नेपाल: ‘जेन-जेड’ आंदोलन की काली बरसी और सत्ता की नाकामी की खौफनाक दास्तान
काठमांडू, 9 सितंबर । नेपाल में २०८२ भाद्र २३ के ‘जेन-जेड’ (Gen-Z) आंदोलन को एक वर्ष पूरा हो चुका है, लेकिन यह बरसी किसी बदलाव का जश्न नहीं, बल्कि सत्ता की क्रूरता, अंधी लूटपाट और टूटे हुए सपनों का मातम है। वरिष्ठ राजनेता हृदयेश त्रिपाठी का हालिया बयान देश की उस भयावह स्थिति का पर्दाफाश करता है, जहाँ केपी शर्मा ओली के अहंकार और शेरबहादुर देउबा के लालच ने लगभग पाँच दर्जन (साठ) बेगुनाह युवाओं को मौत के घाट उतार दिया। यह नरसंहार केवल एक दिन की त्रासदी नहीं थी; इसके अगले ही दिन पूरे देश को अराजकता, आगजनी और निजी संपत्ति के विध्वंस की आग में झोंक दिया गया, जबकि राज्य एक लाचार और मूकदर्शक की तरह अपनी जिम्मेदारियों से भागता रहा।
इस कथित राजनीतिक आंदोलन की आड़ में जो हुआ, वह पूरी तरह से एक संगठित आपराधिक कृत्य था। इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण त्रिपाठी के अपने परिवार को भुगतना पड़ा। उनके जेन-जेड उम्र के युवा बेटे ने बैंक से भारी भरकम कर्ज लेकर जिस शक्कर उद्योग की नींव रखी थी, दंगाइयों ने उसे लूट कर जला दिया। इस एक आगजनी ने सिर्फ एक युवा उद्यमी का सपना ही चकनाचूर नहीं किया, बल्कि ३०० से अधिक मजदूरों का रोजगार छीन लिया और सैकड़ों किसानों को उनकी आजीविका और सुविधाओं से वंचित कर दिया।
आज उस बर्बाद हो चुके कारखाने की राख पर यह परिवार बैंक का ब्याज चुकाने को मजबूर है। दिखावे के लिए बनाई गई जाँच समितियाँ और आयोग केवल एक नाटक साबित हुए हैं। सरकार की ओर से पीड़ितों को कोई सहुलियत या मुआवजा नहीं मिला है।
यह पूरी घटना नेपाल में उद्योग और व्यापार के भविष्य पर एक गंभीर सवालिया निशान लगाती है। जिस देश में सरकार अपने सबसे सुरक्षित माने जाने वाले ठिकानों—जैसे सिंह दरबार और सर्वोच्च अदालत—की रक्षा करने में विफल रही हो, वहाँ आम नागरिक की निजी संपत्ति की सुरक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यह व्यवस्था अब केवल बिचौलियों और दलालों के लिए उपयुक्त रह गई है।
जब राज्य खुद उद्यमियों को सुरक्षा देने में इस कदर असमर्थ और उदासीन है, तो विदेशी निवेश की उम्मीद करना एक क्रूर मजाक है। “राख का ब्याज” चुकाते हुए बर्बाद हो चुके नागरिकों की ओर से सरकार को दी गई ‘शुभकामनाएं’ सत्ता के मुँह पर एक करारा तमाचा हैं। यह स्पष्ट चेतावनी है कि बिना सुरक्षा और न्याय के, नेपाल में कोई भी उद्योग लगाना अब एक अपराध बन चुका है।


