महात्मा गांधीजी युगपुरूष थे और वे आज भी प्रासंगिक है – डाॅ.राजेंद्र खटाटे
महाराष्ट्र के संभाजी नगर (पाचोड ) में शिवछत्रपति महाविद्यालय के राज्यशास्र विभागद्वारा “गांधीजी जीवन दर्शन तथा प्रासंगिकता” इस विषय पर चर्चासत्र महात्मा गांधीजी की जयंती पर आयोजित किया गया।इस चर्चासत्र में डाॅ.राजेंद्र खटाटे,मनीषा खटाटे और डाॅ.रावसाहेब ढवळे इन्होंने सहभाग लिया।इस कार्यक्रम के अध्यक्ष महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ.चंद्रसेन कोठावळे थे।
डाॅ.राजेंद्र खटाटे जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि गांधीजी एक युग है,
गांधीजी एक अस्तित्व है,गांधीजी एक सत्य,अहिंसा की धारणा है,
गांधीजी एक जीवन दर्शन है,जीवन प्रणाली है,गांधीजी एक राजनीति और अध्यात्म का सेतू है,गांधीजी एक सत्य का प्रयोग है,
जिससे हम आज एआय के जमाने में भी अपने जीवन को सत्य की राह पर ले जा सकते है।गांधीजी आज भी रिलेव्हंन्ट या समसामायिक क्यों है?कारण जहाँ पर एआय रूक जायेगी,जीवन मौन होने लगेगा,अस्तित्व शून्य हो जायेगा तब हमें गांधीजी की जरूरत महसूस हो जायेगी।हम गांधीजी से सीख भी सकते है और क्या नहीं करना है वह भी सीख सकते है।हमें कभी भी “मजबुरी का नाम महात्मा गांधी” नहीं बनना चाहिए। अगर इतना भी किसीने सीख लिया तो भी गांधीजी को सच्चे मन से याद करने जैसा है।
“हम हर दिन जीते हैं, काम करते हैं, सपने देखते हैं। लेकिन क्या किसी ने कभी यह सोचा है कि ‘अस्तित्व’ का मतलब ही क्या है?”हम गांधीजी की परिभाषा में जीवन को जी सकते है या हमारे अस्तित्व का अर्थ ढूँढ सकते है।सत्य,अहिंसा,सत्याग्रह,धर्मनिरपेक्षता अथवा प्रकृति के समीप रहकर जीवन जी लेना,इसको हम हमारे जीवन में कृति में ला सकते है।
सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार मनीषा खटाटे ने अपनी कथा,”गांधीजी से महात्मा बनने की कथा” में द.अफ्रिका में गांधीजी ने टाॅलस्टाॅय फार्म में जो मानवता का प्रयोग किया था उसकी कथावस्तु रखी है और उनके गांधीजी एक मनुष्य से महात्मा बनने का जो सफर था उसको याद किया।
डाॅ.रावसाहेब ढवळे अपना मत व्यक्त करते हुए कहते है कि गांधीजी एक जीवनपद्धती है। शिव छत्रपति महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ.चंद्रसेन कोठावळे जी एक प्रसिद्ध शिक्षाविद होने के नाते शिक्षा को रचनात्मकता की ओर ले जाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते है।शिक्षा को व्यवहार और रचनात्मकता से ज़ोडना चाहिए ऐसा उन्होने कहा। इस कार्यक्रम को सफ़ल बनाने के लिए विभागाध्यक्ष प्रा.डाॅ.सुभाष पोटभरे तथा प्रा.डाॅ.विलास महाजन ने प्रयास किया।


