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माता-पिता से शुरू होती है शिक्षा, शिक्षक से संवरता है जीवन : बिमल सरार्फ

 

बिमल सरार्फ, रक्सौल, 6 सितम्बर 2026। शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों के सम्मान का दिन नहीं, बल्कि उन सभी व्यक्तित्वों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जिन्होंने हमारे जीवन को ज्ञान, संस्कार और सही दिशा देने का काम किया। जब हम शिक्षक की बात करते हैं तो सबसे पहले उस व्यक्ति का स्मरण होना चाहिए, जिसने हमें जीवन का पहला पाठ पढ़ाया—हमारे माता-पिता।

सच कहा जाए तो माता-पिता हमारे जीवन के प्रथम शिक्षक होते हैं। बच्चा जब दुनिया में आता है, तब उसे न भाषा का ज्ञान होता है, न व्यवहार का और न ही सही-गलत की समझ। वह सबसे पहले अपने माता-पिता को देखकर सीखता है। बोलना, चलना, दूसरों से व्यवहार करना, प्रेम करना, सम्मान देना, अनुशासन में रहना और जीवन की छोटी-छोटी बातें समझना—इन सबकी पहली पाठशाला घर ही होती है।

माँ बच्चे को ममता, करुणा और संवेदना का पाठ पढ़ाती है तो पिता संघर्ष, अनुशासन, जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता का महत्व समझाते हैं। हालांकि यह कोई निश्चित विभाजन नहीं है; माता और पिता दोनों मिलकर बच्चे के व्यक्तित्व की पहली नींव रखते हैं।

इसके बाद जीवन में औपचारिक शिक्षा का प्रवेश होता है और शिक्षक उस नींव पर व्यक्तित्व का निर्माण करता है। शिक्षक हमें किताबों का ज्ञान देने के साथ यह समझाता है कि उस ज्ञान का जीवन में उपयोग कैसे करना है। वह हमारी प्रतिभा को पहचानता है, हमारी कमियों को सुधारता है और हमें अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

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‘शिक्षक’ शब्द का अर्थ केवल कक्षा में पढ़ाने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं है। जो अज्ञान से ज्ञान की ओर, असत्य से सत्य की ओर और भ्रम से विवेक की ओर ले जाए, वही सच्चे अर्थों में शिक्षक है।

एक अच्छा शिक्षक केवल यह नहीं सिखाता कि परीक्षा में अच्छे अंक कैसे प्राप्त किए जाएँ, बल्कि वह यह भी सिखाता है कि जीवन की परीक्षा में कैसे सफल हुआ जाए। वह हमें विषयों का ज्ञान देता है, लेकिन अपने आचरण से ईमानदारी, धैर्य, अनुशासन, समय का मूल्य, दूसरों का सम्मान और जिम्मेदारी जैसे जीवन-मूल्यों की शिक्षा भी देता है।

आज का समय बहुत तेजी से बदल रहा है। तकनीक, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने ज्ञान तक पहुँच को बेहद आसान बना दिया है। आज विद्यार्थी कुछ ही क्षणों में किसी भी विषय की जानकारी प्राप्त कर सकता है। ऐसे समय में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब हर जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध है, तो शिक्षक की आवश्यकता क्यों है?

इसका उत्तर है—जानकारी और ज्ञान अलग-अलग चीजें हैं, और ज्ञान तथा विवेक में उससे भी बड़ा अंतर है। तकनीक हमें जानकारी दे सकती है, लेकिन उसका सही उपयोग करना नहीं सिखा सकती। इंटरनेट हमें हजारों उत्तर दे सकता है, लेकिन कौन-सा उत्तर सही है और किस परिस्थिति में कौन-सा निर्णय उचित है, यह विवेक शिक्षक विकसित करता है। मशीनें सूचना दे सकती हैं, लेकिन मानवीय संवेदना, संस्कार और जीवन की दिशा नहीं दे सकतीं।

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आज बच्चों के सामने अवसरों की कमी नहीं है, लेकिन चुनौतियाँ भी उतनी ही बड़ी हैं। सोशल मीडिया, दिखावे की संस्कृति, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, सफलता का दबाव और बदलते सामाजिक संबंध बच्चों के मन और व्यक्तित्व को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में शिक्षक की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

आज शिक्षक को केवल अध्यापक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, प्रेरक और चरित्र-निर्माता बनना होगा।

वहीं माता-पिता की भूमिका भी केवल बच्चों की जरूरतें पूरी करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बच्चों को महंगे साधन और बेहतर सुविधाएँ देना अच्छी बात है, लेकिन उनसे भी अधिक जरूरी है उन्हें समय देना, उनकी बात सुनना और अपने आचरण से अच्छे संस्कार देना, क्योंकि बच्चे हमारी बातें कम और हमारा व्यवहार अधिक सीखते हैं। हम उन्हें ईमानदारी का उपदेश देकर स्वयं बेईमानी करेंगे तो वे हमारे शब्दों से नहीं, हमारे व्यवहार से सीखेंगे। इसलिए माता-पिता की जीवनशैली ही बच्चे की पहली पाठ्यपुस्तक होती है।

आज शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छे अंक, अच्छी नौकरी या अधिक धन कमाना नहीं होना चाहिए। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ऐसा मनुष्य तैयार करना है, जो सफल होने के साथ संवेदनशील भी हो, अधिकारों के साथ कर्तव्यों को समझे और अपनी उन्नति के साथ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी महसूस करे।

आज समाज में प्रतिभाशाली लोगों की कमी नहीं है, लेकिन प्रतिभा के साथ चरित्र की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है। बुद्धिमत्ता व्यक्ति को ऊँचाई तक पहुँचा सकती है, लेकिन चरित्र ही उसे उस ऊँचाई पर टिकाए रखता है। चरित्र निर्माण में परिवार और शिक्षक दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

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माता-पिता जीवन की पहली पाठशाला हैं और शिक्षक उस शिक्षा को विस्तार देने वाले मार्गदर्शक। दोनों की भूमिका अलग हो सकती है, लेकिन उद्देश्य एक ही है—एक अच्छे और जिम्मेदार इंसान का निर्माण। इसलिए शिक्षक दिवस पर केवल शिक्षकों को फूल और शुभकामनाएँ देना पर्याप्त नहीं है। हमें यह समझना होगा कि हमारे जीवन में शिक्षक का अर्थ कितना व्यापक है। माँ की गोद से शुरू हुई शिक्षा विद्यालय की कक्षा तक पहुँचती है और फिर जीवन की परिस्थितियाँ हमें लगातार कुछ न कुछ सिखाती रहती हैं।

जीवन स्वयं एक विद्यालय है और अनुभव उसके शिक्षक। इस शिक्षक दिवस पर आइए हम अपने माता-पिता के प्रति कृतज्ञ हों, जिन्होंने हमें जीवन का पहला पाठ पढ़ाया और उन सभी शिक्षकों को नमन करें, जिन्होंने हमारे ज्ञान को दिशा, हमारी प्रतिभा को पहचान और हमारे व्यक्तित्व को आकार दिया, क्योंकि शिक्षक का सबसे बड़ा सम्मान तब होता है, जब उसका विद्यार्थी केवल सफल व्यक्ति नहीं, बल्कि एक अच्छा इंसान बनकर समाज के लिए उपयोगी साबित होता है और शायद यही शिक्षा की सबसे बड़ी सफलता भी है ।

माता-पिता से मिले संस्कार, शिक्षक से मिला ज्ञान और जीवन से मिले अनुभव जब मिलते हैं, तभी एक संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

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