जलवायु अन्याय का शिकार नेपाल: धुआं किसी और का, सांसें हमारी ! : कृतिका यादव
कृतिका यादव, काठमांडू, 4 सितम्बर। वर्ल्ड बैंक (World Bank Group) की आधिकारिक रिपोर्ट स्पष्ट रूप से मानती है कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल का योगदान महज 0.1% (यानी नगण्य / Negligible Contributor) है। लेकिन अफ़सोस, पर्यावरण संरक्षण के प्रति इस निष्ठा का इनाम नेपाल को भयानक तबाही, आंसुओं और मासूम मौतों के रूप में मिला है।
26 अगस्त 2026 की वह काली तारीख़ नेपाल के इतिहास में कभी न मिटने वाले ज़ख्म छोड़ गई। रसुवा के दुर्गम शिखरों से लेकर उफनती त्रिशूली नदी के उग्र प्रवाह तक, प्रकृति के तांडव ने सैकड़ों मासूम जिंदगियों को लील लिया। भरभराकर गिरते पहाड़, मलबे में तब्दील होते गांव, अपनों से बिछड़ते बिलखते मासूम बच्चे और बेबस मां-बाप का करुण क्रंदन—यह केवल एक प्राकृतिक हादसा नहीं है। यह उन तमाम विकसित और शक्तिशाली देशों के ‘जलवायु अपराध’ (Climate Crime) का वह भयावह मंज़र है, जिसकी कीमत मात्र 0.1% प्रदूषण फैलाने वाला एक निर्दोष राष्ट्र अपनी जान देकर चुका रहा है।
*प्रकृति का उपासक और हरित संस्कृति: नेपाल का चुनाव*
इतिहास गवाह है कि नेपाल की पावन धरा हमेशा से सहअस्तित्व और पर्यावरण-संरक्षण की समर्थक रही है। यह शांति-दूत भगवान बुद्ध का देश है और माता सीता की पावन जन्मस्थली है—जिसकी आत्मा में सहिष्णुता और ‘जियो और जीने दो’ का दर्शन रचा-बसा है।
हमने कभी अपनी ज़मीन पर धुएं उगलती विशाल फ़ैक्टरियों का जाल नहीं बिछाया, न ही विकास के नाम पर अपने जंगलों की अंधी कटाई की और न ही अपनी पावन नदियों में जहरीला औद्योगिक कचरा बहाया। नेपाल ने हमेशा हरित ऊर्जा और वनों के संवर्धन पर ही भरोसा किया।
नेपाल के जन-जीवन में सौर ऊर्जा (Solar Energy) की बहुत बड़ी भूमिका है। पानी गर्म करने से लेकर घरेलू बिजली तक के लिए हर घर की छतों पर सोलर पैनल्स लगे हुए हैं। इसके साथ ही नेपाल ने अपनी सड़कों पर 60 से 70 प्रतिशत तक बैटरी से चलने वाले ई-वाहनों (EVs) को उतारा, ताकि पेट्रोल-डीजल का उपयोग घटे और कार्बन उत्सर्जन न्यूनतम रहे। जिस देश ने सोलर एनर्जी, पनबिजली (Hydropower) और प्रदूषण-मुक्त जीवनशैली को अपना धर्म माना, उसी देश को आज प्रकृति के विनाश का पहला शिकार बनना पड़ा।
*कुदरत का अलार्म: तराई का सूखा, पहाड़ की तपन और पिघलते ग्लेशियर*
इस तबाही से ठीक पहले प्रकृति ने हमें स्पष्ट संकेत और चेतावनी दी थी, जिसे दुनिया के नीति-नियंताओं ने अनसुना कर दिया। सावन-भादों के वे महीने, जो नेपाल में पारंपरिक रूप से झमाझम बारिश और हरियाली के लिए जाने जाते हैं, इस बार पूरी तरह शुष्क रहे।
तराई के इलाकों में खेत सूखे पड़ गए और भूजल स्तर (Water Level) चिंताजनक हद तक नीचे चला गया। पहाड़ों और हिमालयी क्षेत्रों में भी बारिश का नामोनिशान नहीं था। सावन-भादों में बारिश का गायब होना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि ग्लोबल वार्मिंग किस विकराल रूप में दस्तक दे चुकी है।
पहाड़, तराई और हिमालय—तीनों ही क्षेत्र अप्रत्याशित गर्मी और तपन से ‘त्राहिमाम-त्राहिमाम’ कर उठे। कुदरत चिल्ला-चिल्लाकर आगाह कर रही थी कि संतुलन बिगड़ चुका है। उसी बेलगाम गर्मी और बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण अंततः हमारे संवेदनशील ग्लेशियर पिघले और फटे, जिसने त्रिशूली नदी में विनाशकारी सैलाब ला दिया।
*दूसरों के पापों की सजा भोगता बेकसूर नेपाल*
आज पूरी दुनिया के सामने एक कड़वा और तीखा सवाल खड़ा है—वर्ल्ड बैंक के आधिकारिक डेटा के मुताबिक जिस नेपाल का कुल वैश्विक उत्सर्जन में योगदान मात्र 0.1% है, उसे यह मौत की सजा क्यों?
जिन लोगों की जीवनभर की जमा-पूंजी और आशियाने पानी में बह गए, जिनके हाथ से उनके कलेजे के टुकड़े छिन गए और पूरे के पूरे परिवार उजड़ गए, उनका रुदन और सिसकियां तो अब ताउम्र कभी बंद नहीं होंगी। वे जीवन के हर मोड़ पर शून्य में निहारते हुए पूरी दुनिया से बस यही पूछेंगे कि “हमारा कसूर क्या था? हमने तो केवल 0.1% धुआं दिया, फिर 100% तबाही हमें ही क्यों भुगतनी पड़ रही है?”
सच यह है कि अमेरिका, चीन, भारत जैसे दुनिया के बड़े औद्योगिक देश—जिन्होंने अंधी आर्थिक प्रतिस्पर्धा में कार्बन का अंबार लगाया, युद्ध लड़े और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचाया—आज उनके फैलाए प्रदूषण का ख़ामियाज़ा नेपाल के निर्दोष लोग अपनी जान और सर्वस्व देकर भुगत रहे हैं। त्रिशूली नदी में आया उफान सिर्फ़ पानी का नहीं था, बल्कि वह बड़े देशों के घमंड, बेपरवाही और औद्योगिकीकरण का वह कचरा था जो बेबस नेपालियों की खुशियों को बहा ले गया।
*सांत्वना नहीं, ‘क्लाइमेट जस्टिस’ (जलवायु न्याय) चाहिए*
हमारे घर तबाह हो गए, बुनियादी ढांचा नष्ट हो गया, मासूमों के सिर से माता-पिता का साया उठ गया और सबसे बढ़कर, एक शांतप्रिय समाज से उसका जीने का मौलिक अधिकार छीन लिया गया। यह शोषण का कौन-सा नया वैश्विक स्वरूप है जहाँ अपराध कोई और करे और उसका कफ़न कोई और ओढ़े?
अब अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में खोखले वादों का दौर बंद होना चाहिए। जो देश दुनिया के ‘चौधरी’ बनकर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं, उन्हें नेपाल के इस बहते खून, आंसुओं और कभी न थमने वाले रुदन का जवाब देना होगा। नेपाल को दया या सांत्वना नहीं, बल्कि ‘क्लाइमेट जस्टिस’ (जलवायु न्याय) और ‘हानि एवं क्षति मुआवजा’ (Loss & Damage Compensation) चाहिए।
त्रिशूली का मटमैला पानी आज सिर्फ़ गाद लेकर नहीं बह रहा, बल्कि वैश्विक समुदाय के ज़मीर पर एक कभी न मिटने वाला धब्बा छोड़ रहा है। अगर विश्व अब भी अपनी जिम्मेदारियों से मुकरा, तो बुद्ध की यह शांत भूमि कल पूरे संसार के विवेक पर एक बहुत बड़ा सवाल बनकर खड़ी रहेगी।




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