नवरात्रि का तीसरा दिन, माँ चंद्रघंटा की पूजा
काठमांडू, आश्विन ८ –
‘या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा अराधना की जाती है ।
मार्कण्डेय पुराण में उल्लेख है कि ‘चन्द्रः घंटायां यस्यः स’, देवी चंद्रघंटा अपने सिर पर अर्धचंद्र और घंटा धारण करती हैं । माँ चंद्रधंटा के माथे पर घंटे के आकार का चंद्रमा है, इसलिए इनका नाम चंद्रघंटा है । इन्हें संतुष्टि की देवी माना गया है । जीवन में सफलता के साथ शांति का अनुभव तब तक नहीं हो सकता है, जब तक कि मन में संतुष्टि का भाव ना हो।
माँ चंद्रघंटा को ज्ञान और तप की देवी भी माना गया है । आध्यात्मिक गुरु पंडित कमला पति त्रिपाठी प्रमोद कहते हैं कि भागवत पुराण के अनुसार मां चंद्रघंटा का रूप अत्यंत शांत, सौम्य और ममतामयी है।
माँ चंद्रघंटा का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। माता के तीन नैत्र और दस हाथ हैं। इनके कर–कमल गदा, बाण, धनुष, त्रिशूल, खड्ग, खप्पर, चक्र और अस्त्र–शस्त्र हैं, अग्नि जैसे वर्ण वाली, ज्ञान से जगमगाने वाली दीप्तिमान देवी हैं चंद्रघंटा। ये शेर पर आरूढ़ है तथा युद्ध में लड़ने के लिए उन्मुख है।
मां चंद्रघंटा का स्वरूप अत्यंत अलौकिक और भव्य माना जाता है। उनका रूप शांतिपूर्ण होने के साथ–साथ उनकी शक्ति भी अद्वितीय है, जो हर क्षेत्र में सफलता और समृद्धि प्रदान करती है।
मां चंद्रघंटा को पीला रंग अत्यंत प्रिय है इसलिए पूजा में लाल व पीले रंग के फूलों का प्रयोग करना चाहिए ।

