नेपाल में फिर उठी हिंदू राष्ट्र की हुंकार : डॉ.शिवांशु कुमार तिवारी
डॉ. शिवांशु कुमार तिवारी, राजविराज, 25 अगस्त। नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। कोशी प्रदेश के सुनसरी जिले के देवानगंज क्षेत्र में कांवड़ यात्रा के दौरान हुए सामुदायिक तनाव के बाद शुरू हुआ विरोध अब स्थानीय विवाद से आगे बढ़कर राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। हिंदू सम्राट सेना, विश्व हिंदू महासंघ, महाकाली युवा शक्ति, हिंदू युवा संघ और अन्य संगठनों ने नेपाल को पुनः हिंदू राष्ट्र घोषित करने, धार्मिक संस्थानों की कानूनी जांच और सुनसरी हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाने जैसी मांगों को लेकर आंदोलन तेज किया है। जनकपुर में गृह मंत्री सुदन गुरुङ के साथ हिंदू सम्राट सेना के प्रतिनिधियों की वार्ता और उनकी बहु-सूत्रीय मांगों ने इस आंदोलन को राजनीतिक स्तर पर भी पहुंचा दिया।
सुनसरी से शुरू हुआ आंदोलन, सातों प्रांतों तक पहुंचा
सुनसरी के देवानगंज में धार्मिक जुलूस के दौरान विवाद के बाद हिंसा और मौतों ने नेपाल के तराई-मधेश क्षेत्र में तनाव बढ़ाया। सरकार की ओर से मुआवजे और जांच के आश्वासन के बावजूद हिंदू संगठनों का आंदोलन शांत नहीं हुआ। इसके बाद नेपाल के विभिन्न जिलों में प्रदर्शन, सभाएं और हस्ताक्षर अभियान शुरू हुए। शाही युवा शक्ति नेपाल सहित संगठनों ने हिंदू राष्ट्र और राजशाही की पुनर्स्थापना के समर्थन में देशव्यापी अभियान चलाने का दावा किया है। आंदोलनकारियों के अनुसार लाखों लोगों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन हस्ताक्षर किए हैं, हालांकि इन आंकड़ों का स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है। इसी दौरान ‘गर्वले भन्नुहोस्, हामी हिन्दु हौं’ यानी ‘गर्व से कहो, हम हिंदू हैं’ जैसे नारे सोशल मीडिया पर भी तेजी से दिखाई देने लगे।
जनकपुर में सरकार से सीधा संवाद
बढ़ते दबाव के बीच गृह मंत्री सुदन गुरुङ का जनकपुर पहुंचकर हिंदू सम्राट सेना के प्रतिनिधियों से संवाद करना महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम माना गया। संगठन ने नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए समयबद्ध पहल, सुनसरी घटना की निष्पक्ष जांच और मस्जिदों-मदरसों समेत धार्मिक संस्थानों की कानूनी स्थिति और वित्तीय स्रोतों की जांच जैसी मांगें रखीं। यहां यह अंतर बनाए रखना जरूरी है कि किसी धार्मिक संस्था की जांच और उसे आतंकवाद या विदेशी गतिविधियों से जोड़ना अलग-अलग बातें हैं। कानूनी पंजीकरण, विदेशी फंडिंग और संस्थागत गतिविधियों की पारदर्शिता की जांच समान रूप से सभी धार्मिक संस्थानों पर लागू होनी चाहिए।
देउवा की वापसी और ‘मैं हिंदू हूं’ का राजनीतिक संदेश
इसी उभरते माहौल के बीच पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाली कांग्रेस के पूर्व सभापति शेर बहादुर देउवा लंबे विदेश प्रवास के बाद 13 अगस्त को नेपाल लौटे। उनकी वापसी ऐसे समय हुई जब उनके समर्थक गुट की राष्ट्रीय बैठक काठमांडू में आयोजित हुई। सम्मेलन के दौरान देउवा ने मंच से तीन बार अपनी पहचान स्पष्ट करते हुए कहा—“मैं हिंदू हूं, हिंदू हूं, हिंदू हूं।” उनके इस बयान ने नेपाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी। उनके समर्थक गुट के सम्मेलन में नेपाल की सनातन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को राष्ट्रीय पहचान के रूप में आगे बढ़ाने तथा संविधान में आवश्यक संशोधन के लिए संवाद की बात भी सामने आई। हालांकि नेपाली कांग्रेस की आधिकारिक स्थिति अभी धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में रही है और पार्टी ने कहा है कि हिंदू राष्ट्र संबंधी प्रस्ताव आधिकारिक महाधिवेशन में रखा जाना चाहिए।
क्या देउवा ने बदली अपनी राजनीतिक लाइन?
देउवा का वर्तमान रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नेपाली कांग्रेस के भीतर हिंदू राष्ट्र का मुद्दा नया नहीं है। खुम बहादुर खड्का, शशांक कोइराला और शंकर भंडारी सहित कई कांग्रेस नेताओं ने अतीत में नेपाल की हिंदू पहचान बहाल करने की मांग उठाई थी। 2018 और 2024 में भी कांग्रेस के भीतर इस विषय पर हस्ताक्षर अभियान हुए, लेकिन तत्कालीन पार्टी नेतृत्व ने इसे आधिकारिक राजनीतिक एजेंडा नहीं बनाया। देउवा स्वयं पहले इस मांग के प्रति समर्थन नहीं जताते थे। ऐसे में उनका वर्तमान रुख महज धार्मिक पहचान की घोषणा है या राजनीतिक रणनीति—यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठ रहा है।
जेन-जी आंदोलन के बाद नेपाल की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को बड़ा झटका लगा और नेपाली कांग्रेस के भीतर नई पीढ़ी के नेतृत्व का प्रभाव बढ़ा। देउवा खेमे की राजनीतिक पकड़ कमजोर हुई। ऐसे समय में हिंदू राष्ट्र और सनातन पहचान का मुद्दा उन्हें उन पारंपरिक मतदाताओं तथा सामाजिक संगठनों से जोड़ सकता है, जो लंबे समय से इस मांग के समर्थक रहे हैं। इसलिए देउवा की रणनीति में व्यक्तिगत धार्मिक पहचान और राजनीतिक पुनर्स्थापन—दोनों तत्वों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
बालासाहेब ठाकरे की याद क्यों आती है?
देउवा के ‘मैं हिंदू हूं’ बयान के बाद भारत में 1990 के दशक के राम मंदिर आंदोलन और बाबरी मस्जिद विवाद के दौर की राजनीति भी याद आती है। शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने उस दौर में अपनी हिंदू पहचान को बेहद मुखर अंदाज में व्यक्त करते हुए एक चर्चित साक्षात्कार में स्वयं को “I am a mad, mad Hindu” बताया था। हालांकि ठाकरे और देउवा की विचारधारा, राजनीतिक दल और परिस्थितियां अलग हैं, फिर भी दोनों बयानों में सार्वजनिक मंच से हिंदू पहचान को राजनीतिक भाषा में मजबूती से व्यक्त करने का एक समान तेवर दिखाई देता है। फर्क यह है कि ठाकरे का हिंदुत्व उनकी पार्टी की स्थापित वैचारिक राजनीति था, जबकि देउवा के मामले में अभी यह तय होना बाकी है कि उनका बयान स्थायी वैचारिक परिवर्तन है या राजनीतिक पुनरुत्थान की रणनीति।
जनसांख्यिकी, सीमा और सुरक्षा की चुनौती
नेपाल में धार्मिक जनसांख्यिकी और तराई-मधेश में धार्मिक संस्थानों के विस्तार को लेकर भी बहस तेज हुई है। भारत-नेपाल की खुली सीमा के कारण दोनों देशों के लिए अवैध वित्तीय नेटवर्क, तस्करी, फर्जी दस्तावेज, कट्टरपंथ और आतंकवादी गतिविधियों की संभावित चुनौतियों को गंभीरता से लेना आवश्यक है। लेकिन किसी पूरे धार्मिक समुदाय या हर मस्जिद-मदरसे को सुरक्षा खतरा मानना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि सभी धार्मिक संस्थाएं कानून के तहत पंजीकृत हों, विदेशी वित्तपोषण पारदर्शी हो और किसी भी संस्था का इस्तेमाल हिंसा या गैरकानूनी गतिविधियों के लिए न हो। जनसांख्यिकीय बदलाव के दावों को भी आधिकारिक जनगणना और प्रमाणित आंकड़ों के आधार पर ही देखा जाना चाहिए।
भारत-नेपाल के लिए ‘रोटी-बेटी’ संबंध सबसे बड़ी कसौटी
इस पूरे घटनाक्रम का प्रभाव भारत पर भी पड़ सकता है, खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में। भारत और नेपाल के बीच संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सदियों पुराने सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक रिश्तों पर आधारित हैं। दोनों देशों के बीच ‘रोटी-बेटी’ का संबंध आम लोगों की जिंदगी से जुड़ा है। इसलिए सुरक्षा चिंताओं से समझौता किए बिना दोनों सरकारों को ऐसा समाधान खोजना होगा, जिससे अवैध गतिविधियों और सीमा-पार अपराध पर कठोर कार्रवाई हो, लेकिन सामान्य नागरिकों की वैध आवाजाही, व्यापार, रोजगार और पारिवारिक संबंध प्रभावित न हों।
आखिर देउवा का हिंदू कार्ड—विचारधारा या सत्ता की रणनीति?
नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग पहले भी कई बार उठी है—2008 के बाद से विभिन्न धार्मिक और राजनीतिक संगठनों के आंदोलनों से लेकर 2015 के संविधान निर्माण और 2023-24 के राजशाही-हिंदू राष्ट्र आंदोलनों तक। लेकिन इस बार स्थिति अलग है। सुनसरी की सामुदायिक हिंसा, तराई में बढ़ती बेचैनी, हिंदू संगठनों का राष्ट्रव्यापी अभियान और मुख्यधारा की नेपाली कांग्रेस के एक प्रभावशाली धड़े में सनातन पहचान की चर्चा—इन सभी ने मुद्दे को नई राजनीतिक ऊर्जा दी है।
देउवा का ‘मैं हिंदू हूं’ बयान इसलिए केवल एक वाक्य नहीं है। यदि यह आगे चलकर नेपाली कांग्रेस की स्थायी राजनीतिक नीति में बदलता है, तो इसे नेपाल की मुख्यधारा की राजनीति में हिंदू पहचान की वापसी के संकेत के रूप में देखा जाएगा। लेकिन यदि यह अभियान देउवा गुट की राजनीतिक जमीन और पार्टी कैडर को पुनः मजबूत करने तक सीमित रहता है, तो इतिहास इसे राजनीतिक पुनर्वास की रणनीति के रूप में भी देख सकता है।
फिलहाल नेपाल के सामने सबसे बड़ा सवाल हिंदू राष्ट्र बनाम धर्मनिरपेक्षता से आगे का है—क्या वह अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान, संवैधानिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत के साथ सदियों पुराने ‘रोटी-बेटी’ संबंधों के बीच ऐसा संतुलन बना पाएगा, जिसमें न तो सुरक्षा से समझौता हो और न ही आम नेपाली तथा भारतीय नागरिकों की जिंदगी प्रभावित हो।



