गीतायन : लोकछंदों में श्रीमद्भगवद्गीता का काव्यात्मक पुनर्पाठ: “श्रीमद्भगवत गीता हिन्दी मे
छन्दन दोहा चौपाई में।
भटके राही को दिशा मिली,
पथ है श्री कृष्ण दुहाई में।।”
आदरणीय मनीषी श्री विश्वंभर प्रसाद मिश्र जी के द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के भावानुवाद पर संक्षिप्त आलोचनात्मक समीक्षा:
लेखक परिचय (कृति-रचयिता)
भारत मध्यप्रदेश उमरिया ’भरेवा’ निवासी ’श्री विश्वंभर प्रसाद मिश्र’ समकालीन हिंदी साहित्य के ऐसे रचनाकार हैं, जिनकी काव्य-दृष्टि परंपरा, दर्शन और लोक संवेदना के संतुलित समन्वय का प्रयागराज है। ’गीतायन’ में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों को हिंदी के लोकप्रचलित छंद–दोहा और चौपाई में रूपांतरित कर गीता-अनुवाद की परंपरा को एक नवीन दिशा प्रदान की है।
दोहा- कुरुक्षेत्र जोरी अनी, रण हित दोउ दल आय।
मम सुत पान्डव सुतन कस, राखेउ समर उपाय ।।३।।
चौ.- संजय कहहु हमहि समुझाई। करत काह रण खेतहिं जाई।।
सुनि संजय नृप वर की बानी। कहन लगे कुरुक्षेत्र कहानी।।
भूमिका: भारतीय दार्शनिक परंपरा में “श्रीमद्भगवद्गीता” का स्थान एक सार्वकालिक जीवन-दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित है। गीता न केवल धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि कर्म, ज्ञान और भक्ति के माध्यम से मानव-जीवन को संतुलित दृष्टि प्रदान करने वाला दार्शनिक शास्त्र है। हिंदी में गीता के अनेक गद्य और पद्य अनुवाद उपलब्ध हैं, किंतु श्री विश्वंभर प्रसाद मिश्र जी के द्वारा रचित “गीतायन” अपनी “लोकछंदात्मक संरचना” के कारण विशिष्ट महत्व रखता है।
’गीतायन’ शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि “भावानुवाद” है। इसका उद्देश्य गीता के गूढ़ दार्शनिक तत्वों को सामान्य पाठक के लिए सहज, स्मरणीय और आत्मीय बनाना है। दोहा और चौपाई जैसे छंद भारतीय लोकचेतना में पहले से रचे-बसे हैं। इन्हीं छंदों में गीता का अनुवाद कर कवि ने दर्शन को जनभाषा के धरातल पर स्थापित किया है। यह प्रयास गीता को अध्ययन की वस्तु तक मात्र सीमित न रखकर ’अनुभूति और आचरण’ में उतारने के लिए अभिप्रेरित करता है।
“जिन अस बुधि आतम अविनाशी। सो मारय मरिबो कस भाषी।।
बसन जीर्ण तजि नूतन लेई। तस आतम देहिन तजि देई।।”
छंद-विन्यास और काव्य-शिल्प: दोहा और चौपाई का चयन अत्यंत सार्थक है। दोहा अपने सूत्रात्मक स्वभाव के कारण कर्मयोग, निष्काम कर्म और आत्मा की नित्यता जैसे सिद्धांतों को संक्षेप में व्यक्त करता है, जबकि चौपाई भाव-विस्तार, संवाद और उपदेशात्मक प्रवाह के लिए उपयुक्त छंद सिद्ध होती है। मिश्र ने छंदों की सीमाओं में रहते हुए भी गीता के मूल भाव को सुरक्षित रखा है। छंद की लय और संगीतात्मकता पाठक को सहज रूप से ग्रंथ से जोड़ती है।
“पारथ सुन तोहि परम विभूती। दिख रावउं स्वरूप करतूती।।
सागर सदृश वरण जिन नाना। शत सहस्त्र वपु दिव्य निधाना।।
द्वादश अदिति सुवन वसु आठा। ग्यारह रुद्र देव सक ठाटा॥
जो नहि सुनेउ न देखेउ नयना। सब देखिहहु मम रूप सुचयना।।
दोहा – जो देखन चाहहु मुदित, सो सब लेहु बिलोकि।
आजहु और भविष्य मह, चाहहूं तन अवलोकि।।”
दार्शनिक निष्ठा: गीतायन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दार्शनिक निष्ठा है। अनुवाद में गीता के केंद्रीय सिद्धांत– निष्काम कर्म, आत्मा की अविनाशिता, समत्व-बुद्धि, और भक्ति की सहजता— स्पष्ट रूप से उभरते हैं। कवि ने न तो दर्शन को अत्यधिक सरल किया है, न ही उसे दुरूह बनाए रखा है। यह संतुलन कृति को विश्वसनीय और प्रभावी बनाता है।
“बुद्धिवंत यह जानइ ताता। आत्म मरत नहि मारत गाता।।
नहि जन्मत नहि कालहु खाई। नस न सनातन देह बुझाई।।
*कटे शस्त्र नहिं पावक जरई। शोष न मरु तन जल तर करई।।
सूरवर करइ न भाजन दाहू। आतम थिर ब्यापक बपु बाहू।।”
भाषा और लोकसंवेदना: कृति की भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी लोक सुलभ हिंदी है। चौपाइयों में अवधी-ब्रज की अनुगूंज दिखाई देती है, जो तुलसी परंपरा की स्मृति कराती है। भाषा में न तो कृत्रिम पांडित्य है, न ही सतही सरलता। यही कारण है कि ’गीतायन’ सामान्य पाठक और साहित्यिक अध्येता—दोनों के लिए उपयोगी बन जाता है।
“निज कर्तव्य कर्म आचरणा। पर कर्महि कर्तब नहि शरणा।।
करइ स्वभाव नियत निज कर्मा। परइ न पाप नीति अस धर्मा।।
धूमा वरण ढॉक जिमि आगी। कर्म दोष आवृत तिमि जागी।।
दोषहु युत निज करम न त्यागा।कहइ नीति अस करम बिरागा।।”
परंपरा और नवाचार: गीता के काव्यानुवाद की दीर्घ परंपरा में ’गीतायन’ का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह लोकछंदों की प्रासंगिकता को पुनः आनंददायक और प्रभावकारी ढंग से स्थापित करता है। आधुनिक समय में जहाँ मुक्तछंद और गद्य अनुवाद प्रचलित हैं, वहाँ यह कृति परंपरागत छंदों के माध्यम से नवाचार प्रस्तुत करती है। यह परंपरा से विमुखता नहीं, बल्कि उसका सृजनात्मक विस्तार है।
“जो न अघात बढ़त क्षण पाई। प्रबल पाप रिपु ताप नसाई।।
धूम अगिनि दर्पण मल छाई। जालहि गर्भ आवरण पाई।।”
आलोचनात्मक दृष्टि: आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो छंदों की सीमा के कारण कहीं-कहीं दार्शनिक जटिलता का संक्षेप हो गया है। गहन अकादमिक शोध के लिए यह ग्रंथ प्राथमिक संदर्भ नहीं, बल्कि सहायक-पाठ के रूप में अधिक उपयोगी है। तथापि, इसका उद्देश्य व्याख्या करना नहीं, अनुभूति कराना है। और इस दृष्टि से कृति अत्यधिक सफल है।
निष्कर्ष: “गीतायन” श्रीमद्भगवद्गीता का केवल हिंदी अनुवाद नहीं, बल्कि उसका लोकछंदों में काव्यात्मक पुनर्जन्म है। ८१ वर्षीय जीवंत महर्षि आदरणीय श्री विश्वंभर प्रसाद मिश्र ने दर्शन और काव्य, शास्त्र और लोक के बीच एक सशक्त सेतु निर्मित किया है।
“महावाह अर्जुन सुनहुँ, जेहिं सुनि आनन्द होय।
मानउ प्रिय कल्यान हित, आगिल भाषउँ सोय।।
जान न देव महर्षि शन, मम तत्वन कह कोउ।
अहउँ आदि कारण सुरन, ऋषिन महीं सुनु दोउ।।”
संक्षेप में कहा जाए तो ’गीतायन’ गीता को समझने और तर्क करने की परंपरा तक मात्र सीमित न रहकर जीवन में उतारने की प्रेरणा देने वाली कृति है। हिंदी साहित्य और गीता-अनुवाद की परंपरा में इसका स्थान निश्चित रूप से उल्लेखनीय है।
विद्यावाचसपति अजय कुमार झा जनकपुर धाम, नेपाल,




