जनादेश पर परमादेश का प्रहार – उचित या अनुचित ? : डा. श्वेता दीप्ति
डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक जुलाई । प्लेटो ने कहा था, “लोकतंत्र से ही तानाशाही जन्म लेती है ।” तानाशाही बनाम निरंकुशता । देखा जाए तो हम सभ्य दुनिया में साँस लेने वाले सामाजिक प्राणी हैं और सभ्य दुनिया में राजनीतिक प्रणालियों में श्रेष्ठ प्रणाली लोकतंत्र का उपयोग कर रहे हैं । वर्तमान में लोकतंत्र शासन का सबसे अच्छा रूप माना जाता है । हालाँकि, नेपाल के लिए लोकतंत्र में साँस लेने की कवायद अभी नई ही मानी जा सकती है । कई मायनों में हम लोकतंत्र के आदी ही नहीं हैं, यही वजह है कि आज भी राजतंत्र के प्रति मोह गाहे–बगाहे आम जनता में दिख ही जाता है ।
आजकल एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली के लिए जो शब्द अनेक पार्टियों द्वारा सबसे अधिक प्रयुक्त किया जा रहा था वह था तानाशाह और निरंकुश । चाहे पुष्प दहाल प्रचण्ड हों, माधव प्रसाद नेपाल हों, बाबुराम भट्राई हों, उपेन्द्र यादव हों, शेरबहादुर देउवा हों या अन्य छोटे कद के नेता हों, वो एकसुर में प्रधानमंत्री ओली को तानाशाही का तगमा पहना रहे थे । तानाशाही और निरंकुशता, ये दोनों ही शब्द उस राजनीतिक प्रणालियों का उल्लेख करते हैं, जहां सत्ता एक व्यक्ति के हाथों में रहती है, इन दोनों शब्दों में बहुत ही सूक्ष्म अंतर हैं जो शासन के दो रूपों को एक दूसरे से अलग बनाते हैं ।
जब भी तानाशाही शब्द का प्रयोग किया जाता है, तो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी में हिटलर के शासन का उत्कृष्ट उदाहरण और ७० के दशक में युगांडा में ईदी अमीन का शासन दिमाग में आता है । वर्तमान में म्यानमार तानाशाही और निरंकुश शासन का ताजा उदाहरण है, जहाँ हर रोज जनता का खून बहाया जा रहा है और विश्व इस खूनी खेल का गवाह बन रहा है । तानाशाही व्यक्ति की शक्ति असीमित और अनियंत्रित हो जाती है । वह किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होता है और उसकी कोई भी कार्रवाई न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं होती है । इतना ही नहीं तानाशाह अक्सर अत्याचारी हो जाता है क्योंकि वह जानता है कि उसे अपनी किसी भी चाल या नीतियों के लिए औचित्य देने की आवश्यकता नहीं है । एक तानाशाह अपने देश में सर्वोच्च है, और उसे लोगों की सहमति की आवश्यकता नहीं होती है कि वह कुछ भी अपनी मनमानी कर लेता है ।
तानाशाही देश की एक ऐसी पार्टी का परिणाम हो सकती है, जिसके मुखिया तानाशाह होते हैं या यह सैन्य तानाशाही हो सकती है, जिसमें सेना का प्रमुख खुद को सभी अधिकार मान लेता है । लालच, घृणा, अभिमान और शक्ति के कारण तानाशाही अक्सर मौत, हत्या या नरसंहार की विशेषता से युक्त होता है । माना जाता है कि हिटलर ने यहूदियों की लाखों मौतें की हैं, जबकि ईदी अमीन को सैकड़ों हजारों भारतीयों की हत्याओं के लिए जिम्मेदार माना जाता है ।
देखा जाए तो निरंकुशता भी एक राजनीतिक प्रणाली है, जहां एक अकेला व्यक्ति मामलों के शीर्ष पर होता है और अपने देश के सभी लोगों के जीवन और नियति को नियंत्रित करता है । सभी निर्णय इस आदमी द्वारा लिए जाते हैं जिनके निर्णय सर्वोच्च हैं और भूमि के किसी भी कानून के अधीन नहीं हैं । यह शब्द ग्रीक शब्द से आया है जो ऑटो और नियम में अनुवाद करता है जिसका अर्थ है स्व–शासन । हालाँकि, इस सहज अनुवाद का शाब्दिक अर्थ है एक ऐसी जगह जहाँ एक आदमी अपने द्वारा अन्य सभी पर शासन करता है । तानाशाही और निरंकुशता में बहुत अंतर नहीं है क्योंकि दोनों प्रणालियों में देश एक ही व्यक्ति द्वारा शासित होता है । हालाँकि, तानाशाही के नकारात्मक अर्थ हैं, जबकि निरंकुशता को कम बुराई के रूप में माना जाता है ।
एक निरंकुश व्यक्ति के पास तानाशाह के व्यक्तित्व पंथ या करिश्मे का अभाव होता है और यह शायद उसे अत्यधिक निर्णय लेने से रोकता है जो उसके लोगों को गंभीर चोट पहुंचा सकता है । तानाशाही और निरंकुशता में एक और अंतर जो उभर कर आता है, वह यह है कि तानाशाही एक विशेष पार्टी या वर्ग (जैसे कि हिटलर के जर्मनी में एक एकल शासन, या म्यांमार में सैन्य जंता) का शासन हो सकता है, जबकि, निरंकुशता में, यह हमेशा एक ही व्यक्ति होता है जो मामलों के शीर्ष पर है । यानि इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में प्रधानमंत्री ओली तानाशाह कम, निरंकुश अधिक हैं । यही वजह है कि तानाशाही तक पहुँचने से पहले वो लोकतंत्र की रक्षा करते हुए(भले ही यह छद्म हो)आगे बढ़ना चाह रहे थे और मजबूरी में ही सही अपने उन साथियों को मिलाने की कोशिश कर रहे थे जो उनके साथ एक ही पार्टी का नेतृत्व करते हुए भी खुले तौर पर उनका विद्रोह करते आ रहे हैं ।
किन्तु प्रयास के बावजूद भी सर्वोच्च अदालत के फैसले ने उनकी मंशा कामयाब नहीं होने दी । जाहिर सी बात है कि प्रधानमंत्री आज के समय में तानाशाह तो बिल्कुल नहीं हैं । यह सिर्फ आज के वर्तमान समय के लिए कहा जा सकता है, वैसे मधेश आन्दोलन के समय हुए रक्तपात के मंजर उनकी तानाशाही को ही जाहिर करती है । खैर यह तो अतीत की बातें थी वर्तमान में तो यह कहूँ कि ओली निरंकुशता का भी असली जामा पहन नहीं पाए और अदालती प्रक्रिया के साथ आगे बढ़ने की कोशिश की । परिणाम यह कि अनेक प्रयासों के बाद भी कुर्सी उनके हाथों से निकल ही गई । इस सबमें अगर उनकी उम्मीद को किसी ने तोड़ा तो वह था माधव नेपाल से साथ की उम्मीद । अंत तक उन्होंने प्रयास किया कि, माधव नेपाल का साथ उन्हें मिल जाए । किन्तु अतीत में उनके हर कदम पर साथ देने वाले माधव नेपाल ने इस बार उनका हाथ झटक दिया । जिस मधेशी पार्टी को साथ लेकर चलने की कोशिश की वह भी निराधार रहा । देखा जाए तो इन सबके बीच मधेशी दलों की भी अच्छी खासी किरकिरी हुई । जसपा का विभाजन तय हो चुका है और उसमें पार्टी के नाम को अपना बनाने की लड़ाई जारी है । पार्टी अध्यक्ष महन्थ ठाकुर का निर्णय दूरदर्शी साबित नहीं हुआ । समय की नब्ज वो पकड़ नहीं पाए ।कहते हैं कि भ्रम ज्यादा दिनों तक नहीं टिकता है और राजनीति परिदृश्य तो क्षण–क्षण परिवर्तित होता है । पिछले समय में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की युगलबंदी ने नेपाली राजनीति के इतिहास में कई अध्याय जोड़े और अपनी मनमानी पार्टी और देश पर लादने की कोशिश की, जिसमें काफी हद तक सफल भी होते नजर आ रहे थे । किन्तु पिछले कई सन्दर्भों में अदालत का झटका उन्हें मिलता रहा और आज विपक्ष ने कामयाबी हासिल कर ही ली । वैसे प्रधानमंत्री निर्धारण करने का अदालत का यह फैसला लोकतंत्रात्मक प्रक्रिया पर भी सवाल उठा सकता है क्योंकि, यह काम राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करने वाली संसद को करना होता है और राष्ट्रपति पद को औपचारिक रूप देना होता है । खैर यह तो आरोप प्रत्यारोप की बातें हैं फिलहाल तो राजनीतिक निष्कर्ष आ चुका है सर्वोच्च ने परमादेश जारी करते हुए काँग्रेस अध्यक्ष शेरबहादुर देउवा की प्रधानमंत्री बनने की राह बना दी है ।
इन सब परिदृश्य में अगर सबसे अधिक किसी पर ऊँगली उठी तो वह है राष्ट्रपति और उनके द्वारा उठाए गए कदम पर । कई बार उनके फैसले से लगा कि पदीय गरिमा की मर्यादा तहस–नहस हो रही है । १४९ सांसदों के समर्थन के बावजूद, राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा को संविधान के अनुच्छेद ७६ (५) के अनुसार प्रधान मंत्री के रूप में नियुक्त नहीं किया था । और इसके खिलाफ ही रिट दायर किया गया और जब राष्ट्रपति कार्यालय से इस बापत प्रश्न पूछा गया तो यह तर्क दिया गया कि राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद ७६ (५) के अनुसार प्रधान मंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति का विवेकाधीन अधिकार है और अदालत में इस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता । किन्तु इस रिट पर सर्वोच्च अदालत द्वारा दिए गए फैसले में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि किसी को भी संविधान और कानून का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं है । यदि राष्ट्रपति द्वारा लिए गए निर्णय के आधार पर इस तरह के निर्णय को न्यायिक जांच के दायरे से बाहर रखा जाता है, तो यह अनिवार्य रूप से मनमानी और अत्याचार को जन्म दे सकता है । सर्वोच्च अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि “राष्ट्रपति पर सवाल नहीं उठाए जाने पर स्वच्छेचारी और निरंकुशता का जन्म होता है ।” राष्ट्रपति पद की शपथ की भाषा का हवाला देते हुए यह कहा गया कि “किसी को भी संविधान और कानून का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं है । यदि राष्ट्रपति द्वारा लिए गए निर्णय के आधार पर इस तरह के निर्णय को न्यायिक जांच के दायरे से बाहर रखा जाता है, तो यह अनिवार्य रूप से मनमानी और अत्याचार को जन्म देगा ।”
गौर करने वाली बात यह है कि, सर्वोच्च के फैसले के पहले भी और बाद में भी राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने की आवाज उठ रही है जो उनके द्वारा लिए गए अदूरदर्शी फैसले का ही परिणाम है । उनके हर फैसले से यह जाहिर होता आया है कि वो किसी पार्टी विशेष के साथ चल रही हैं । जबकि यह पद किसी भी पार्टी विशेष का नहीं होता । विवेकशील पार्टी ने तो विज्ञप्ति जारी कर उनपर महाभियोग लगाने की माँग की है ।
वर्तमान राजनीति का अगला परिदृश्य यह कि, अब नेपाल की सत्ता की बागडोर काँग्रेस अध्यक्ष शेरबहादुर देउवा के हाथों में जाने वाली है । तो क्या अब यह माना जाए कि देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में जा रहा है या अब नेपाल का काया पलट होने जा रहा है । देखा जाए तो ऐसा कुछ नहीं होने वाला क्योंकि आगे की राह भी सहज नहीं है । माधव नेपाल जी ने अपनी ख्वाहिश जाहिर कर दी है कि काँग्रेस एमाले को भी साथ लेकर सत्ता गठन करे, वहीं निश्चित तौर पर माओवादी और मधेशी दलों की भी अपनी आकाँक्षाएँ होंगी और अगर इन सभी कसौटियों पर देउवा नहीं उतरते हैं तो तीस दिनों के बाद विश्वास मत लेना उनके लिए आसान नहीं होगा ।
अगर प्रधानमंत्री ३० दिनों के भीतर विश्वास मत हासिल करने में विफल रहते हैं तो राष्ट्रपति के पास दो विकल्प होंगे पहला विकल्प संविधान के अनुच्छेद ७६, खंड ७ के अनुसार संसद को भंग करना और चुनाव की तारीख तय करना या एक बार फिर से अनुच्छेद ७६, खंड २ के अनुसार सरकार बनाने का आह्वान करना है । संविधान के अनुच्छेद ७६, खंड ७ में कहा गया है कि यदि प्रधानमंत्री बनने वाला व्यक्ति संसद सदस्य से विश्वास मत प्राप्त करने में विफल रहता है, तो राष्ट्रपति द्वारा प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया जाएगा और अगले चुनाव की तारीख छ महीने के भीतर तय किया जाएगा । या फिर इस आधार पर कि संसद को तब तक भंग नहीं किया जा सकता जब तक कि संसद द्वारा प्रधान मंत्री का चुनाव नहीं किया जाता राष्ट्रपति एक बार फिर संविधान के अनुच्छेद ७६, खंड २ के अनुसार सरकार बनाने का आह्वान करेंगी । संविधान के अनुच्छेद ७६, खंड २ के अनुसार, यदि संसद में प्रतिनिधित्व करने वाले दलों में से एक के पास बहुमत नहीं है, तो दो या दो से अधिक दलों के समर्थन से प्रधान मंत्री का दावा करने का प्रावधान है । हालाँकि, इन सभी कयासों के बाद भी शेर बहादुर देउबा के कार्यवाहक प्रधान मंत्री होने की संभावना बनी रहेगी यदि राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद ७६ (२) के अनुसार सरकार के गठन का आह्वान नहीं करती हैं या यदि प्रधान मंत्री विश्वास मत प्राप्त करने में विफल रहते हैं । अब फिलहाल यह देखना है कि देउवा का प्रधानमंत्री का सफर कितने दिनों का है, एक महीने का या सत्रह महीने का । खैर, राजनीतिक नाटक का पटाक्षेप अभी नहीं हुआ है, यह दिलचस्प पहलू और मोड़ के साथ जारी है ।

