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मधेश क्यों पिछड़ रहा है ? : राकेश मिश्रा

 

मधेश की धीमी आर्थिक वृद्धि: केवल प्रदेश सरकार की विफलता या केंद्रित व्यवस्था की समस्या ?

काठमांडू, 21 मई। नेपाल के चालू आर्थिक वर्ष में की आर्थिक वृद्धि दर केवल 1.31% रहने का अनुमान लगाया गया है, जो पूरे देश में सबसे कम है। दूसरी ओर, भारत का पड़ोसी राज्य 8–9 प्रतिशत के आसपास की आर्थिक वृद्धि दर हासिल कर देश के तेज़ी से बढ़ते राज्यों में शामिल हो चुका है।

इस अंतर को लेकर नेपाल में कुछ अर्थशास्त्रियों और कथित बुद्धिजीवियों द्वारा मधेश प्रदेश सरकार और स्थानीय सरकारों को सीधे “असफल” घोषित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन क्या वास्तविकता इतनी सरल है?

विश्लेषकों का कहना है कि नेपाल की संघीय व्यवस्था अभी भी पूरी तरह व्यवहारिक रूप में लागू नहीं हो सकी है। आर्थिक नीति, उद्योग, राजस्व, सीमा प्रबंधन, ऊर्जा, भन्सार, परिवहन और बड़े विकास परियोजनाओं पर आज भी मुख्य नियंत्रण केंद्र सरकार और काठमांडू-केन्द्रित प्रशासनिक संरचना के हाथ में है। ऐसे में प्रदेश सरकारों को सीमित अधिकार और सीमित बजट के साथ विकास का पूरा दायित्व देना कई सवाल खड़े करता है।

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भौगोलिक और सामाजिक दृष्टि से बिहार और मधेश में कई समानताएँ हैं — कृषि आधारित अर्थव्यवस्था, बाढ़ की समस्या, श्रमिक पलायन और सीमावर्ती समाज। इसके बावजूद बिहार ने भारत सरकार के बड़े वित्तीय सहयोग, सड़क और विद्युत पूर्वाधार, औद्योगिक निवेश, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम और व्यापक नीतिगत अधिकारों के कारण तीव्र आर्थिक प्रगति हासिल की।

इसके विपरीत, मधेश नेपाल के सबसे अधिक राजस्व देने वाले क्षेत्रों में होने के बावजूद अपेक्षित सरकारी निवेश से वंचित रहा है। कृषि आधुनिकीकरण, सिंचाई, उद्योग, परिवहन और सीमा व्यापार पूर्वाधार में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी।

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आलोचकों का कहना है कि प्रदेश सरकारों को जिम्मेदारी तो दी गई, लेकिन संसाधन और अधिकार नहीं। आँकड़ों के अनुसार, प्रदेश सरकारों को कुल बजट का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा ही मिलता है, जबकि केंद्र सरकार 64 प्रतिशत और स्थानीय सरकारें 26 प्रतिशत बजट खर्च करती हैं। प्रति व्यक्ति बजट विनियोजन के मामले में भी मधेश प्रदेश सबसे पीछे बताया जाता है।

विश्लेषकों के अनुसार, केवल प्रदेश सरकार को दोष देना ऐसा है जैसे किसी ऐसे चालक को दुर्घटना का जिम्मेदार ठहराना जिसके पास न गाड़ी का मालिकाना हो, न स्टेयरिंग पर पूरा नियंत्रण और न ही ईंधन पर अधिकार। आर्थिक वृद्धि केवल राजनीतिक इच्छा से नहीं, बल्कि पूँजी, पूर्वाधार, नीतिगत स्वायत्तता और राज्य निवेश से तय होती है।

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विशेषज्ञ यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि यदि आगामी बजट में मधेश के लिए वस्तुगत आधार पर संसाधन परिचालन, उद्योग, कृषि और व्यापारिक पूर्वाधार पर ध्यान नहीं दिया गया, और सीमा क्षेत्रों में अनावश्यक सैन्यीकरण बढ़ाया गया, तो इसका दीर्घकालीन प्रभाव क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और सामाजिक-राजनीतिक स्थिरता पर पड़ सकता है।

मूल प्रश्न अब भी वही है — क्या नेपाल की संघीय व्यवस्था वास्तव में विकेन्द्रित हुई है, या सत्ता और संसाधनों पर अब भी काठमांडू का केंद्रीकृत प्रभुत्व कायम है?

राकेश मिश्रा के स्टेटस से साभार

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