पुनौराधाम जनकपुर वासियों के लिये प्रतिस्पर्धा नहीं एक अवसर है : कैलाश दास
कैलाश दास, जनकपुरधाम, १० अगस्त २०२५ ।
माता सीता के प्रकट स्थल के रूप में प्रसिद्ध भारत के बिहार राज्य, सीतामढ़ी ज़िले स्थित पुनौराधाम में भव्य मंदिर निर्माण की चर्चा इन दिनों जनकपुरधाम तक पहुँच चुकी है। इस विषय ने यहाँ के नागरिकों, धार्मिक समाज और बुद्धिजीवियों के बीच विभिन्न तरह की प्रतिक्रियाएँ जन्म दी हैं। कोई इसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गौरव का अवसर मानता है, तो किसी के मन में गहरी निराशा और चिंता है। विशेषकर, जनकपुरधाम से भी बड़ा मंदिर पुनौराधाम में बनने के बाद यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या घटने का आशंका कुछ लोगों में प्रबल है। लेकिन दूसरी ओर, बहुतों का विश्वास है—सीता के मायके में आने वाले तीर्थयात्री स्वाभाविक रूप से जनकपुरधाम भी आएँगे, इसलिए इसे प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि अवसर के रूप में देखना चाहिए।
पुनौरा में 50 एकड़ क्षेत्र में 8 करोड़ 83 लाख भारतीय रुपये की लागत से भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है। भारत के गृह मंत्री अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के संयुक्त शिलान्यास ने इसके महत्व और भव्यता का संकेत दिया है। धार्मिक, ऐतिहासिक और पर्यटन दृष्टि से भारत सरकार का यह निवेश सराहनीय है। यह न केवल पुनौराधाम बल्कि संपूर्ण मिथिला क्षेत्र के धार्मिक मानचित्र में नई ऊर्जा का संचार करेगा।
इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता, लेकिन उसे प्रभावित करने का प्रयास अवश्य किया जा सकता है। रामायण कालीन ग्रंथों के प्रमाण अनुसार माता सीता का प्रकट स्थल पुनौरा ही है, यह दावा प्राचीन काल से होता आ रहा है। लेकिन इस विषय पर विवाद और बहस भी उतनी ही पुरानी है। जनकपुरधाम के लिए इस समय मुख्य प्रश्न यह है—क्या हम इस अवसर को प्रतिस्पर्धा और भय के रूप में लेंगे, या सहयोग और विकास की संभावना तलाशेंगे? जनकपुरधाम की धार्मिक महत्ता और ऐतिहासिक पहचान को और प्रभावशाली ढंग से विश्व के सामने कैसे प्रस्तुत किया जाए, इस पर बहस केंद्रित होना आवश्यक है।
अयोध्या का उदाहरण हमारे सामने है—भगवान राम की जन्मभूमि पर अरबों के निवेश से बना भव्य मंदिर आज विश्वभर के श्रद्धालुओं का गंतव्य बन चुका है। उसके बाद भारत सरकार ने सीता के प्रकट स्थल पुनौरा में निवेश किया है। हम प्रायः भारत द्वारा नेपाल संबंधी कार्यों की आलोचना करने में तत्पर रहते हैं, लेकिन वहाँ की योजनाबद्धता, धार्मिक पर्यटन को आर्थिक विकास से जोड़ने की क्षमता और धरोहर के उपयोग के उपायों से सीखने की बात उपेक्षित रह जाती है।
जनकपुरधाम कोई साधारण शहर नहीं है—यह राजा जनक की राजधानी, ज्ञान और तप की भूमि, सीता का मायका, और राम–सीता विवाह का ऐतिहासिक रंगमंच है। लेकिन विडंबना यह है कि इसकी कथा हम पूरी तरह से संसार को सुना नहीं पाए हैं। जानकी मंदिर की भव्यता आँखों को लुभाती है, लेकिन पर्यटकों के हृदय को बाँधने के लिए यहाँ और अधिक कथाएँ और स्थल आवश्यक हैं।
हमें आज आवश्यकता है—राजा जनक के दरबार का पुनर्निर्माण, राम–सीता के स्वयंवर स्थल का पुनःस्थापन, ऋषियों–मुनियों की तपोभूमियों की खोज और विकास, तथा मिथिला के प्राचीन मठ–मंदिर और सरोवरों का संरक्षण। जब ये धरोहरें जीवंत होंगी, तब पुनौराधाम पहुँचे तीर्थयात्री जनकपुरधाम भी श्रद्धा और उत्सुकता के साथ घूमेंगे। अन्यथा, हमारा इतिहास केवल पुस्तकों के पन्नों तक सीमित रह जाएगा।
सोशल मीडिया पर पुनौरा मंदिर को लेकर बहस करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन केवल शब्द पर्याप्त नहीं—उसे व्यवहार में उतारने की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। यह दायित्व सिर्फ संघ, प्रदेश और स्थानीय सरकार का नहीं, बल्कि जनकपुरवासियों का भी है। नागरिक सचेत और सक्रिय हों, तो अयोध्या, बैद्यनाथधाम या पुनौराधाम आने वाले तीर्थयात्रियों को यहाँ तक लाना कठिन नहीं होगा। लेकिन इसके लिए केवल जानकी मंदिर पर्याप्त नहीं—जनकपुरधाम को जीवित इतिहास का संग्रहालय बनाना आवश्यक है।
साल 2020 की कोरोना महामारी ने विश्व अर्थव्यवस्था को हिला दिया। अन्य स्थान धीरे–धीरे संभल गए, लेकिन जनकपुरधाम का व्यापार अब तक पूरी तरह उठ नहीं पाया है। धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन का विकास ही इस शहर के आर्थिक पुनर्जागरण का मुख्य आधार बन सकता है। मधेश प्रदेश की राजधानी के रूप में इसे राजनीतिक महत्व तो मिला है, लेकिन राज्य का हृदय बनने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। संघ, प्रदेश और स्थानीय सरकार यदि वार्षिक बजट का एक हिस्सा जनकपुरधाम के धार्मिक–पर्यटन ढाँचे में निवेश करे, तो इस शहर को विश्वस्तरीय गंतव्य बनाने की संभावना प्रबल है।
इसलिए, पुनौराधाम में मंदिर निर्माण को आत्मसम्मान और प्रेरणा की दृष्टि से देखना चाहिए। सीता के प्रकट स्थल और मायके के बीच सहयोग का पुल बनाकर दोनों के हित में आगे बढ़ना होगा। जनकपुरधाम को अपनी पहचान को और स्पष्ट, समृद्ध और आकर्षक बनाने के लिए अभी से पहल करनी होगी। आज की उदासीनता कल के पछतावे को जन्म देगी, लेकिन आज की सक्रियता कल का गौरव रचेगी। सहयोग की यात्रा के माध्यम से ही जनकपुरधाम और पुनौराधाम, दोनों मिथिला के गौरवशाली रत्न बन सकते हैं।

जनकपुरधाम

