चीन द्वारा तातोपानी सीमा बंद किए जाने से नेपाल के व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ीं
काठमांडू, हिमालिनी डेस्क, ६ सितंबर । नेपाल के सबसे बड़े त्योहारों—दशैं और तिहार—की आहट के बीच चीन ने एकतरफा फैसला लेते हुए तातोपानी सीमा (Tatopani Border) को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया है। इस फैसले ने नेपाली आयातकों और व्यापारियों को गहरे संकट में डाल दिया है। त्योहारों के लिए मंगाए गए करोड़ों रुपये के चीनी सामान सीमा पर ही फंस गए हैं, जिससे आगामी त्योहारी सीजन में बाजार में वस्तुओं की कमी होने और कीमतें आसमान छूने की आशंका बढ़ गई है।
सीमा बंद होने का कारण
चीन ने भोटेकोशी-त्रिशूली कॉरिडोर में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ का हवाला देते हुए अपनी तरफ (झांगमू क्रॉसिंग) से कार्गो की आवाजाही रोक दी है। चीनी अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्र में अभी भी भारी भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बना हुआ है। यह बंदी ऐसे समय में हुई है जब कुछ ही दिनों पहले अरनिको राजमार्ग पर भूस्खलन के कारण बाधित हुआ यह रास्ता आंशिक रूप से खुला था।
त्योहारी सीजन पर सीधा असर
दशैं और तिहार के दौरान नेपाल में पूरे साल की खुदरा बिक्री (Retail Sales) का 40% से 70% हिस्सा आता है। रेडीमेड कपड़े, जूते, उपभोक्ता सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स और फलों की भारी मांग रहती है। सीमा बंद होने से अब व्यापारियों के पास त्योहारी भीड़ से पहले अपना स्टॉक भरने का समय बेहद कम बचा है।
आंकड़ों में तातोपानी सीमा का महत्व
तातोपानी अब नेपाल के लिए एक मामूली सीमा नहीं, बल्कि एक प्रमुख आयात द्वार बन चुका है।
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वित्तीय वर्ष 2024/25 में इस सीमा से 50.4 अरब रुपये का आयात हुआ था (औसतन 4.2 अरब रुपये प्रति माह)।
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पिछले वित्तीय वर्ष में 7.65 अरब रुपये के रेडीमेड कपड़े, 3.48 अरब रुपये की इलेक्ट्रिक मशीनरी, 3.59 अरब रुपये के फल और 1.54 अरब रुपये के जूते इसी रास्ते से आए थे।
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यह मार्ग इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के लिए भी प्रमुख है। 2024/25 में 14.28 अरब रुपये के वाहन और उनके कलपुर्जे यहां से आए, जिनमें 7.05 अरब रुपये के 2,724 चीनी इलेक्ट्रिक वाहन शामिल थे।
विकल्पों का अभाव और महंगाई का डर
नेपाल-चीन व्यापार का दूसरा प्रमुख उत्तरी मार्ग ‘रसुवागढ़ी’ (Rasuwagadhi) भी हालिया बाढ़ में तबाह हो चुका है। ऐसे में कोराला (Korala) मार्ग ही एकमात्र जमीनी विकल्प बचा है, जो तातोपानी की जगह नहीं ले सकता। यदि व्यापारी कोलकाता बंदरगाह के रास्ते समुद्री मार्ग से माल मंगाते हैं, तो माल ढुलाई (freight) और हैंडलिंग का खर्च बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि लंबी दूरी और माल की कमी के कारण खुदरा कीमतों में भारी उछाल आएगा। पिछले साल रसुवागढ़ी मार्ग बंद होने पर कपड़े और जूतों की कीमतों में 15% से 30% और खाने-पीने की चीजों में 10% से 50% तक का उछाल आया था।
व्यापारियों और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
कन्फेडरेशन ऑफ नेपलीज इंडस्ट्रीज (CNI) के अध्यक्ष बीरेंद्र राज पांडे का कहना है कि यह समय व्यापार के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। उन्होंने आगाह किया कि अगर दोनों सरकारों ने मिलकर जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं किया, तो भारी आपूर्ति संकट पैदा होगा और महंगाई तेजी से बढ़ेगी।
CNI कोशी प्रांत के उपाध्यक्ष भीम घिमिरे ने चीन के इस एकतरफा फैसले की आलोचना करते हुए इसे गलत ठहराया है। उन्होंने कहा, “एक लैंडलॉक्ड (चारों ओर से भूमि से घिरे) देश होने के नाते, अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रथाओं के तहत चीन को हमें पारगमन की आसान सुविधा देनी चाहिए।” घिमिरे ने बताया कि कोलकाता पोर्ट के जरिए माल मंगाने पर लागत इतनी बढ़ जाती है कि उपभोक्ताओं तक उचित मूल्य पर सामान पहुंचाना असंभव हो जाएगा।
कूटनीतिक पहल की मांग
नेपाल के व्यापारिक जानकारों का मानना है कि नेपाल सरकार को इस मुद्दे को गंभीरता से लेना चाहिए। उद्योगपतियों ने मांग की है कि विदेश मंत्री या प्रधानमंत्री के स्तर पर चीनी अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय कूटनीतिक बातचीत कर इस सीमा को जल्द से जल्द खुलवाने के प्रयास किए जाएं। इसके अलावा, भविष्य के संकटों से बचने के लिए किमाथांका (Kimathanka) जैसे वैकल्पिक सीमा बिंदुओं को विकसित करने की भी वकालत की जा रही है, जिसकी मांग पिछले 25 वर्षों से लटकी हुई है।


