जड़ को चेतन, चेतन को जड़ क्षण भर में कर देने वाले सदा तुम्हारी जय हो : प्रियांशी
सदा तुम्हारी जय हो
प्रियांशी
भक्तों का मन रखने वाले
अर्द्ध सिंह रूप धरने वाले
धर्म को स्थिर करने वाले
खंभ फाड़ प्रकट होने वाले
नरसिंह तुम कहलाने वाले
सदा तुम्हारी जय हो
प्रचंड रूप दिखाने वाले
हिरण्यकश्यप वध करने वाले
प्रहलाद की रक्षा करने वाले
भक्तों के आह्लाद बन जाते
अनाथों के नाथ बन जाते
नरसिंह तुम्हारी जय हो
क्रोधित मुखमंडल के पीछे
अपना प्रेम छुपाने वाले
क्रोध भरी लाल आंखों से
प्रेम के अश्रु बहाने वाले
जड़ को चेतन, चेतन को जड़
क्षण भर में कर देने वाले
सदा तुम्हारी जय हो



वाह वाह प्रियांशी जी. हमेशा की तरह आपकी होली पर लिखी कविता ‘ सदा तुम्हारी जय हो’ पसंद आई. एक ताजगी भरी यह प्रासंगिक भी है और ईश्वर के प्रति आपकी आस्था की अभिव्यक्ति भी. आप निरंतर लिखती व प्रशंसित होती रहें. मंगलकामनाएँ.