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वकील साहब ! आंदोलन और अदालत के बीच फंसा भारत : मुकेश भटनागर

 

मुकेश भटनागर, नई दिल्ली | वकालत एक दिमागी पेशा है क्योंकि कानून की भारी भारी पुस्तकें पढ़ना और पढ़कर समझना हर किसी आम व्यक्ति, की बात नहीं। वकालत भी हर कोई नहीं कर सकता उसके लिए पेशेवर होना पड़ता है और एडवोकेट अधिनियम के तहत लाइसेंस प्राप्त हुआ होना चाहिए। परन्तु आम जीवन में देखा जाए तो सभी स्वयं को वकील से कम नहीं समझते। क्यों की बहस करना बहुत आसान है निष्कर्ष पर पहुंचना उस से भी ज्यादा मुश्किल। विचित्र बात यह है कि सभी अपने को वकील भी समझते हैं और न्यायधीश भी। पिछले 14 महिने से देश में धरना प्रर्दशन आंदोलन का माहौल है, कोरोना ने कुछ हद रोक लगाई, परन्तु मनुष्य की प्रवृत्ति अनुसार उनमें और तीव्रता देखी गई। कोरोना काल में लाखों लोगों ने शहर से गांव की तरफ पलायन किया जिसमें खेतिहर मजदूर अथवा दिहाड़ी मजदूर थे परन्तु कोरोना के प्रभाव के हटते हटते लाखों किसान गांवों और खेतों से पलायन कर देश की राजधानी दिल्ली के सीमावर्ती इलाकों में जम गये। टी वी चैनलों के अनुसार देखें तो सभी एक तरह से प्रार्थी भी है, प्रश्न कर्ता भी, आवेदक भी है, निवेदक भी है और निर्णायक भी। अतः एक वकील साहब की नज़र से आज के माहौल को समझने का प्रयास करते हैं।

एक वकील साहब को अपने एक मुवक्किल से मिलने के लिए बगल के एक गांव में जाना पड़ गया। काला कोट तो वकीलों की पहचान मानी ही जाती है लिहाजा उन्होंने काला लिबास पहन रखा था। उस गांव की गलियों से नावाकिफ थे लिहाजा पूछते पूछते एक गली से उस गली और उस गली से ऐसी गलि में पहुंच गये जो सकरी तो थी ही साथ में दूसरे छोर से बंद थी। वकील साहब गांव में एक तो अनजान, अजनबी और उस पर काला लिबास, गली का एक कुत्ता आदत अनुसार उन पर भौंकने लगा। बहस करने की तो आदत थी ही, लिहाजा वकील साहब कुत्ते से भीड़ गये कभी शू शू शू कर के उसे भगाने प्रयास करें तो कभी कंकड़ फैंके। जितना भी वह उसे भगाना चाहे उतना वह कुत्ता और जोर जोर से भौंके।‌ इसी संघर्ष में 10-15 मिनट गुज़र गये। ये तो पुरानी कहावत है – ‘अपनी गली में हर कुत्ता शेर होता है’। लेकिन यह वकील साहब भी अपने को कोई शेर से कम नहीं समझते थे। वह डट कर मुकाबला करने लगे। आखिर में हुआ यूं कि आजु बाजु गली के कुत्ते भी अपने साथी की पुकार सुन, उसकी मदद को आ गये। अब वकील साहब एक, और कुत्ते हो गये 10 बेचारे किस किस को भगाते। सारा दिन भगाने में बीत गया, कपड़े फटे सो अलग।

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समझने की बात यह है कि जीवन में हमें किस को भगाना है और किस को अपनाना है। अगर हाथ में कंकड़ और ज़ुबान पर तुर्षि और दिल में रूखापन रखेंगे तो सभी भागेंगे। सभी विद्रोह और आक्रोश प्रकट करेंगे। जानवर हो या इंसान उसे तो बस प्यार से, बस में किया जा सकता है। अन्यथा भी, जो भौंक रहा उसे भौंकने दे अपना कीमती समय बरबाद न करें। कोई और नीति अपनायें। समय का सदुपयोग सीखें और विवेक से काम लें।

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इंसान को यदि किसी को भगाना है तो वह उसके अपने अंदर का – काम क्रोध लोभ मोह और अहंकार । यही कारण है कि अदालतों में बरसों तक विवाद लंबित रहते है।‌ चाहे वह बाबरी मस्ज़िद का मामला रहा हो या निर्भया (दामिनी) का। आज एक दूसरे के प्रति स्नेह आदर मान विश्वास इतना क्षिण हो गया कि सरकार के बनाए कानून को ही दरकिनार करने का दौर शुरू हो गया। स्वतंत्र भारत में संभवतः पहली बार उच्चतम न्यायालय ने एक अभूतपूर्व कदम लिया। संसदीय प्रक्रिया द्वारा पारित कृषि कानून पर बिना बहस सुने रोक लगा दी और उस पर मामला एक ऐसी समीति को सौंप दिया जो न तो संवैधानिक है और न ही विधि द्वारा स्थापित है। क्या इस समूह का गठन और उसकी की राय या परामर्श, कानून और उस पर हो रहे बबाल और आंदोलन, संसदीय प्रणाली और स्वयं उच्चतम न्यायालय की गरिमा को धुमिल और झंझावात नहीं करता।

क्या देश को, उपरोक्त स्थिति के मद्देनजर (गली में फंसे वकील साहब) यह समझने की आवश्यकता नहीं कि समाज, प्रशासन और तंत्र को कब प्रहरी बनना है, कब आक्रोश जताना है, कब सहानुभूति पूर्वक रूख अपनाना है, कब बीच का रास्ता अपनाना है आदि आदि। विरोध केवल विरोध के नाम नहीं होना चाहिए और न ही जनमत को विद्रोह के रूप में ही देखना चाहिए। ऐसा प्रतीत हो रहा है भगतसिंह का बलिदान फिर करवट ले रहा है। चारों तरफ संशय और असहशुणता का वातावरण व्याप्त है। आज़ाद भारत में संसदीय प्रणाली द्वारा पारित एक कानून की प्रतिलिपियां फाड़ी जाती है व सार्वजनिक रूप से जलायीं जाती है। क्या, कहीं यह किसी आने वाले तुफान का संकेत तो नहीं।

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कहीं ऐसा ना हो अपने वकील साहब की तरह दिन बीत जाए और मक़सद पूरा न हो पाये। फ़रवरी 2020 में एक प्रदर्शन शुरू हुआ, काफी आग भड़की, फिर कोरोना का कहर बरपा कुदरत ने अपना खेल दिखाया, विश्व आर्थिक मंदी से गुजर रहा है, अमरीका में चुनाव भी हुए और एक प्रकार से नहीं भी हुए क्यों की निवृत्तिमान राष्ट्रपति चुनावी नतीजों को मानने को तैयार नहीं अंततः वहां भी विद्रोह की स्थिति हो गई, शुक्र है कि विवेकशीलता से स्थिति काबू में आई। आज जब हम कोरोना को काबू करने में लगभग सक्षम है तब हमें उसी धैर्य, आपसी समझ, सहयोग एवं एक दूसरे पर विश्वास करते हुए बढ़ना है।

मुकेश भटनागर

मुकेश भटनागर, दिल्ली

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