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नेपाली साहित्य काे समृद्ध करने वाले प्रसिद्ध सिक्किमी लेखक सानु लामा का निधन

 

विराटनगर —

नेपाली साहित्य और संगीत के क्षेत्र में लंबे समय से योगदान दे रहे प्रसिद्ध सिक्किमी लेखक सानु लामा का भारत के सिलीगुड़ी में निधन हो गया।

85 वर्षीय लामा का शनिवार सुबह इलाज के दौरान निधन हो गया। कुछ दिन पहले पानी में भीगने के बाद बीमार पड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

15 जून, 1939 को सिक्किम में जन्मे लामा का असली नाम गदुल सिंह लामा था। हालाँकि, साहित्य में उन्हें सानु लामा के नाम से जाना जाता था।

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भारतीय नेपाली साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार, कवि और अनुवादक, वे पेशे से इंजीनियर थे। उनके तीन कहानी संग्रह, कथा सम्पदा (1971), जोगिका (1981) और मृगतृष्णा (1993) प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, असमिया और उड़िया में अनुवाद हो चुका है।

उन्हें 1993 में मृगतृष्णा कहानी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उनका आत्मकथात्मक उपन्यास ‘हिमालचुली मुंतिर’, यात्रा वृत्तांत ‘आँगन परितिर’, कविता संग्रह ‘जहाँ बागछा तीस्ता रा रंगित’, और धार्मिक अनुवाद ‘भगवान बुद्ध: जीवन रा दर्शन’ और ‘गुरु पद्मसंभव’ प्रकाशित हो चुके हैं।

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उन्हें सिक्किम भानु पुरस्कार, डॉ. शोकाकांति थेगिम स्मृति पुरस्कार और मदन व्याखनमाला पुरस्कार जैसे सम्मानों से भी सम्मानित किया गया है। 2005 में, उनके साहित्यिक योगदान के सम्मान में, उन्हें भारत सरकार द्वारा देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

‘बालपनको आँगन त्यागेरे…’ जैसे लोकप्रिय गीतों के रचयिता, लामा सिक्किम, दार्जिलिंग, दुआर्स, असम और अन्य क्षेत्रों के नेपाली भाषी समुदाय में अत्यधिक सम्मानित थे।

शब्दों, ध्वनियों और भावनाओं को कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करने में निपुण, लामा अपनी रचनाओं के माध्यम से नेपाली जनजीवन की भावनाओं को उजागर करने में माहिर थे।

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सिलीगुड़ी के साहित्यकार सुकराज दियाली ने कहा कि सैकड़ों कहानियों के माध्यम से नेपाली साहित्य के भंडार को समृद्ध करने वाले लामा के निधन से नेपाली साहित्य को अपूरणीय क्षति हुई है। उन्होंने कहा, “जीवन भर अपनी कलम और मंच के माध्यम से नेपाली चेतना और अस्मिता की आवाज़ बने लामा अब केवल स्मृतियों में ही रह गए हैं।”

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