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बी.पी. कोइराला : जीवन, संघर्ष और प्रजातान्त्रिक समाजवाद : चंदन दुबे

 

चंदन दुबे, 9 सितंबर । नेपाल के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में बी.पी. कोइराला का नाम केवल एक राजनीतिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र, राष्ट्रीयता, सामाजिक न्याय और मानवीय स्वतंत्रता के वैचारिक योद्धा के रूप में स्थापित है। उनका जीवन नेपाली समाज को निरंकुशता से लोकतंत्र की ओर ले जाने वाले संघर्ष का इतिहास है। उनका मानना था कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि नागरिकों के सम्मान, स्वतंत्रता और आर्थिक–सामाजिक समानता को स्थापित करने का साधन होना चाहिए। इसी विचार को उन्होंने प्रजातान्त्रिक समाजवाद के दर्शन के रूप में आगे बढ़ाया।

बी.पी. कोइराला का जन्म 8 सितंबर 1914 को भारत के बनारस में हुआ था। उनके पिता कृष्णप्रसाद कोइराला राजनीतिक चेतना और सामाजिक सुधार के समर्थक थे। पारिवारिक वातावरण से ही बी.पी. को अन्याय, निरंकुशता और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा मिली। उनका प्रारंभिक जीवन भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और वहां विकसित राजनीतिक चेतना से प्रभावित रहा। अध्ययन के साथ-साथ वे साहित्य और राजनीति में सक्रिय होते गए।

बी.पी. केवल राजनीतिज्ञ ही नहीं, बल्कि नेपाली साहित्य के महत्वपूर्ण रचनाकार भी थे। ‘तीन घुम्ती’, ‘सुम्निमा’, ‘मोदीआइन’, ‘नरेन्द्र दाइ’ जैसी रचनाओं में उन्होंने मानव मनोविज्ञान, प्रेम, सामाजिक संबंध, नैतिक द्वंद्व और स्वतंत्र चेतना को गहराई से प्रस्तुत किया। उनका साहित्यिक व्यक्तित्व उनके राजनीतिक विचारों को समझने में भी सहायता करता है। उनके लिए मनुष्य किसी राजनीतिक नारे का साधन नहीं था, बल्कि स्वतंत्र इच्छा, भावनाओं और सम्मान वाला एक स्वतंत्र व्यक्तित्व था।

लोकतंत्र की यात्रा में बी.पी.

नेपाल में राणा शासन की निरंकुशता समाप्त कर प्रजातंत्र स्थापित करने के आंदोलन में बी.पी. कोइराला की भूमिका निर्णायक रही। सन् 1946 में नेपाली राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और बाद में नेपाली कांग्रेस के निर्माण के माध्यम से उन्होंने संगठित राजनीतिक आंदोलन को आगे बढ़ाया। 2007 साल की जनक्रांति ने नेपाल में राणा शासन का अंत किया और प्रजातान्त्रिक राजनीतिक परिवर्तन का मार्ग खोला।

लेकिन 2007 साल के परिवर्तन के बाद भी बी.पी. का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। उनका उद्देश्य केवल राणा शासन को हटाना नहीं था। वे ऐसा लोकतांत्रिक नेपाल बनाना चाहते थे, जहां जनता की सार्वभौमिकता स्थापित हो, नागरिकों के अधिकार सुरक्षित हों और राज्य जनता के प्रति जवाबदेह हो।

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2015 साल का आम चुनाव नेपाली लोकतांत्रिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। नेपाली कांग्रेस को बहुमत मिलने के बाद बी.पी. कोइराला नेपाल के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने। लेकिन उनकी सरकार अधिक समय तक नहीं चल सकी। 2017 साल पौष 1 गते राजा महेन्द्र ने निर्वाचित सरकार को भंग कर राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद बी.पी. को जेल जाना पड़ा और लंबे समय तक निर्वासन का जीवन बिताना पड़ा।

लेकिन सत्ता खोने के बाद भी उनका लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर नहीं हुआ। उन्होंने निरंकुश शासन से समझौता करके व्यक्तिगत राजनीतिक सुविधा प्राप्त करने का रास्ता नहीं चुना। इसके बजाय वे लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए लगातार संघर्ष करते रहे। उनका जीवन एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शिक्षा देता है—लोकतंत्र केवल सत्ता में रहकर नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अडिग रहकर बचाया जाता है।

प्रजातान्त्रिक समाजवाद : बी.पी. का मूल दर्शन

बी.पी. कोइराला के राजनीतिक दर्शन के केंद्र में प्रजातान्त्रिक समाजवाद था। उन्होंने न तो निरंकुश पूंजीवाद को स्वीकार किया और न ही ऐसी राज्य-केंद्रित साम्यवादी व्यवस्था को, जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त हो जाए। वे लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को एक-दूसरे का पूरक मानते थे।

उनके विचार में केवल राजनीतिक लोकतंत्र पर्याप्त नहीं था। यदि किसी नागरिक को मतदान का अधिकार तो है, लेकिन उसका परिवार भूखा है, उसे शिक्षा नहीं मिल सकती, उपचार की सुविधा नहीं है और वह सम्मानपूर्वक जीवन नहीं जी सकता, तो ऐसा लोकतंत्र अधूरा है। इसलिए लोकतंत्र को आर्थिक और सामाजिक न्याय से जोड़ना आवश्यक है।

बी.पी. के समाजवाद के केंद्र में मनुष्य था। उनके अनुसार राज्य के विकास का अंतिम उद्देश्य केवल बड़ी इमारतें, सड़कें या आर्थिक आंकड़े बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के लिए सम्मानपूर्वक जीवन जीने की परिस्थितियां पैदा करना है।

इस दृष्टि से प्रजातान्त्रिक समाजवाद के कुछ प्रमुख आधार स्पष्ट होते हैं—राजनीतिक स्वतंत्रता, बहुदलीय लोकतंत्र, सामाजिक समानता, आर्थिक न्याय, समान अवसर, कमजोर वर्गों की सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान।

समाजवाद और लोकतंत्र का संबंध

बी.पी. ने समाजवाद को लोकतंत्र से अलग करके नहीं देखा। उनका समाजवाद लोकतांत्रिक था और उनका विश्वास था कि लोकतंत्र सामाजिक न्याय पर आधारित होना चाहिए।

वे जानते थे कि आर्थिक असमानता राजनीतिक लोकतंत्र को कमजोर कर सकती है। यदि संपत्ति और अवसर कुछ सीमित लोगों के हाथों में केंद्रित हो जाएं, तो गरीब नागरिकों की राजनीतिक स्वतंत्रता भी व्यवहार में कमजोर हो जाती है। इसलिए लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए आर्थिक अवसरों का न्यायपूर्ण वितरण आवश्यक है।

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लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि राज्य नागरिकों के पूरे जीवन को नियंत्रित करे। बी.पी. व्यक्तिगत स्वतंत्रता, रचनात्मकता और निजी पहल के समर्थक थे। उनका समाजवाद राज्य और समाज के बीच संतुलन की तलाश करता था। राज्य कमजोर लोगों की रक्षा करे, अवसर पैदा करे और आधारभूत सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करे, लेकिन नागरिकों की स्वतंत्रता और उद्यमशीलता को समाप्त न करे।

किसान, श्रमिक और सामान्य नागरिक के प्रति दृष्टिकोण

बी.पी. की राजनीतिक सोच में किसान और श्रमिकों के जीवन स्तर में सुधार महत्वपूर्ण विषय था। नेपाल जैसे कृषि प्रधान देश में ग्रामीण जनता आर्थिक रूप से सशक्त हुए बिना लोकतंत्र की नींव मजबूत नहीं हो सकती—यह उनकी सोच थी।

वे विकास को केवल शहरों और सीमित वर्ग की समृद्धि तक सीमित नहीं रखना चाहते थे। गांव, किसान, मजदूर, निम्न आय वाले नागरिक और राज्य की पहुंच से दूर रहने वाले समुदायों को विकास की मुख्यधारा में लाना प्रजातान्त्रिक समाजवाद का महत्वपूर्ण उद्देश्य था।

आज के नेपाल में भी यह प्रश्न उतना ही महत्वपूर्ण है। देश में सड़क, भवन, तकनीक और बुनियादी ढांचे का विस्तार हो, लेकिन यदि बेरोजगारी, गरीबी, असमानता और अवसरों की कमी बनी रहती है, तो विकास की वास्तविकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। बी.पी. का दर्शन हमें विकास के केंद्र में नागरिक को रखने की सीख देता है।

राष्ट्रीयता और लोकतंत्र

बी.पी. के राजनीतिक दर्शन में लोकतंत्र के साथ राष्ट्रीयता का भी विशेष महत्व था। उनके लिए राष्ट्रीयता केवल भावनात्मक नारा नहीं थी। यह राष्ट्र के स्वाभिमान, संप्रभुता और नागरिकों की स्वतंत्रता से जुड़ा विषय था।

उन्होंने राष्ट्रीयता और लोकतंत्र को एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना। उनका विश्वास था कि लोकतंत्र मजबूत होगा तो राष्ट्र भी मजबूत होगा। नागरिकों को अधिकारों से वंचित करके कोई राष्ट्र वास्तव में मजबूत नहीं बन सकता। जनता के विश्वास, सहभागिता और स्वतंत्रता पर आधारित राष्ट्र ही दीर्घकाल में मजबूत और स्थायी बन सकता है।

आज के नेपाल में बी.पी. की प्रासंगिकता

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बी.पी. कोइराला का निधन 21 जुलाई 1982 को हुआ। वे आज हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं, लेकिन उनके विचार आज भी नेपाली राजनीति में बहस और चिंतन का विषय बने हुए हैं।

आज नेपाल में लोकतंत्र संस्थागत हो चुका है। संविधान ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों की गारंटी दी है और संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र स्थापित है। फिर भी लोकतंत्र की गुणवत्ता, सुशासन, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, राजनीतिक अस्थिरता और अवसरों तक असमान पहुंच जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं।

इसी कारण बी.पी. के प्रजातान्त्रिक समाजवाद का आज के संदर्भ में पुनर्पाठ आवश्यक है। उनके विचारों को केवल किसी राजनीतिक दल के चुनावी नारे तक सीमित रखना उनके प्रति न्याय नहीं होगा। प्रजातान्त्रिक समाजवाद का वास्तविक अर्थ है—राज्य संचालन में पारदर्शिता, नागरिक स्वतंत्रता का सम्मान, सामाजिक न्याय, समान अवसर, गरीब और कमजोर वर्गों की सुरक्षा तथा आर्थिक विकास में जनता की सहभागिता सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष

बी.पी. कोइराला का जीवन संघर्ष, विचार और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता की एक अद्वितीय यात्रा है। उन्होंने नेपाली समाज को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन दिया—लोकतंत्र के बिना समाजवाद अधूरा है और सामाजिक न्याय के बिना लोकतंत्र कमजोर है।

उनके लिए राजनीति व्यक्तिगत सत्ता और पद का खेल नहीं थी। राजनीति लोगों के जीवन को बदलने का माध्यम थी। इसलिए उनके प्रजातान्त्रिक समाजवाद के केंद्र में राज्य नहीं, पार्टी नहीं और नेता नहीं, बल्कि साधारण नेपाली नागरिक था।

बी.पी. का वास्तविक सम्मान केवल उनकी तस्वीर पर माला चढ़ाने या उनकी जयंती मनाने से नहीं होता। उन्होंने जिस लोकतांत्रिक मार्ग, सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय स्वाभिमान और नागरिक स्वतंत्रता का आदर्श प्रस्तुत किया, उसे व्यवहार में उतारना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

आज नेपाल की राजनीति नई पीढ़ी, नई आकांक्षाओं और नई चुनौतियों के दौर में प्रवेश कर रही है। ऐसे समय में बी.पी. के विचारों को ज्यों का त्यों दोहराने के बजाय उनकी मूल भावना को समझकर वर्तमान युग के अनुरूप लागू करना आवश्यक है।

लोकतंत्र को जनता के जीवन से जोड़ने, आर्थिक विकास को सामाजिक न्याय से जोड़ने और राष्ट्रीयता को नागरिक स्वतंत्रता से जोड़ने वाला बी.पी. कोइराला का दृष्टिकोण आज भी नेपाल के समृद्ध, स्वतंत्र और न्यायपूर्ण भविष्य के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है।

चन्दन दुबे

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