ओली-लेखक की गिरफ्तारी पर सुरक्षा प्रमुखों की चेतावनी: संयम से कदम उठाए सरकार

काठमांडू, ८ ऑक्टोबर ०२५ । नेपाल की राजधानी काठमांडू में प्रधानमंत्री निवास बालुवाटार में सोमवार रात से लेकर मंगलवार तड़के तक चली पाँच घंटे की उच्चस्तरीय बैठक में देश की संवेदनशील राजनीतिक व सुरक्षा स्थिति पर गहन चर्चा हुई।
मुख्य विषय था — पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक की गिरफ्तारी का सवाल — जिसे लेकर जेन–जी आंदोलन और सोशल मीडिया पर तीव्र दबाव बढ़ा हुआ है।
बैठक में क्या हुआ?
प्रधानमंत्री सुशीला कार्की, गृह मंत्री ओमप्रकाश अर्याल, सेना, नेपाल प्रहरी (पुलिस), सशस्त्र प्रहरी बल और खुफिया निकायों के प्रमुखों की उपस्थिति में हुई इस बैठक में,
- ओली और लेखक की गिरफ्तारी से पैदा होने वाले संभावित हालात,
- आगामी २१ फागुन (मार्च ५, २०२६) को होने वाले प्रतिनिधि सभा चुनाव की तैयारी,
- और देश में धार्मिक सद्भाव पर बढ़ते खतरे पर चर्चा की गई।
सुरक्षा प्रमुखों ने सरकार को स्पष्ट सुझाव दिया —
“कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना गिरफ्तारी की जल्दबाजी राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और चुनावी संकट को जन्म दे सकती है। सरकार को संयम और प्रतीक्षा की नीति अपनानी चाहिए।”
“पकड़ो या मत पकड़ो — दोनों ही हालात जोखिमपूर्ण”
एक सुरक्षा अधिकारी ने कान्तिपुर से बताया,
“प्रधानमंत्री कार्की पर ओली और लेखक को गिरफ्तार करने का भारी दबाव है — मेयर बालेन शाह, जेन-जी आंदोलनकारी और यहाँ तक कि मंत्रिपरिषद के कुछ सदस्य भी यही मांग कर रहे हैं।
लेकिन गिरफ्तारी करने या न करने — दोनों ही स्थितियों में राजनीतिक तनाव और सड़कों पर टकराव की संभावना है।”
गृह मंत्री ओमप्रकाश अर्याल ने भी कहा कि कानूनी दायरे में न आने वाली कार्रवाई से “रक्तपात और चुनावी माहौल के बिगड़ने” का खतरा है।
उन्होंने सुझाव दिया कि पूर्व न्यायाधीश गौरीबहादुर कार्की की अध्यक्षता में गठित जाँच आयोग की रिपोर्ट आने तक कोई भी गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए।
सुरक्षा निकायों की एकजुट राय
नेपाल प्रहरी प्रमुख चन्द्रकुवेर खापुङ और सशस्त्र प्रहरी प्रमुख राजु अर्याल ने गृह मंत्री के विचार का समर्थन किया।
खापुङ ने सवाल उठाया —
“अगर किसी की शिकायत पर हम आज पूर्व प्रधानमंत्रियों को गिरफ्तार करते हैं, तो कल मौजूदा मंत्रियों और अधिकारियों के खिलाफ शिकायत आए तो क्या करेंगे?”
प्रधानसेनापति अशोकराज सिग्देल ने भी चेतावनी दी कि अस्थिर राजनीतिक माहौल में “धार्मिक और सामाजिक तनाव भड़काने वाले तत्व” सक्रिय हो सकते हैं।
बालेन-सुदन पर भी सवाल
बैठक में यह मुद्दा भी उठा कि यदि आज ओली और लेखक की गिरफ्तारी को जायज ठहराया जाए, तो कल मेयर बालेन शाह के पुराने सोशल मीडिया पोस्ट (“सिंहदरबार जलाना चाहिए”) के आधार पर उनके खिलाफ भी शिकायत दर्ज हो सकती है।
स्रोतों के अनुसार, अधिकारियों ने कहा कि “ऐसे कदम सरकारी तंत्र का मनोबल तोड़ सकते हैं।”
चुनावी माहौल पर चिंता
चुनाव आयोग पहले ही २१ फागुन को प्रतिनिधि सभा चुनाव की घोषणा कर चुका है।
सुरक्षा प्रमुखों का विश्लेषण था —
“बिना राजनीतिक दलों के सहयोग के चुनाव नहीं हो सकता। अगर इस समय बड़े दलों को नाराज़ किया गया, तो मतदान प्रक्रिया ही संकट में पड़ सकती है।”
धार्मिक तनाव और बाहरी एजेंडों की चेतावनी
बैठक में हाल ही में जनकपुर (धनुषा) में हुई हिंदू–मुस्लिम झड़प और नेपालगंज की नाजुक स्थिति पर भी चर्चा हुई।
अधिकारियों ने आशंका जताई कि छठ पर्व के बाद विभिन्न समूह, जिनमें दुर्गा प्रसाई समर्थक संगठन भी शामिल हैं, सड़कों पर उतर सकते हैं — और यह स्थिति देशव्यापी टकराव में बदल सकती है।
फिलहाल “पर्ख र हेर” (Wait and Watch) नीति
रातभर चली चर्चा के बाद कोई ठोस निर्णय नहीं हुआ।
बैठक के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार,
“प्रधानमंत्री कार्की और गृह मंत्री अर्याल ने स्पष्ट कहा कि बिना कानूनी आधार के गिरफ्तारी नहीं होगी। सरकार अभी ‘पर्ख र हेर’ — यानी मध्यमार्गी और संयमित नीति — पर चलेगी।”
इसी अनुसार, मंगलवार को पुलिस ने जेन-जी समूह द्वारा दी गई शिकायत स्वीकार तो की, लेकिन उसे दर्ज न कर कार्की आयोग को भेज दिया।
जेन-जी आंदोलन की पृष्ठभूमि
भदौ २३ (8 सितंबर) को जेन-जी आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में 21 युवाओं की मौत हुई थी।
अगले दिन प्रदर्शन और हिंसा भड़क उठी —
संसद भवन, सिंहदरबार, सर्वोच्च अदालत, प्रदेश व स्थानीय कार्यालयों पर हमले हुए,
और कुल मिलाकर 75 से अधिक लोगों की जान गई।
इन घटनाओं ने नेपाल की राजनीति में गहरी दरार पैदा कर दी है — एक ओर “जेन-जी” युवा आंदोलन है, दूसरी ओर पुरानी राजनीतिक संरचनाएँ, जो अब सीधी टकराहट की ओर बढ़ रही हैं।
गौरव पोखरेल की रिपोर्ट पर आधारित,

