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बढ़ते स्वार्थ के बीच, नीति-अनीति का फर्क तो नहीं भूल रहा इंसान ? : बिमल सरार्फ

 

बिमल सरार्फ, रक्सौल, 9 सितम्बर 2026 । समय बदल रहा है, समाज बदल रहा है और इंसान की सोच भी बदल रही है। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बदलाव के साथ हमारे नैतिक मूल्य भी कमजोर होते जा रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपने स्वार्थ के लिए सही और गलत, नीति और अनीति तथा सत्य और असत्य के बीच का अंतर ही भूलते जा रहे हैं?

आज कई बार ऐसा दिखाई देता है कि झूठ बोलने वाला प्रभावशाली बन जाता है और सच बोलने वाला अकेला पड़ जाता है। गलत रास्ते पर चलने वाला व्यक्ति सफलता का आनंद लेता दिखाई देता है, जबकि ईमानदार और सज्जन व्यक्ति अपने सिद्धांतों के कारण संघर्ष करता हुआ और कभी-कभी मायूस नजर आता है।

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विडंबना यह है कि समाज में व्यक्ति की पहचान उसके चरित्र से कम और उसकी ताकत, धन, प्रभाव तथा दिखावे से अधिक होने लगी है। जो व्यक्ति दूसरों को धोखा देकर अपना स्वार्थ पूरा करता है, उसके आसपास भीड़ दिखाई देती है; वहीं सच्चाई और ईमानदारी का रास्ता अपनाने वाला व्यक्ति कई बार अकेला रह जाता है।

लेकिन क्या यही कलियुग की सच्चाई है?

शायद नहीं। यह कलियुग की मजबूरी नहीं, बल्कि हमारी सोच और हमारे निर्णयों का परिणाम है। जब हम गलत को देखकर भी चुप रहते हैं, झूठ को सुविधा के लिए स्वीकार करते हैं और अपने स्वार्थ के सामने सिद्धांतों को छोटा समझने लगते हैं, तब अनीति को बढ़ने का अवसर मिलता है।

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सज्जन व्यक्ति की मायूसी का सबसे बड़ा कारण बुराई की ताकत नहीं, बल्कि अच्छाई की चुप्पी है। यदि ईमानदार लोग अपने मूल्यों पर दृढ़ रहें और गलत के सामने आवाज उठाएं, तो झूठ चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह हमेशा सत्य पर विजय नहीं पा सकता।

हमें यह समझना होगा कि सच्चाई की राह कठिन हो सकती है, लेकिन उसका अंत कभी पराजय नहीं होता। झूठ कुछ समय के लिए जीत सकता है, स्वार्थ कुछ समय के लिए सफलता दे सकता है और अनीति कुछ समय के लिए प्रभाव जमा सकती है, लेकिन अंततः व्यक्ति का मूल्य उसके चरित्र और कर्मों से ही तय होता है।

आज जरूरत किसी और को बदलने से पहले स्वयं को बदलने की है। हम यह तय करें कि परिस्थिति कैसी भी हो, सत्य का साथ नहीं छोड़ेंगे, गलत को गलत कहने का साहस रखेंगे और अपने स्वार्थ के लिए नैतिकता से समझौता नहीं करेंगे।

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क्योंकि जिस दिन इंसान ने नीति और अनीति का फर्क पूरी तरह भुला दिया, उस दिन समाज की सबसे बड़ी हार होगी। और जिस दिन सज्जन लोग अपनी चुप्पी तोड़कर सत्य के साथ खड़े हो जाएंगे, उसी दिन झूठ के साम्राज्य की नींव कमजोर पड़ने लगेगी।

कलियुग का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि पाप बढ़ रहा है, बल्कि यह है कि पाप के सामने पुण्य खड़ा होने का साहस कितनों में बचा है।

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