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युद्ध और आतंक ———— -कैलाश महतो

 
कैलाश महतो, पराशी । अवध एक्सप्रेस-बान्द्रा टर्मिनल से सफर कर रहे थे । हमारे ठीक सामने लम्बे दाह्री बाले दो मुस्लिम पुरुष और बगल में दो मुस्लिम महिलायें बैठी थीं । वे दो पुरुष और दो महिलायें एक साथ नहीं थे । दो बुजुर्ग महिलायें और उन दो पुरुषों में भावनात्मक जान पहचान तब हो गयी, जब दो उन पुरुषों ने  ट्रेन में ही बडे प्रेम से दो बार नमाजें अदा कीं । वे दोनों नमाजी अति सौम्य और सभ्य थे । उनके भाषा, व्यवहार और नमाज पढने के तरीके काफी अच्छे थे ।
नमाज पढना उनका धार्मिक कर्तव्य होगा । मगर जिस भाव से वे अल्लाह के प्रति लगाव दिखा रहे थे, उससे यह साफ जाहेर था कि नमाजी परिधि के बाद वे अव्वल मानव थे । दोनों अध्ययनशिल भी थे । पूरे सफर उन्होंने किताबे पढीं ।
उनके नमाज पढने के बाद हमारे ही बोगी में बैठी दो मुस्लिम महिलाओं ने उनसे धार्मिक बाते करना शुरु की । वे हज और मक्का मदीना दर्शन की बातें कर रहे थे । उन चारों मुस्लिम पुरुष और महिलाओं के बीच ऐसी मान्य करीबी और हमदर्दी दिख रही थी, मानों वे एक दूजे को दशकों से जानते हों । ९वें स्टेशन बाद महिलाओं को ट्रेन छोडना हुआ । छोडते समय वे एक दूसरे से ऐसे अदब कर रहे थे, जैसे कोई खास रिश्तेदार अलग हो रहे हों । दशों बार एक दूसरे को अपने धार्मिक रिवाज में अदब और सम्मान दिखाये होंगे ।
व्यक्तिगत रुप से मैं खुद भी मुस्लिम कुछ चीजों और व्यवहारों को पसन्द नहीं करता, जैसे; उनके पैरों से उपर टंगे पैजामे, पैजामे और उनके कुर्ता के बीच असमाञ्जस्य मेल, सर का टोपी, धार्मिक कट्टरता और अपना जूठा किसी और को भी खिलाने मनोविज्ञान । मगर यह और ऐसे भाव और मनोविज्ञान कुछ उच्च कोटी के मुस्लिम परिवारों में नहीं होता है । प्राय: उन परिवारों में मेरा आन जाना और खाना पीना होता है । हमारे अन्दर मुस्लिमत्व और हिन्दुत्व की भाव नहीं है । मगर किसी भी वाद का अत्तित्व और धार्मिक उन्माद को व्यक्तिगत हम पसन्द नहीं करते । हम निश्छलता पर भरोसा करते हैं ।
ट्रेन में नमाज पढने बाले उन मुस्लिम नमाजियों में मानवता के प्रति जो भाव दिखे, हम आश्चर्यचकित हो रहे थे यह सोंचकर कि लोग कैसे कहते हैं कि मुस्लिम केवल मुस्लिमों के लिए ही जीते हैं । वे सारे जगत, सारे मानव कल्याण और सारे कायनात के एकता के लिए अपने में बात कर रहे थे । उनके अनुसार वे हज करने तो मक्का नहीं जा सके हैं, मगर मेरे अनुसार वे किसी हाजी से भी ज्यादा हाजी और परमात्मामयी दिख रहे थे । उनके भाषा में अल्लाह न हिन्दु की, न मुस्लि की, न तो किसी खास जात के, न किसी धर्म या वाद के हैं – अपितु वे सारे मानव भाव के हैं । सारे ब्रम्हाण्ड के हैं ।
उनके सच्चे भाव के बारे में सोंचते सोंचते यह सोंचने को बाध्य होना पडा कि इतने सभ्य लोग आखिर दुनिया के भाषा और गणित में आतंकवादी और आतंककारी कैसे हो जाते हैं ? मुसलमान = आतंकवादी और आतंक = मुसलमान कैसे और क्यों ? लोगों में यह समान्य धारणा क्यो कि आतंक केवल मुसलमान फैलाते हैं ? पाखण्डी कुछ मुस्लिमों में यह रुढता क्यों कि मुसान को छोड बांकी सब काफीर हैं ? क्या आतंक केवल मुसलमान ही करते हैं ? आतंक क्या केवल कोई आतंकी ही फैलाते हैं ? राज्य, राजनीत, शासक और प्रशासक नहीं ? क्या ये लोग (कथित आतंकवादी) आतंकवादी बनने के लिए ही जन्म लेते हैं ? क्या ये लोग खून खरावा करने करवाने के लिए ही बच्चे पैदा करते हैं ? क्या ये जीना नहीं चाहते ? क्या ये अपने सामने अपने बच्चों को मरते और उनके घायल जीवन को देखने को बेताब रहते होंगे ? कतई नहीं । दुनिया का कोई भी न तो आदमी आतंकवादी होता है, न समूह ।‌
आतंकी न तो कोई व्यक्ति जन्म से होता है, न कोई मरना या मारना चाहता है । वह सारा राज्य और राजनीति का
उत्पाद हैं । व्यक्ति बहुत से बहुत झगडा कर लेगा, लडाई कर लेता है, युद्ध नहीं करता । युद्ध तो राज्य और शासक करते हैं । युद्ध से बडा भी कोई आतंक होता है क्या ? उसमें शसकों का अकल्पनीय लाभ है । नाम और दाम दोनों की पर संभावनाएँ होती हैं । युद्ध के समय किसी भी खर्च ही हिसाब किताब नहीं होता । अकल्पनीय कमाई कर लेते हैं शासक लोग । युद्ध में जीत गये, तो शासक सफल होने का खिताब पाता है । हार जाये, तो भी लडाकू योद्धा नेता कहलाता है । लडने बाले जवानों का तो नाम का भी अतापता नहीं होता । लडने बाले युद्ध मैदान में मर जाते हैं । मगर जो लडता नहीं, लडने को बाध्य करता है, वह वीर नेपोलियन, साहसी हिटलर, ताकतवर मुसोलिनी, स्टेट्स म्यान स्टालिन, बहादुर पुतिन, जिद्दी जेलेंस्की, सुपर पावर बाइडेन, क्रान्तिकारी माओत्सेतुङ्ग, साम्राज्यवाद विरोधी किम इल,सुङ्ग, शक्तिशाली सी जिन पिङ्ग,आदि हिम्मतशाली योद्धा माने जाते हैं ।
दुनिया का सारा युद्ध शासकों ने करवाया है अपने लाभ, स्वार्थ और अहंकार को तृप्त करने के लिए । लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि जब शासक अपने राजनीतिक, आर्थिक, पारिवारिक और नश्लीय लाभ के लिए बन्दूक उठाये, तो वह देशभक्ति और राष्ट्रभक्ती हो जाता है । वहीं बारम्बार राज्य और शासकों से अपने न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए अनेक मिन्नत के बाद भी कोई सुनवाई न होने के बाद जब कोई विद्रोह करें, आवाज उठायें, संगठन बनायें,आन्दोलन करें और बन्दूक उठायें, तो वह देशद्रोही, राज्य विप्लवी, आतंकवादी, आतंककारी और सजा की भागीदार हो जाते हैं ।
जैसे ट्रेन में नमाज पढ़ने बाले दो नमाजियों ने अपने हर प्रार्थना में समस्त मानव कल्याण के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे, उसके ठीक विपरीत उनसे उपर के धार्मिक पण्डे लोग धर्म के परिधियों में अपने शोषकीय जाल विछाये रहते हैं, जिनका उद्देश्य केवल और केवल धार्मिक दंगे और वैमनश्यता निर्माण कर राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक लाभ उठाना होता है । वह हर धर्म में होता है ।
जब कोई धार्मिक नेता यह कहें कि धर्म के लिए मर जाना धर्म है, तो वहाँ लोगों को सतर्क रहने की आवश्यकता है । संसार के धार्मिक जनस्तर को देखें, तो किसी भी धर्म का बहुमत संसार में नहीं है । तथ्य और तथ्याङ्कों को मानें, तो विश्व में क्रिश्चियन ३१%, मुस्लिम २५%, हिन्दु १६%, बुद्ध ७%, सिक्ख ११%, जैन, आदि भी कुछ % में हैं । कुछ धार्मिक आतंकवाद के लोग यह बड़ी चालाकी से कहते सुनाई देते हैं कि फलाना धर्म का अतिक्रमण बढ रहा है, फलाने धर्म को बचाना है । यह सब बकवास है ।
धर्म जब अन्ध विश्वास फैलाये, गरीबी बढाये, अशिक्षा बांटे, मानवता को तोडें और सीमित वर्ग और समुदायों को बढावा दें, तो वैसे धार्मिक अपाङ्गता से बचना बेहद जरुरी है । धर्म और धर्मान्धता के आधार पर अनावश्यक बच्चे पैदा करना, किसी समाज को हेय दृष्टि से देखना, धर्म के नाम पर आर्थिक शोषण करना कोई धर्म नहीं है ।
कैलाश महतो, नवलपरासी |

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