नेपाल को क्या हो गया है ? : ललित झा
ललित झा, सदियों से पर्वत राज हिमालय की गोद में बसा नेपाल भौगोलिक सामरिक एबम राजनीतिक रूप से अत्यंत ही महत्वपूर्ण देश रहा है जो करीब 240 वर्षों के लंबे कालखंड तक राजनीतिक रूप से हिंदु राजशाही के अधीन रहा। फिर कई रक्तरंजित खूनी आंदोलनों और जनतांत्रिक क्रांति के कारण यहाँ लोकतंत्र का प्रादुर्भाव हुआ। आज लोकतंत्र के आगोश में नेपाल करवटें बदल रहा है। एक लोकतांत्रिक गणतंत्र का सपना आकार ले रहा है लेकिन इसके साथ ही आज नेपाल के राजनीतिक आर्थिक और सामाजिक जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटित हो रही है जो न सिर्फ हैरान परेशान करती है बल्कि अंतर्मन को झझकोरती भी है। तब सवाल उठता है अपने नेपाल में ऐसा क्यों हो रहा है?
आजकल नेपाल के राष्ट्रीय जीवन में एक बार पुनः mcc का चर्चा जोड़ों पर है। बिमर्श भी ऐसा वैसा नही बल्कि इतना गंभीर की mcc को संसद से अनुमोदन कराने के प्रयास में एक संघिये सरकार असमय ढल चुकि है, लेकिन यह mcc का जिन्न शांत होने का नाम ही नही ले रहा, कुछ समय के अंतराल पर यह उठ खड़ा हो जाता है एक और सरकार को निगलने के लिये। यह ओली जी के सरकार के कार्यकाल को समय से पूर्व पहले ही खत्म कर चुकि है अब इसके कारण देउबा जी के नेतृत्व्वाली गठबंधन सरकार पर भी अस्थिरता मंडराने लगा है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह mcc नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है कि सरकार का अस्तित्व ही दाव पर लग जा रहा है? दरअसल mcc अमेरिकी कांग्रेस द्वारा वर्ष 2002 में स्थापित एक योजना है जिसमे संसार के करीब पचास से अधिक विकाशशील देश जुड़े हुए हैं। वर्ष 2017 में नेपाली कांग्रेस की सरकार ने अमेरिका के साथ इस समझौता पर हस्ताक्षर किया था। इस समझौते के तहत 500 करोड़ डॉलर की आर्थिक सहायता नेपाल को मिलना हैजिससे आधारभूत संरचना का निर्माण एबम गरीबी न्युनिकरण कार्यक्रम संचालित होना है। इसके लिए संसद से अनुमोदन जरूरी है।
mcc में ऐसा क्या है जिस कारण इसका तीब्र विरोध हो रहा है- – बस्तुतः इस मे ऐसा कुछ भी नही जिस कारण इसका विरोध हो रहा है। फिर भी इसका तीखा विरोध इसलिए हो रहा है क्योकि चीन नही चाहता नेपाल में mcc योजना का सफल संचालन हो। दरअसल mcc के विरोध का बास्तबिक केंद्र काठमांडू में नही बीजिंग में है। चीन कम्युनिष्ट पार्टी के निर्देश पर इसका विरोध किया जा रहा है। तरह तरह के मनगढंत तर्क गढ़े जा रहे हैं, राष्ट्रीयता की दुहाई दिया जा रहा है ताकि संसद में इसका अनुमोदन रोका जा सके। चीन द्वारा इसे रोकने की सुपारी प्रचंड और माधव नेपाल की बामपंथी पार्टी को मिला हुआ है। इसलिए ही ये लोग गठबंधन सरकार का अस्तित्व भी दाव पर लगाने को तैयार है। दरअसल सच्चाई ये है कि चीन नेपाल को भुराजनीतिक कूटनीति का कुरुक्षेत्र बनाना चाहता है जहाँ वह न सिर्फ अपने सामरिक कूटनीतिक हितों का संरक्षण चाहता है बल्कि वहाँ से अमेरिका और भारत के सामरिक हितों को नुकसान भी पहुँचाना चाहता है। सामरिक विश्लेषकों के अनुसार चीन का असली मकसद नेपाल को अपने ऋण जाल नीति में फंसाना है ताकि भारत को घेरने की उसकी नीति सफल हो सके। इसके लिए उसने नेपाल के साथ वर्ष 2018 में ही B.R.I समझौता पर हस्ताक्षर किया था। इस परियोजना के जरिये चीन विशालकाय परियोजना निर्माण के नाम पर ऋण के रूप में भारी धनराशि देकर नेपाल को अपने चंगुल में फंसाना चाहता है जैसा उसने पाकिस्तान श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार, बांग्लादेश समेत कई देशों के साथ किया है। चीन की इस कुटिल योजना में भारत और अमेरिका का आर्थिक सहयोग बाधा बन रहा है। उसे पता है जबतक भारत अमेरिका का सहयोग नेपाल को मिलता रहेगा तब तक नेपाल चीन पर निर्भर नही हो सकेगा। चीन द्वारा mcc का विरोध तो समझ में आता है लेकिन नेपाल के बामपंथी नेताओं द्वारा किया जा रहा विरोध समझ से परे है। आखिर क्यों प्रचंड माधव नेपाल, नारायण काजी श्रेष्ठ, झलनाथ खनाल, भीम रावल जैसा राष्ट्रीय स्तर का नेता नेपाल के सामरिक आर्थिक हितों के खिलाफ चीन के सामरिक स्वार्थ की लड़ाई लड़ रहा है? कुछ लोगों का यह कहना है कि यदि mcc का जरूरत नेपाल को नही है तो फिर BRI की जरूरत भी नेपाल को नही है और यदि BRI यहाँ लागु होगा तो mcc का अनुमोदन भी होना चाहिए। ऐसा कैसे संभव है कि चीन का कर्ज तो नेपाल के लिए ठीक हो लेकिन अमेरिका का आर्थिक सहयोग नही? जैसे ही देउबा सरकार संसद द्वारा mcc का अनुमोदन कराने के लिए हरकत में आयी तुरंत बीजिंग से cpc के विदेश विभाग के अध्यक्ष का संदेश प्रचंड जी के पास पहुँच गया और निर्देश मिल गया कि चाहे सरकार गिर जाय, राजनीतिक गठबंधन टूट जाय लेकिन mcc का अनुमोदन रुकना चाहिय। फिर क्या था mcc विरोध का जिन्न फिर से सड़क पर आ गया है। लेफ्ट के नेता pm को धमकी दे रहे हैं mcc पर आगे बढ़े तो गठबंधन खत्म। सत्ता साझेदारों के बीच जारी गतिरोध से एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि लेफ्ट के इन नेताओं के लिए नेपाल का राष्ट्रीय हित, चीन के राष्ट्रीय हितों के समक्ष कोई महत्व् नही रखता। दर असल वह नेपाल नही चीन के सामरिक हितों की लडाई लड़ रहे हैं। mcc के मुद्दे पर चिनियाँ धुन पर इन बामपंथी नेताओं का राजनीतिक नृत्य काफी हैरान करनेवाला है।
दूसरा महत्वपूर्ण बात भारत नेपाल रेल परियोजना से जुड़ा हुआ है। भारत सरकार के आर्थिक सहयोग से जयनगर जनकपुर वर्दीवास के बीच 69 किमी बड़ी रेल लाइन परियोजना का निर्माण किया जा रहा है जिसमे प्रथम चरण में जयनगर से कुर्था तक द्वितीय चरण में कुर्था से बिजलपुरा तक का कार्य पुर्ण हो चुका है। नेपाल सरकार को हैंडओवर भी हो चुका है। नेपाल सरकार द्वारा करीब 85 करोड़ की लागत से एक जोड़ी ट्रेन भी खरीद किया जा चुका है
परंतु दुर्भाग्य से यह ट्रेन पिछले सोलह महीने से इनरवा स्टेसन पर खड़ी उद्दघाटन की बात जोह रही है। प्रत्यक्षदर्शियों की माने तो ट्रेन में अब जंग भी लगना शुरू हो गया है, रेल पटरियों में लगे क्लिप की चोरी भी हो रही है पर कोई इसको देखने सुननेवाला नही। खबर तो यह भी है कि कभी जमीन अधिग्रहण के बहाने तो कभी कर्मचारियों के अभाव के बहाने, उद्देश्य सिर्फ एक ही होता है ट्रेन परिचालन में अनावश्यक विलंब। भारत नेपाल रेल समझौता हुये करीब 12 वर्ष हो चुके हैं लेकिन अब तक बिजलपुरा से बर्दिवास तक, जमीन अधिग्रहण भी नही पुरा हुआ है। अब ईश्वर ही जाने , तीन वर्ष में पूर्ण होनेवाला यह योजना 12 वर्षो बाद भी अबतक क्यों अधूरा है? विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार चिनियाँ दूतावास के इशारे पर जयनगर जनकपुर ट्रेन परिचालन में नया अरंगा लगाने का प्रयास भी हो रहा है। चीन समर्थक न्यूज़ पोर्टलों मे लेख लिखकर यह प्रचारित किया जा रहा है कि इस ट्रेन परिचालन से नेपाल को काफी आर्थिक नुकसान होगा जबकि भारतीय रेल से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार इस ट्रेन परिचालन से नेपाल को आर्थिक रूप से काफी फ़ायदा हो सकता है। इससे जहाँ एक तरफ अंतराष्टिये पर्यटन का विकास होगा वहीं दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों में भी वृद्धि होंगी।लेकिन दोनों देशों के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ इस परियोजना में अनावश्यक विलंब किया जा रहा है।
एक और अतिमहत्वपूर्ण विषय जनकपुर यात्री निवास प्रकरण है।दक्षिण भारत के विश्व विख्यात तिरुमला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट द्वारा जनकपुरधाम मे करोड़ो की आर्थिक लागत से एक अच्छे सुबिधायुक्त धर्मशाला का निर्माण किया गया था जिसका प्रमुख उद्देश्य था जनकपुर भ्रमण तथा माता जानकी दर्शन हेतु आनेवाले भक्तजन श्रधालुओ को सस्ता सहज सुलभ आवास सुबिधा उपलब्ध कराना। वर्षो तक यह अपने उद्देश्यों की पूर्ति में सफल भी रहा है लेकिन हाल के एक मीडिया पड़ताल में हैरतअंगेज तथ्य उजागर हुआ है।
बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद द्वारा धार्मिक सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण इस धर्मशाला को होटल संचालन के लिए एक निजी संस्था को लीज पर दे दिया गया है। अभी इस धर्मशाला को होटल में बदला जा रहा है। ठीक ऐसे ही काठमांडू स्थित भारत नेपाल मैत्री धर्मशाला के साथ किया गया है। भारत सरकार के 34 करोड़ के आर्थिक सहयोग से निर्मित इस भव्य धर्मशाला का निर्माण भी बाबा पशुपति नाथ दर्शन हेतु आनेवाले श्रधालुओ को सस्ता सुलभ आवास सुविधा उपलब्ध कराने के लिए हुआ था पर अफसोस कि इस धर्मशाला को भी बताश समूह ने लीज पर ले लिया है और इसमे होटल संचालन किया रहा है। नेपाल के पर्यटन एबम संस्कृति मंत्री प्रेम आले इस दुर्भाग्यपूर्ण मामले पर काफी आक्रोशित दिखे तो लेकिन कुछ होगा ऐसा लग नही रहा। धर्मशाला किसी धार्मिक आस्था के पवित्र मंदिर से कम नहीं होता है लेकिन भ्रष्टाचार के इन गिद्धों ने आस्था के इस मंदिर को भी नही बख्शा। किसी के पवित्र आस्था से खिलबार करने का अधिकार किसी को नही है। धर्मशाला में होटल संचालन का कोई औचित्य नही। निश्चय ही यह तिरुमला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट के विश्वास के साथ धोखा है पर सरकार और जिम्मेवार लोगों की खामोशी हैरान करनेवाली है।
जनकपुरधाम मे बिलुप्त हो रहे धर्मशाला पर जनकपुर मे एक श्रधालु ने बड़ा ही मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा था- “भ्रष्टाचार के गिद्ध जनकपुर में धर्मशालाओं को निगलते जा रहे हैं, यदि इनका वश चले तो एक दिन यह जानकी मंदिर को भी लीज पर लगा देंगे और नागरिक समाज धृतराष्ट्र की तरह मूकदर्शक बन तमाशा देख रहा है। ऐसे में राष्ट्रकवि दिनकर की कालजयी रचना ” कुरुक्षेत्र ” की यह पंक्ति सटीक बैठती है,
“वह कौन रोता है वहाँ, इतिहास के अध्याय पर, जिसमे लिखा है नौजवानों के लहू का मोल है,,
रणभूमि मे वह देखता है, सत्य को रोता हुआ, वह सत्य है जो रो रहा, इतिहास के इस अध्याय में”।
नेपाल बाबा पशुपतिनाथ, मुक्तिनाथ, राजा जनक और गौतम बुद्ध की धरती है। इस पवित्र धरती पर ऐसे कुकृत्य देखकर सहज ही यह लगता है नेपाल को क्या हो गया है।

राजनीतिक संपादक, हिमालिनी ।

