नेपाल में है, ने धार्मिक और साँस्कृतिक हलकों में एक हलचल पैदा कर दी है । इतना ही नहीं कई बुद्धिजीवियों ने इसे सिद्ध करने की कोशिश भी शुरु कर दी है । इन सबके लिए आर्यावर्त जम्बूद्वीप भारतवर्ष जैसे शब्दों का मर्म समझना आवश्यक है । आज जिस भूखण्ड को हम अपना कहते हैं उसके इतिहास को समझना आवश्यक है । क्या था जम्बूदीप आर्यावर्त या भारतवर्ष ?
जम्बू द्वीप का विस्तार
* जम्बू दीप : सम्पूर्ण एशिया
* भारतवर्ष : पारस (ईरान), अफगानिस्तान, पाकिस्तान, हिन्दुस्थान, नेपाल, तिब्बत, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालद्वीप, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, वियतनाम, लाओस तक भारतवर्ष।
यह वो भूखण्ड था जो भारत वर्ष कहलाता था । जिसकी चर्चा वेदों पुराणों मे मिलती है । आज ये सभी स्वतंत्र राष्ट्र हैं जिनकी अपनी अपनी पहचान है ।
अगर पुराणों पर नजर डालें तो साक्ष्यों के साथ इस बात की पुष्टि होती है कि कैसे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। वायु पुराण का ये श्लोक इस बात की पुष्टि करता है कि हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है।
हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्। तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा: ।
सात महाद्वीप की खोज भारत में हजारों साल पहले हो गयी थी
प्राचीन काल में पृथ्वी को सात भूभागों यानि महाद्वीपों में बांटा गया था। लेकिन ये सातों नाम कहां से आये और कैसी इसकी संरचना को पुराणों में बताया गया कभी भी इसका शोध नहीं हुआ। लेकिन अगर पुराणों पर नजर डालें तो जम्बूदीप इस शोध की पूरी कहानी बयान करता है। जम्बूदीप का अर्थ होता है समग्र द्वीप।
भारत के प्राचीन धर्म ग्रंथों में हर जगह जम्बूदीप का उल्लेख आता है। इसके पीछे की अहम वजह ये है कि उस वक्त सिर्फ एक द्वीप था और वायु पुराण इस बारे में पूरी व्याख्या तथ्यों के आधार पर करता है।
त्रेता युग में देश का नाम भारतवर्ष पड़ा था । और हम जानते है कि राम त्रेता युग के हैं । वायु पुराण के अनुसार त्रेता युग के प्रारंभ में स्वंयभू मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने भरत खंड को बसाया था। लेकिन राजा प्रियव्रत के कोई भी पुत्र नहीं था लिहाजा उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नींध्र को गोद ले लिया था जिसका लड़का नाभि था। नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था और ऋषभ के पुत्र का नाम भरत था और भरत के नाम पर ही देश का नाम भारतवर्ष पड़ा था। उस वक्त राजा प्रियव्रत ने अपनी कन्या के दस पुत्रों में से सात पुत्रों को पूरी धरती के सातों महाद्वीपों का अलग-अलग राजा नियुक्त किया था।
आपको बता दें कि पुराणों में राजा का अर्थ उस समय धर्म, और न्यायशील राज्य के संस्थापक के रूप में लिया जाता था। इस तरह राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप का शासक अग्नींध्र को बनाया था। इसके बाद राजा भरत ने जो अपना राज्य अपने पुत्र को दिया वही भारतवर्ष कहलाया। आपको बता दें कि भारतवर्ष का अर्थ होता है राजा भरत का क्षेत्र और राजा भरत के पुत्र का नाम सुमति था।
वायु पुराण जम्बूद्वीप की पूरी तरह से करता व्याख्या है
सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु 31-37, 38)
जब भी मुंडन, विवाह आदि मंगल कार्यों में मंत्र पड़े जाते हैं, तो उसमें संकल्प की शुरुआत में इसका जिक्र आता है:
।।जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्यावर्त देशांतर्गते….अमुक…।
* इनमें जम्बू द्वीप आज के यूरेशिया के लिए प्रयुक्त किया गया है। इस जम्बू द्वीप में भारत खण्ड अर्थात भरत का क्षेत्र अर्थात ‘भारतवर्ष’ स्थित है, जो कि आर्यावर्त कहलाता है।
।।हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्। तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा:…..।।
* हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है।
यानि की राम का इतिहास उस भारतवर्ष से है जो एक बृहत भूखण्ड था । आज एक नए विवाद को जन्म देना कि भारत स्थित अयोध्या ही नकली है यह महज सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए दिया गया कथन ही माना जा सकता है । हम सभी जानते हैं कि नेपाल और भारत की साझी धार्मिक साँस्कृतिक विरासत रही है जो एक दूसरे से अलग किए ही नहीं जा सकते । आज भी नेपाल में स्थित देवघाट बालमीकि आश्रम लवकुश से जुडी जगहें इस बात का द्योतक है कि किसी काल खंड में यह पूरा भूखण्ड एक ही था जिसे जम्बू दीप आर्यावर्त भारतवर्ष कहा जाता था । अब यह कहना कि राम एक ही दिन में अयोध्या से जनकपुर नहीं आ सकते थे इसलिए वो अयोध्या ही नकली है कितनी हास्यास्पद अभिव्यक्ति है ये । अगर रावण के पास पुष्पक विमान था तो श्रीराम के रथ में भी विशेषताएँ होंगी । उस वक्त के दिन रात आज से अलग थे मानवजाति भिन्न थी । जिनके पास अनेक विधाएँ थी जिनके शस्त्र कई गुणों से परिपूर्ण होते थे । इन सभी बातों को नकारा नहीं जा सकता । मैं फिर वही कहती हूँ कि नेपाल भारत का सम्बन्ध सदियों का है जो आज दो नाम होककर भी एक रहे हैं । एक साझी विरासत रही है हमारी । बेहतर हो कि हम राजनीतिक मुद्दों से परे हटकर अपने धार्मिक और साँस्कृतिक मूल्यों और रिश्तों को बचाएँ ।
आपकी जानकारी के लिए ठोरी के बारे में भी
(ऋषि बाल्मीकि ने निम्न बातें शायद ठोरी के अयोध्या के लिए कही थी)
साकेतपुरी अयोध्या का वर्णन करते हुए महर्षि वाल्मीकि, रामायण के बालकांड के पांचवें सर्ग के पांचवें श्लोक में लिखते हैं:
”कोसल नाम मुदित: स्फीतो जनपदो महान। निविष्ट: सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान्।। (1/5/5)
अर्थात : सरयू नदी के तट पर संतुष्ट जनों से पूर्ण धनधान्य से भरा-पूरा, उत्तरोत्तर उन्नति को प्राप्त कोसल नामक एक बड़ा देश था। वाल्मीकि आगे लिखते हैं –”इसी देश में मनुष्यों के आदिराजा प्रसिद्ध महाराज मनु की बसाई हुई तथा तीनों लोकों में विख्यात अयोध्या नामक एक नगरी थी।(1/5/6) नगर की लंबाई चौड़ाई और सड़कों के बारे में महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं –”यह महापुरी बारह योजन (96 मील) चौड़ी थी। इस नगरी में सुंदर, लंबी और चौड़ी सड़कें थीं। (1/5/7)
माथुरों के इतिहास के अनुसार वैवस्वत मनु लगभग 6673 ईसा पूर्व हुए थे। ब्रह्माजी के पुत्र मरीचि से कश्यप का जन्म हुआ। कश्यप से विवस्वान और विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु थे।
000वैवस्वत मनु के 10 पुत्र- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध थे। इसमें इक्ष्वाकु कुल का ही ज्यादा विस्तार हुआ। इक्ष्वाकु कुल में कई महान प्रतापी राजा, ऋषि, अरिहंत और भगवान हुए हैं। इक्ष्वाकु कुल में ही आगे चलकर प्रभु श्रीराम हुए। अयोध्या पर महाभारत काल तक इसी वंश के लोगों का शासन रहा।



