विक्रम साराभाई की आत्मा आज भी ‘इसरो’ को सही राह पर चलने की प्रेरणा दे रही है : तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा, ठोस सच्चाई यह है कि चंद्रयान 3 चांद के दक्षिणी ध्रुव पर विराजमान है। वहां लैंडर विक्रम मौजूद है और प्रज्ञान रोवर चांद पर चहलकदमी कर रहा है। दो सप्ताह यानी कि पूरे चौदह दिन विक्रम और प्रज्ञान आपस में भी बातें करते रहेंगे और ‘इसरो’ के वैज्ञानिकों के पास चित्र और डाटा भी भेजते रहेंगे। एक तसल्ली देने लायक बात यह है कि हर योजना की तरह इस योजना का नाम किसी राजनेता के नाम पर नहीं रखा गया… हमारे चंद्रयान 3 के लैंडर का नाम विक्रम है… विक्रम साराभाई की आत्मा आज भी ‘इसरो’ को सही राह पर चलने की प्रेरणा दे रही है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ‘इसरो’ की जो यात्रा बैलगाड़ी और साइकिल से शुरू हुई थी अंततः चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ़्ट लैंडिंग पर जाकर संपूर्ण हुई। एक तरह से यह किसी भी ऐसे वंचित की यात्रा से कम नहीं जो जीवन में ग़रीबी के अभिशाप से लड़ते हुए केवल अपने जीवट के बल पर आसमान की बुलंदियां छू लेता है।
1962 में डॉ. विक्रम ए. साराभाई की दूरदर्शिता पर भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (इन्कोस्पार) के नाम से भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया। फिर 15 अगस्त 1969 को वर्तमान ‘इसरो’ का गठन किया गया। इसने ‘इन्कोस्पार’ की जगह ली और 1972 में ‘इसरो’ को अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के तहत लाया गया।
साराभाई के पास गिने-चुने वैज्ञानिकों की टीम थी और पैसों की तंगी। साल भर बाद ही भारत ने पहला रॉकेट लॉन्च किया। उस रॉकेट के हिस्सों को साइकिल पर लादकर लॉन्च सेंटर तक पहुंचाया गया था। वह तस्वीर ऐतिहासिक थी। आज 2023 में हम चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अपने देश का झंडा लगाने वाला पहला देश बन गये हैं। यह ‘इसरो’ की आज तक की महानतम सफलता है, उसके वैज्ञानिकों की मेहनत का नतीजा है। ‘इसरो’ की कहानी भारत की कहानी है, अंतरिक्ष में उसकी महत्वाकांक्षाओं के विस्तार की कहानी है। इसरो का इतिहास भारत की अनंत जिज्ञासा का इतिहास है।
अंग्रेज़ी में एक कहावत है, “Today’s poetic imagination is tomorrow’s scientific truth!” यानी कि जो आज कवि की कल्पना है वो कल की वैज्ञानिक सच्चाई या उपलब्धि हो सकता है। कवि सदियों से चांद की बातें करता है; चंद्रलोक की यात्रा करता है। मगर हमारे वैज्ञानिकों ने आज हमें वहां ले जाकर खड़ा कर दिया है।
मगर सवाल यह खड़ा होता है कि आख़िर भारतीय चंद्रयान ने चांद तक पहुंचने में 42 दिन का लंबा समय क्यों लिया? जब अमरीका, चीन और रूस के स्पेसक्राफ़्ट इसके मुकाबले बहुत जल्दी वहां पहुंच जाते हैं। तो सरल भाषा में आप समझ लीजिये कि भारतीय रॉकेट हाई-स्पीड रॉकेट नहीं हैं। यदि बाक़ी तीनों देशों के रॉकेट बुलेट ट्रेन हैं तो हमारे रॉकेट पैसेंजर ट्रेन जैसे हैं

‘इसरो’ ने चंद्रयान और मंगल-यान मिशनों में मल्टी-स्टेप अप्रोच को अपनाया है। इससे वक्त ज़रूर अधिक लगता है लेकिन कम ताकतवर लॉन्च व्हिकल से भी काम चल जाता है। मिशन को अंजाम देने के लिए ‘इसरो’ के वैज्ञानिक धरती और चांद के गुरुत्वाकर्षण बल का इस्तेमाल करेंगे।
यहां ध्यान देने लायक बात यह भी है कि चंद्रयान-3 का 615 करोड रुपए का बजट हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘आदि पुरुष’ से भी कम है। ‘आदि पुरुष’ का बजट लगभग 700 करोड रुपए का था। इसके अलावा अन्य अंतरिक्ष आधारित फ़िल्मों का बजट भी काफ़ी ज्यादा होता है। अगर ध्यान से देखें तो ‘इंटरस्टेलर’ 1368 करोड रुपए बनी और ‘दि मार्शियन्स’ 885 करोड रुपए में। इस हिसाब से इसरो द्वारा जब कभी कोई अभियान अंतरिक्ष में भेजा जाता है वह अन्य देशों की एजेंसियों के मुकाबले बहुत कब होता है। यही नहीं अमरीका, रूस और चीन की अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थाओं का बजट भारत की इसरो के मुकाबले कई गुना अधिक है।
हमें याद है जब चंद्रयान-2 का अभियान अंतिम क्षणों में असफल हो गया था। चंद्रयान-2 के सफ़र के आखिरी पड़ाव में ‘इसरो’ सेंटर से संपर्क टूट गया था। चंद्रयान का लैंडर ‘विक्रम’ ब्रेक संबंधी प्रणाली में गड़बड़ी होने के कारण चंद्रमा की सतह से टकरा गया था। यह देखकर वैज्ञानिकों ही नहीं पूरे देश में भारी निराशा छा गई। ‘इसरो’ के तत्कालीन प्रमुख के. सिवन फूट-फूट कर रो पड़े थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें गले लगाकर पीठ सहलाते हुए सांत्वना दी थी। 7 सितंबर 2019 को सुबह-सुबह ही प्रधानमंत्री मोदी ने ‘इसरो’ में ही वैज्ञानिकों की हौसला अफज़ाई की थी।
इस बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने के लिये दक्षिण अफ़्रीका के दौरे पर थे जिस समय चंद्रयान 3 चांद पर अपने कदम रखने जा रहा था। वहां से उन्होंने इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए भारतीयों और ‘इसरो’ को बधाई दी। प्रधानमंत्री ने कहा, ”मेरे प्यारे परिवारजनों! जब हम अपनी आंखों के सामने ऐसा इतिहास बनते हुए देखते हैं तो गर्व होता है। ऐसी ऐतिहासिक घटनाएं राष्ट्र जीवन की चेतना बन जाती हैं। यह पल अविस्मरणीय है। यह क्षण अभूतपूर्व है। यह क्षण विकसित भारत के शंखनाद का है। यह क्षण नए भारत के जयघोष का है। यह क्षण मुश्किलों के महासागर को पार करने का है। यह क्षण जीत के चंद्रपथ पर चलने का है। यह क्षण 140 करोड़ धड़कनों के सामर्थ्य का है। यह क्षण भारत की नई ऊर्जा, नई चेतना का है। यह क्षण भारत के उदीयमान भाग्य के आह्वान का है। अमृत-काल की प्रथम प्रभा में सफलता की अमृत वर्षा हुई है। हमने धरती पर संकल्प लिया और चांद पर उसे साकार किया।”
उन्होंने आगे कहा, “आज के बाद से चांद से जुड़े मिथक बदल जाएंगे, कथानक भी बदल जाएंगे और नई पीढ़ी के लिए कहावतें भी बदल जाएंगी। भारत में तो हम सभी लोग धरती को मां कहते हैं और चांद को मामा बुलाते हैं। कभी कहा जाता था कि चंदा मामा बहुत दूर के हैं, अब एक दिन वो भी आएगा, जब बच्चे कहा करेंगे कि चंदा मामा बस एक टूर के हैं।”
भारत की इस महान उपलब्धि पर विश्व भर के समाचार पत्रों और समाचार चैनलों ने प्रसन्नता जताई और बधाइयां दीं। न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है, “चांद पर पहुंचने की रेस में भारत, दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में उतरने वाला पहला देश बन गया है। भारत के लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान बुधवार को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में उतरे हैं। भारत चंद्रमा के इस हिस्से में उतरने वाला पहला देश बन गया है और चांद पर उतरने वाला चौथा देश।”
अल जज़ीरा ने भी अपने समाचार पत्र में प्रमुखता से लिखा है कि भारत चांद पर पहुंच गया है। तुर्की के आधिकारिक न्यूज़ टीआरटी वर्ल्ड ने लिखा, “हिस्टॉरिक फ़ीट यानी कि ऐतिहासिक उपलब्धि!”
सीएनएन के अनुसार, भारत चंद्रमा पर अंतरिक्ष यान उतारने वाला चौथा देश बन गया है।
बीबीसी ने भी चंद्रयान तीन इवेंट का लाइव कवरेज किया। बीबीसी ने लिखा, “भारत ने इतिहास रच दिया। दक्षिणी ध्रुव के करीब चंद्रयान 3 की लैंडिंग कामयाब।“ पाकिस्तानी मीडिया ने भी भारत की इस कामयाबी को अखबारों की सुर्खियों का हिस्सा बनाया है।
पाकिस्तान के अखबार दि डॉन ने भी भारत की इस कामयाबी पर लिखा है, “हमारे पड़ोसी देश से बहुत बड़ी खबर आई है। भारत ने स्पेस सेक्टर में दुनिया के सामने ऐसी मिसाल कायम की है जिसको अब हर देश फॉलो करना चाहेगा। हम उन्हें शुभकामनाएं देते हैं।”
‘चंद्रयान-3’ का सफर दरअसल ‘चंद्रयान-1’ की सफलता के बाद शुरू हुआ। पहले चंद्र जांच से चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी का पता चला। इसका और अध्ययन करने के लिए चंद्रमा की सतह पर जाना जरूरी था, इसलिए चंद्रयान-2 मिशन की योजना बनाई गई। दुर्भाग्य से, चंद्रयान-2 चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने में विफल रहा; लेकिन इसरो के वैज्ञानिकों के हौसले पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।
हालांकि ‘चंद्रयान-2’ चंद्रमा पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया, लेकिन यह सफलतापूर्वक चंद्रमा की कक्षा में पहुंच गया। इस बात से ‘इसरो’ के वैज्ञानिक हैरान रह गए। इसलिए तीसरे चंद्रयान मिशन की तैयारी तुरंत शुरू कर दी गई। चंद्रयान को सॉफ्ट लैंडिंग और चंद्रमा की मिट्टी के अध्ययन के लक्ष्य के साथ लॉन्च किया गया था।
चंद्रयान-2 मिशन की विफलता से इसरो के वैज्ञानिकों ने सीख ली। यही कारण है कि चंद्रयान-3 मॉडल सफलता आधारित नहीं बल्कि विफलता आधारित है। पिछला चंद्रयान आखिरी कुछ मिनटों में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, इसलिए लैंडिंग के इस चरण के लिए चंद्रयान-3 में अतिरिक्त सावधानी बरती गई थी।
भारत की सफलता का श्रेय निश्चित रूप से पूरी तरह से इसरो के वैज्ञानिकों को जाता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष एस. सोमनाथ के साथ चंद्रयान-3 मिशन निदेशक मोहन कुमार, रॉकेट निदेशक बीजू सी. थॉमस की बड़ी हिस्सेदारी है।
इसरो के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, चंद्रयान-3 मिशन में 54 महिला इंजीनियरों और वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया था। वह ‘इसरो’ के विभिन्न विभागों में अलग-अलग स्थानों पर एक अधिकारी के रूप में काम कर रही हैं।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए दुनिया भर से भारत की सराहना हुई। नासा प्रशासक बिल नेस्लान, ब्रिटिश अंतरिक्ष एजेंसी, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और कई अन्य देशों ने इसरो और देश को बधाई दी।
मगर भारत के राजनीतिक नेताओं की चन्द्रायन 3 पर दी गई टिप्पणियां ख़ासा मनोरंजन करने वाली रहींकी सफलता का पूरा श्रेय उनको जाता है। वहीं भारतीय जनता पार्टी इस सफलता का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देना चाहती है।
सबसे अधिक हैरान कर देनी वाली प्रतिक्रिया तो बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार की रही… उनके चेहरे के भाव साफ़ बता रहे थे कि उन्हें चंद्रयान 3 के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी। पत्रकार को इस बारे में जवाब देने से पहले उन्होंने अपने सहायक की ओर मुंह करके कुछ पूछा और सहायक ने उनके कान में कुछ जानकारी दी। अंततः वह केवल इतना ही कह पाए, बढ़िया है अच्छी बात है…
ठोस सच्चाई यह है कि चंद्रयान 3 चांद के दक्षिणी ध्रुव पर विराजमान है। वहां लैंडर विक्रम मौजूद है और प्रज्ञान रोवर चांद पर चहलकदमी कर रहा है। दो सप्ताह यानी कि पूरे चौदह दिन विक्रम और प्रज्ञान आपस में भी बातें करते रहेंगे और ‘इसरो’ के वैज्ञानिकों के पास चित्र और डाटा भी भेजते रहेंगे। एक तसल्ली देने लायक बात यह है कि हर योजना की तरह इस योजना का नाम किसी राजनेता के नाम पर नहीं रखा गया… हमारे चंद्रयान 3 के लैंडर का नाम विक्रम है… विक्रम साराभाई की आत्मा आज भी ‘इसरो’ को सही राह पर चलने की प्रेरणा दे रही है।…


