‘मधेश: आगे की राह’ विषय पर एक संवाद कार्यक्रम संपन्न
**मधेश में नेतृत्व की शून्यता, नई पीढ़ी द्वारा विकल्प दिए जाने पर जोर**
**’पुराने नेताओं का परीक्षण हो चुका, मधेश को नया नेतृत्व खोजना चाहिए’**
**मधेश की उपलब्धियों को बचाने के लिए सचेत राजनीति आवश्यक : वक्ता**
**मधेश की वर्तमान स्थिति और भविष्य की दिशा पर गहन बहस**
काठमांडू।’शहीद संजय चौधरी स्मृति प्रतिष्ठान नेपाल’ के आयोजन में ‘मधेश: आगे की राह’ विषय पर एक संवाद कार्यक्रम संपन्न हुआ है। कार्यक्रम में मधेश आंदोलन की पृष्ठभूमि, इसके द्वारा स्थापित राजनीतिक उपलब्धियों, वर्तमान मधेश की स्थिति और आने वाले दिनों में अपनाई जाने वाली राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक दिशा के बारे में गहन चर्चा की गई।
प्रतिष्ठान की अध्यक्ष और शहीद संजय चौधरी की बहन ममता चौधरी की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में पूर्व न्यायाधीश गिरीश चंद्र लाल, वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी, मधेश प्रदेश के पूर्व मुख्य न्यायाधिवक्ता सुरेंद्र महतो और सहजकर्ता (मॉडरेटर) अधिवक्ता आनंद गुप्ता सहित विभिन्न क्षेत्रों के प्रबुद्ध व्यक्तित्वों की भागीदारी रही।
पूर्व न्यायाधीश गिरीश चंद्र लाल ने कहा कि मधेश के पुराने राजनीतिक नेतृत्व का परीक्षण हो चुका है और नया नेतृत्व स्थापित न हो पाने के कारण वर्तमान में मधेश में नेतृत्व की शून्यता (रिक्तता) दिख रही है।
लाल ने विचार व्यक्त किया कि पुराने नेताओं के विकल्प के तौर पर नया नेतृत्व न आ पाने के कारण मधेश की राजनीति में नेतृत्वहीनता की स्थिति पैदा हो गई है। उन्होंने कहा कि केवल अतीत की शैली और पारंपरिक राजनीतिक अभ्यासों से अब नया नेतृत्व स्थापित नहीं हो सकता। उनका कहना था कि मधेश की वास्तविक समस्या और जनता की अपेक्षाओं को संबोधित कर सकने वाले नेतृत्व की पहचान करने के लिए गंभीर प्रयास की आवश्यकता है।
लाल ने कहा, ‘जनता के वास्तविक हित में काम करने वाले नेता की खोज होनी चाहिए, इसके लिए युवा पीढ़ी को ही सक्रिय होकर कड़ी मेहनत करने की जरूरत है।’
मधेश के राजनीतिक भविष्य के निर्माण के लिए नई पीढ़ी को सक्रिय भूमिका निभाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि नेतृत्व में नई सोच, क्षमता और जन-उत्तरदायित्व आवश्यक है। उनका विचार था कि पुराने राजनीतिक अभ्यास की निरंतरता के बजाय जनता के वास्तविक सरोकारों को केंद्र में रखकर एक नए राजनीतिक संस्कार का विकास किया जाना चाहिए।
कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि संविधान संशोधन का विषय मधेश के लिए संवेदनशील है। उन्होंने दावा किया कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में संविधान संशोधन करने पर मधेश द्वारा पिछले आंदोलनों और संघर्षों से प्राप्त अधिकारों के भी छिन जाने का जोखिम है।
त्रिपाठी ने इस बात पर जोर दिया कि मधेश की राजनीति को वर्तमान परिस्थिति के अनुसार बहुत ही सचेत और रणनीतिक ढंग से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्राप्त उपलब्धियों के संरक्षण के साथ-साथ अतिरिक्त अधिकारों के लिए राजनीतिक पहल आवश्यक है।
उन्होंने मधेश-केंद्रित राजनीतिक दलों को भी अपनी कार्यशैली और संगठनात्मक संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता की ओर इशारा किया। उनका कहना था कि यदि वे जनता की अपेक्षाओं और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार खुद को रूपांतरित नहीं कर पाए, तो मधेश-केंद्रित दलों का प्रभाव और कमजोर हो सकता है।
संवाद के दौरान मधेश की आगामी राजनीतिक यात्रा में नई पीढ़ी की भूमिका को विशेष महत्व देने का विचार भी व्यक्त किया गया। प्रतिभागियों ने इस बात पर जोर दिया कि पुराने संघर्षों और आंदोलनों से प्राप्त अनुभवों को आत्मसात करते हुए नई पीढ़ी को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के लिए रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
कार्यक्रम में यह बताया गया कि केवल मधेश की समस्याओं की पहचान करना ही काफी नहीं है, बल्कि उनके दीर्घकालिक समाधान के लिए स्पष्ट नीति, सक्षम नेतृत्व और जवाबदेह राजनीतिक संरचना की आवश्यकता है।
कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने कहा कि मधेश के पिछले संघर्षों और उपलब्धियों की वस्तुनिष्ठ समीक्षा करते हुए वर्तमान चुनौतियों की पहचान करने तथा भविष्य का स्पष्ट रोडमैप (मार्गचित्र) तैयार करने के लिए ऐसी बहसों की आवश्यकता है।
इस संवाद ने इस विषय पर और अधिक गंभीर बहस की आवश्यकता की ओर इशारा किया कि मधेश की आगामी यात्रा को किस राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दिशा में आगे बढ़ाया जाए। साथ ही, इसने अधिकार, सुशासन, समावेशिता और आर्थिक रूपांतरण को केंद्र में रखकर नई राजनीतिक सोच विकसित करने का संदेश दिया है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने मधेश की पिछली राजनीतिक यात्रा, विभिन्न चरणों में हुए आंदोलनों और संघर्षों से प्राप्त उपलब्धियों की समीक्षा करते हुए वर्तमान समय में मधेश द्वारा सामना की जा रही राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों पर अपने विचार व्यक्त किए।



