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विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला के उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ और सांस्कृतिक परिदृश्य का अध्ययन

 


मौसमी सिंह तिवारी
(शोधार्थी, हिन्दी केन्द्रीय विभाग, त्रिवि)
शोध सार
विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला को सामान्यतः मनोवैज्ञानिक कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है, किन्तु उनका उपन्यास–साहित्य केवल मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तक सीमित नहीं है । उनकी रचनाओं में नेपाली समाज, संस्कृति, वर्ग–संबंध, जातिगत संरचना, लैंगिक असमानता तथा अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक परिवेश का व्यापक और बहुआयामी चित्रण मिलता है । प्रस्तुत शोध का उद्देश्य कोइराला के प्रमुख उपन्यासों में निहित सामाजिक एवं सांस्कृतिक यथार्थ का विश्लेषण करना है ।
कोइराला के उपन्यास केवल मनोवैज्ञानिक संवेदनाओं की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे नेपाली समाज के विविध आयामों, सांस्कृतिक बहुलता, सामाजिक विषमताओं, लैंगिक प्रश्नों तथा वैश्विक मानवीय सरोकारों का सशक्त दस्तावेज भी हैं। उनके उपन्यासों में स्थानीयता और वैश्विकता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है, जो उन्हें नेपाली उपन्यास परंपरा का एक विशिष्ट और बहुआयामी रचनाकार सिद्ध करता है।
बीज शब्द : समाज, संस्कृति, जातिगत व्यवस्था
विषय प्रवेश :
विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला को मनोवैज्ञानिक कथाकार रूप में जाना जाता है । परन्तु एक कथाकार को किसी सीमा विशेष में बांध कर नहीं देखा जा सकता है । कोइराला का रचना संसार विविधताओं से भरा हुआ है । इनकी रचनाओं में पहाड़ी समाज, संस्कृति, सभ्यता के साथ ही तराई क्षेत्र का समाज, संस्कृति और सभ्यता भी वर्णित हुई है । कोइराला रचित नरेन्द्र दाई में मधेश के समाज का वर्णन हुआ है । कथा की पृष्ठभूमि मधेश की जमीन तराई क्षेत्र का कोसी किनारे का एक गांव है इसलिए उसमें मधेश की स्थानीय संस्कृति की झलक मिलती है । यह वह क्षेत्र है जहाँ कोइराला का परिवार और बालक विश्वेश्वर प्रसाद का कुछ समय गुजरा था । नरेन्द्र दाई में तराई के उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के परिवेश और समाज को वर्णित किया गया है । उपन्यास का नायक नरेन्द्र जमीन्दार घराने का है । उसके सहारे लेखक ने अभिजात्य वर्ग का वर्णन किया है । वहीं मुनरिया के माध्यम से निम्नवर्गीय समाज को वर्णित किया गया है ।
किन्तु लेखक ने नरेन्द्र और मुनरिया के रिश्ते के माध्यम से तत्कालीन समाज की जातिगत व्यवस्था और ऊँचनीच तथा अमीर गरीब की भावना पर भी प्रहार किया है । नरेन्द्र अपनी अविकसित पत्नी गौरी के प्रति आकर्षित नहीं होता क्योंकि नरेन्द्र का व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक है । बावजूद इसके लेखक ने मुनरिया को जो निम्नवर्गीय महिला है उसे नरेन्द्र के प्रेयसी बनने में सफल दिखाया । मधेशी समाज में शादी के बाद गौना की परम्परा है । मुनरिया अपने गौने का इंतजार कर रही है । इस प्रकरण से यह सिद्ध होता है कि नरेन्द्रदाई में वर्णित समाज में बाल विवाह की परम्परा थी । क्योंकि गौना का रस्म तभी होता था जब बालिका युवती बन जाती थी ।
इसके साथ ही नरेन्द्रदाई में मुस्लिम समाज का भी वर्णन किया गया है । उपन्यास में सान्नानी नाम की पात्र नजरिया की पत्नी से ताजिया के विषय में बात करती है । ताजिया की परम्परा मुहर्रम के समय पर निभाया जाता है । साथ ही चैती उत्सव का वर्णन भी मिलता है । अर्थात् नरेन्द्रदाई में वर्णित समाज में दो समुदायों के बीत सोहार्ददता को भी दिखाया गया है ।
इतना ही नहीं कोसी किनारे के एक पिछड़े और छोटे से गाँव में भी नरेन्द्र दाई को एक आधुनिक और शहरिया युवक के रूप में दिखाया गया है । इस बात से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि नरेन्द्रदाई में वर्णित गांव में शहरी जीवन का प्रवेश होने लगा था । या यह कह सकते हैं कि लेखक की कल्पनाशीलता ने सदियों पहले यह जाहिर कर दिया था कि एक समय गांव का स्वरूप भी बदल जाएगा ।
बाबु आमा र छोरा का समाज भी पारम्परिक समाज ही है । जहाँ नारी की इच्छा और उसके आत्म सम्मान की परवाह नहीं की जाती है । जहाँ शादी के लिए दुहाजु वर के साथ एक युवती की शादी कर दी जाती है । उपन्यास की शुरुआत ही कौतुहलपूर्ण स्थिति के साथ की गई है । कथा का मुख्य पात्र शिब प्रसाद है किन्तु सम्पूर्ण उपन्यास में उसे सामने नहीं लाया जाता है । यह उपन्यासकार की एक अनूठी कलाकौशल है । उपन्यास देखने में भले ही साधारण लगता है, लेकिन प्रस्तुतिकरण और विषयवस्तु अद्वितीय है । हालाँकि मुख्य केंद्रीय पात्र के रूप में एक बेटा है, उपन्यास माँ और पिता के चरित्र वर्णन के साथ मजबूर स्थिति को समझाते हुए समाप्त होता है । उपन्यास आज भी हमारे समाज के सामने दो गंभीर प्रश्न लेकर खड़ा है । क्या आज भी उमा जैसी नारी के लिए इस समाज में अपनी स्वेच्छा से चुने गए पति शिव बस्नेत को अपना असली पति मानेगी या फिर पुराने बस्नेत को, जिसे परिवार और समाज ने स्वीकार कर लिया है, उसे अपना पति मानेगी ? यह एक ऐसा उपन्यास है जो दिखाता है कि हमारे समाज में महिलाएं किस स्थिति में रहने के लिए बाध्य है । उन्हें कोई भी कार्य करने के लिए कितना मजबूर और संयमित होना पड़ता है । तेरह रात पहले, उमा के गर्भ में एक सुचिताम् दिव्यता ने जन्म लिया था । वह अपनी माँ को बताती है कि वह गर्भवती है किन्तु इसके बाद भी उसे समाज परिवार के इज्जत का हवाला देकर शादी के लिए तैयार कर लिया जाता है । यह परिस्थिति उस समय के समाज की मानसिकता बताती है । जो कमोवेश आज भी समाज में मौजूद है ।
हिटलर और यहूदी उपन्यास में नेपाल, भारत और यूरोप के समाज को प्रस्तुत किया गया है । यह उपन्यास ग्यारह अध्यायों में रचा गया है । इस उपन्यास के आरंभ में बम्बई शहर का समाज आया है । वहाँ के व्यस्त दैनिक जीवन और गतिविधियों का उल्लेख किया गया है । अगले अध्याय में, नेपाल का समाज वर्णित हुआ है । इसके बाद दो अध्यायों में, हिंद महासागर से होकर यूरोप और उससे आगे तक की समुद्री यात्राएँ आदि का वर्णन है । पानी जहाज़ का दैनिक जीवन, उसके भीतर का वातावरण आदि बहुत ही सूक्ष्म तरीके से प्रस्तुत किया गया है । इसके बाद का माहौल ब्रिटेन से शुरू हुआ है । कथा का मुख्य पात्र यूरोप के विभिन्न देशों का दौरा करता है । इस उपन्यास में लंदन, पेरिस, हनोवर, बर्लिन जैसे शहरों का माहौल प्रस्तुत किया गया है । मुख्य पात्र के इजराइल पहुँचने पर उपन्यास समाप्त होता है । स्पष्ट है कि उपन्यास में अंतर्राष्ट्रीय समाज को वर्णित किया गया है ।
तीन घुम्ती का समाज
विश्वेश्वरप्रसाद द्वारा रचित तीन घुम्ती एक सामाजिक उपन्यास माना जाता है । हालाँकि यह उपन्यास स्त्री के चरित्र और मनोविज्ञान को प्रस्तुत करता है । फिर भी इस उपन्यास में समाज में घटित होने वाली वास्तविक घटनाओं का गहराई से विश्लेषण किया गया है । इस उपन्यास की मुख्य नारी पात्र के जीवन में घटित होने वाली तीन महत्त्वपूर्ण घटनाओं को इस उपन्यास में दिखाया गया है । इन तीन घटनाओं में उसे समाज से बगावत करते हुए चित्रित किया गया है । समाज में प्राचीन परम्पराएँ, जाति भेद, धर्म, संस्कृति एवं सामाजिक मान्यता और वर्ग भेदभाव के खिलाफ विद्रोह दिखाया गया है । पुरुष–प्रधान नेपाली समाज में सांस्कृतिक बंधनों पर अधिकारों का प्रयोग होता आया है । इन्द्रमाया ने इस उपन्यास में पुराने मूल्यों को तोड़ा है और नया मूल्य स्थापित किया है ।
“एक तरफ माता पिता और वह समाज, जिसकी एक समस्या बन कर वह बढ़ी थी । जिस समाज की भूमि में उसके सम्बन्धों की जड़ें फैली थीं और दूसरी ओर पीताम्बर । समाज से बाहर का प्राणी । पीताम्बर सम्पन्न व्यक्ति नहीं था लेकिन असम्पन्नता की तरफ इन्द्रमाया का ध्यान नहीं जाता है । उसे पसंद करने या ना करने के पक्ष में एक अकिंचन व्यक्ति था, दूसरी तरफ दल बल सहित का बृहत समाज ।”(कोइराला, २०६८,पृ.५)
इस उपन्यास में समाज द्वारा स्थापित विवाह, सेक्स और प्रेम की नई परिभाषा दी गई है । पुरानी मान्यताओं को नष्ट कर नई सोच और विचारों को स्थापित करने का प्रयास किया गया है । स्त्रीत्व एवं मातृत्व का विषय दिखाकर समाज में पति प्रेम की अपेक्षा स्नेह को महत्व देने की कोशिश की गई है ।
“इसलिए तो इन्द्रमाया ने पति और पुत्री का चुनाव करने में अपने आपको दो टुकड़ों में बटा हुआ महसूस किया था । वह निर्णय कितना असहनीय था, उसकी पीड़ा कितनी दुर्दमनीय थी ।”(कोइराला, २०६८,पृ.२५)
इस उपन्यास में पूर्वी पुरुष प्रधान समाज द्वारा स्थापित रीति–रिवाज, धर्म, संस्कृति, जातीयता, परंपरा और रीति–रिवाजों के विरुद्ध विद्रोह मिलता है । उपन्यास में नारी जीवन की पीड़ा, प्रेम, सेक्स, ईमानदारी और अस्तित्व को अभिव्यक्त किया गया है । सदियों से स्थापित सामाजिक मानदंडों के खिलाफ एक महिला का विद्रोह सफल दिखाया गया है । सामाजिक मानदंडों के खिलाफ अपने विद्रोह में सफल होती है । इसने नेपाली समाज और जीवन का चित्रण कर उसे समाजशास्त्रीय स्वरूप भी प्रदान किया है ।
“जीवन में कभी कभी ऐसा निर्णय लेना पड़ता है जिसमें ‘स्व’ के किसी ना किसी अंश से युद्ध की घोषणा करनी पड़ती है । रमेश के साथ घनिष्ठता नहीं बढाने के लिए जो निषेधाज्ञा की भावना है वह परम्परागत मान्यता द्वारा हृदय में जमे हुए सामाजिक विश्वास और आस्था का ही एक रूप है ।”(कोइराला, २०६८,पृ.२५)
मूलतः इस उपन्यास में समाज के दो आर्थिक वर्ग दिखाए गए हैं : मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग । इस उपन्यास में इन्द्रमाया का मायका मध्यमवर्गीय है और निम्न वर्ग में पीतांबर है । इंद्रमाया का परिवार आर्थिक रूप से मध्यमवर्गीय है इसलिए वे पीतांबर के साथ इंद्रमाया के रिश्ते को नकारते हैं । लेकिन एक पक्ष समाज का यह भी दिखाया गया है कि लड़कियों को शिक्षा का अधिकार है । इसी वजह से शिक्षित इन्द्रमाया जागरुक है और अन्य नेपाली महिलाओं से अलग है ।
पीताम्बर अनाथ है । वह एक बेसहारा युवक है जो रोजगार के लिए पहाड़ों से काठमांडू आया था । वह छोटे–मोटे काम करके जीवन यापन करता है । समाज की यह आर्थिक असमानता यहाँ दिखाई गई है । क्योंकि इसी आर्थिक असमानता के कारण पीताम्बर शादी का रिश्ता इन्द्रमाया के पिता के सामने नहीं ला पाता है । नेपाली सामंती आर्थिक संरचना में विवाह जिसमें महिलाएँ पुरुषों पर निर्भर होती हैं, उसके लिए पुरुषों का आर्थिक रूप से सम्पन्न होना पड़ता है । इसके लिए पुरुषों और विशेषकर लड़कियों की वर्ग स्थिति बहुत निर्णायक होती है । इस दृष्टिकोण से पीताम्बर कमजोर है और यही कारण है कि इन्द्रमाया अपनी जिन्दगी के लिए स्वयं निर्णय लेती है ।
तीन घुम्ती का समाज भी अन्य समाज की ही तरह है, जहाँ अमीर–गरीब, जात–पात, विभेद सभी व्याप्त हैं । जहाँ एक नारी के लिए अपने आप को स्थापित करना कठिन है । अगर यह दुःस्साहस वह करती भी है तो उसे समाज के बनाए गए रीति रिवाज, नियम इन सभी से लड़ना पड़ता है । यह परिस्थिति आज के समाज में भी कायम है ।
सुम्निमा का समाज
जेल जीवन के दौरान निर्मित पौराणिक इतिहास को आधार बना कर लिखा गया सुम्निमा उपन्यास कौशिकी नदी के किनारे की पृष्ठभूमि में चित्रित की गई है ।
“वर्षों पहले की बात है, अतीत के धुंधले गर्भ से, यह पुराण अब हमारे कानों में गुंजित है ऐसा महसूस होता है । प्राचीन कहानियों को आज हम अपने निजी अनुभव से स्वीकार नहीं कर सकते हैं । वे हमारे जीवन के जीवंत अनुभव नहीं हो सकते …….इसलिए यह कहानी यह एक ऐसा वृतांत है जो सच और झूठ के तराजू पर नहीं तौला जाता । इसका अर्थ पौराणिक, संकेतमय, प्रतीकात्मक है ।”(कोइराला, २०६८,पृ.२७९)
उस क्षेत्र में सूर्यदत्त नाम का एक ब्राह्मण आश्रम बनाकर रहता है । इस कथा में आर्य संस्कृति की भौतिकता तथा अनार्यों की सभ्यता एवं सांस्कृतिक स्वरूप की तुलना की गई है तथा सकारात्मक एवं नकारात्मक स्थिति का अपने–अपने ढंग से मूल्यांकन किया गया है ।
“राजकुमार ने फिर पूछा, हे पुण्यात्मा क्या आप यज्ञादि निर्विघ्‌नपूर्वक कर रहे हैं ? यहाँ के अनार्य जाति द्वारा कोई विघ्‌न वाधा तो नहीं हो रहा ?” (कोइराला, २०६८,पृ.२८८)
सूर्यदत्त, सोमदत्त और पुलोमा ने आर्य के जीवन–दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व किया है । इसी प्रकार, किरातों और भीलों का प्रतिनिधित्व बिजुवा, सुम्निमा और अन्य भीलों द्वारा किया गया है । इस बात पर जोर दिया गया है कि भौतिक पर्यावरण संपूर्ण विकास पथ का आधार है और मनुष्य की चेतना और विकास इसी पथ से चलता है । इसी परंपरा का पालन करते हुए प्रस्तुतिकरण उपन्यास की घटनाओं में प्रभावी ऊर्जा उत्पन्न करता है ।
उपन्यास में कुछ घटनाओं के वर्णन से पता चलता है कि उपन्यास बौद्ध दर्शन से भी प्रभावित है । उपन्यास पूर्वी नेपाल में कोसी नदी की यथास्थिति और नदी तल में बदलाव के बीच के समय के अंतर का आकलन करता है । यह उपन्यास उस काल के दौरान सभ्य और कुलीन और असभ्य जंगली जातियों की मौजूदा संरचना का लेखा–जोखा रखते हुए, मानवीय स्वतंत्रता और मानवीय अनिवार्यताओं के आवश्यक तत्वों की पहचान करने में सक्षम है । अस्मिता बोध की प्रस्तुति में उपन्यास में बौद्धिक धार को समग्र रूप से नास्तिकता से जोड़ने पर जोर दिया गया है । इस बात पर बल दिया गया है कि किरात दर्शन वैदिक आर्य दर्शन की तुलना में अधिक वस्तुनिष्ठ एवं जीवन संबंधी है ।
मोदिआइन का समाज
विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला द्वारा रचित मोदियाइन एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण उपन्यास है । इसका विषय हजारों वर्ष पूर्व महाभारत युद्ध की कहानी है । उस युद्ध में लाखों विधवा स्त्रियों की प्रेतात्मा में प्रतिनिधि स्त्री के रूप में प्रस्तुत मोदियाइन का मुख्य पात्र विचित्रता से युक्त है । इसका संदेश युद्ध छोड़कर शांति स्थापित करना है । कृष्ण ने अर्जुन को ऐसा युद्ध करने के लिए प्रेरित किया, लेकिन अंत में सभी को मृतलोक जाना पड़ा । उस नरसंहार युद्ध की उपलब्धि क्या मिली, इस उपन्यास के द्वारा यह प्रश्न उठाया गया है । इस उपन्यास में विचार का विश्लेषण स्पष्ट है – युद्ध छोड़कर शांति स्थापित करो । महाभारतकालीन विषय होने के कारण उस समय के समाज को ही चित्रित किया गया है ।
पौराणिककाल की महाभारत की घटना का उपजीव्य साधन ही इस उपन्यास की कथावस्तु है । विशाल कथा को लघु आयाम में प्रस्तुत करने की कोइराला जी की कला इस उपन्यास में स्पष्ट दिखाई पड़ती है । इस उपन्यास में उपन्यासकार स्वयं के मिसिरजी के साथ बालहठ के रूप में बाल्यकाल में किए गए यात्रा का संस्मरण के रूप में प्रयोग करते हैं । उपन्यास की कथा ‘म’ पात्र का दरभंगा यात्रा में मोदियाइन से मुलाकात, वहां का परिवेश तथा मोदिआइन द्वारा रात्रि के समय कही गयी दन्त्यकथा मात्र है । विशेषकर कौरव और पाण्डव के बंटवारे से उत्पन्न समस्या युद्ध में परिणत होने की नौबत का सचित्र वर्णन है । मनुष्य देवता भी नहीं है और पशु भी नहीं है । अतः मनुष्य को मनुष्य बनकर ही रहना चाहिए, वरना मानव संहार जैसा अमानवीय कर्म से मानव अस्तित्त्व संकट में पड़ने के कारण महाभारत का युद्ध शान्ति और मानवता के निमित्त है, यही निष्कर्ष इस उपन्यास का है । बड़ा आदमी नहीं, असल आदमी बनना इस उपन्यास का मुख्य उद्देश्य है । मोदियाइन ने बालक के समक्ष संस्मरणात्मक शैली में इस उपन्यास में भारतीय घटना का वर्णन किया है । मोदियाइन महाभारतकालीन नारी की आंखों देखी कथा सुनाने लगती है ।
इस उपन्यास में इसी कथानक को प्रमुखता दिया गया है । “हे पार्थ, तुम्हे मोह ने आक्रान्त कर दिया है । उठाओ गाण्डीव और युद्ध में प्रविष्ट हो जाओं, इसमें विजयी हुए तो पृथ्वी का भोग करेंगे और अथकदाचित मरे तो स्वर्ग में भोग करने के लिए पहुँचंगे ।” (कोइराला, २०६८,पृ.२७२)
यह अर्जुन को कृष्ण के द्वारा युद्ध में लौटने का किया गया आग्रहपूर्ण अभिव्यक्ति है । इस अभिव्यक्ति का सार सम्भवतः महाभारत के गीता दर्शन को लिया गया है । उपन्यासकार ने इस उपन्यास में गीता का विश्लेषण किया है । प्रस्तुत उपन्यास में गीता दर्शन के अध्यात्मवादी चिन्तन के विरुद्ध भगवान कृष्ण की तत्कालीन भूमिका को आगे बढ़ाया गया है । इस उपन्यास में महाभारतकालीन युद्ध के वर्णन के साथ ही नारी वर्ग पर उस युद्ध के असर का चित्रात्मक वर्णन प्रस्तुत किया गया है । इस उपन्यास के माध्यम से बी.पी. के युद्ध विरोधी एवम् अहिंसावादी विचार व्यञ्जित हुए हैं ।
“कृष्ण देवत्व के व्याख्याता हैं, अजुृन मानवत्व के पक्षधर हैं ।” (कोइराला, २०६८,पृ.२७२)
महाभारत का युद्ध होने से पहले प्रशस्त शान्ति वार्ता हुई, परंतु वह सफल नहीं हो सकी । कृष्ण जैसा मध्यस्थकर्ता होकर भी युद्ध टल नहीं सका । इस उपन्यास का मुख्य अन्तःसंवाद यही है कि कृष्ण यदि चाहते तो युद्ध टल सकता था और भंयकर नरसंहार को रोका जा सकता था, परंतु महाभारत का युद्ध होकर रहा पर उसके परिणाम से मानव सभ्यता को क्या मिला ? इसी प्रश्न का उत्तर पाना इस उपन्यास का मुख्य उद्देश्य है ।
संदर्भ सुची
१ कोइराला विश्वेश्वरप्रसाद, २०६८ वि.(तीन घुम्ती) वीपी का उपन्यास, साझा प्रकाशन, पृष्ठ–५
२ कोइराला विश्वेश्वरप्रसाद, (तीन घुम्ती) वीपी का उपन्यास, साझा प्रकाशन, पृष्ठ–२५
३ कोइराला विश्वेश्वरप्रसाद, (सुम्निमा) वीपी का उपन्यास, साझा प्रकाशन, पृष्ठ–२७९
४ कोइराला विश्वेश्वरप्रसाद, (सुम्निमा) वीपी का उपन्यास, साझा प्रकाशन, पृष्ठ–२८८
५ कोइराला विश्वेश्वरप्रसाद, (मोदिआइन) वीपी का उपन्यास, साझा प्रकाशन, पृष्ठ–२७२
६ कोइराला विश्वेश्वरप्रसाद, (मोदिआइन) वीपी का उपन्यास, साझा प्रकाशन, पृष्ठ–२७२

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