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आस्थाका अलौकिक यात्रा: ‘हनुमान अंश’ : डा.विजय दत्त

 


डा.विजय दत्त, काठमांडू 9 सितंबर । मेरी आंख,कान सहित का ज्ञानेन्द्रीया अौर कर्मेन्द्रीया पावन हो गयी जब मैने *हनुमान अंश* फिल्मको श्रवण एवं नयनावलोकन किया । ऐसा अनुपम-अदभूत फिल्म कम्ती मे रामायण सिरियल के वाद ही पाया । नीब करोडी बाबा के जीवन दर्शन के इर्दगिर्द घुमती यह फिल्म को जितनी वयां करे वह कम ही होगा ।

*अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं*
*दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।*
*सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं*
*रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥*

​भारतीय सिनेमा में जहाँ एक ओर एक्शन, हिंसा, अत्यधिक वीएफएक्स और तड़क-भड़क वाले विषयों का बोलबाला है, वहीं निर्देशक विशाल चतुर्वेदी की फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने एक शांत क्रांति की तरह सिनेमाघरों में दस्तक दी। बिना किसी विशाल बजट या ग्लैमरस स्टारकास्ट के रिलीज़ हुई इस फिल्म ने न केवल दर्शकों के दिलों को छुआ, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए आयाम भी स्थापित किए। यह फिल्म 20वीं सदी के महान संत, अलौकिक पुरुष और कलयुग में भक्ति के जीवंत प्रतीक नीम करोली बाबा (महाराज जी) के शुरुआती जीवन, उनकी साधना, वैराग्य और अलौकिक रूपांतरण की महायात्रा पर आधारित एक परिष्कृत भक्ति-जीवनी (Biographical Drama) है।

*​विषय वस्तु और स्वर्णिम विगत*(Plot & Core Narrative)
​’हनुमान अंश’ केवल एक ऐतिहासिक या जीवनीपरक फिल्म नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की ‘सेवा और समर्पण’ की आत्मा को परदे पर जीवंत करने वाला एक आध्यात्मिक दस्तावेज़ है। फिल्म की पटकथा महाराज जी के प्रारंभिक जीवन से लेकर उनके सर्वप्रिय ‘नीम करोली बाबा’ बनने तक के स्वर्णिम विगत को बहुत ही प्रामाणिक और भावुक तरीक़े से बुनती है।
​1. *बाल्यावस्था और गृह-त्याग*
​फिल्म की शुरुआत उत्तर प्रदेश के एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार से होती है, जहाँ महाराज जी का जन्म ‘लक्ष्मण नारायण शर्मा’ के रूप में हुआ था। बाल्यावस्था से ही उनके चेहरे पर एक अद्भुत तेज़ और शांत भाव था। अपनी माता के असमय निधन के बाद, मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में ही उनके मन में संसार के नश्वर सुखों के प्रति वैराग्य उत्पन्न हो गया। ईश्वर से पुनर्मिलन और सत्य की खोज की तीव्र उत्कंठा में वे चुपचाप अपना घर-परिवार छोड़कर निकल पड़े।

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​2. *कठोर साधना, मौन और ब्रज की रज*
​फिल्म का मध्य भाग उनकी अज्ञात साधना के वर्षों को दर्शाता है। वे उत्तर भारत के घने जंगलों, गंगा-यमुना के तटों और ब्रज क्षेत्र की पावन भूमि पर घूमते रहे। इस दौरान उन्होंने वर्षों तक मौन धारण किया, अत्यंत कठिन तपस्या की और वैष्णव संतों के सान्निध्य में रहकर अपनी चेतना को हनुमान जी की अगाध भक्ति में विलीन कर दिया। फिल्म में यह बहुत सुंदरता से दिखाया गया है कि कैसे उन्होंने सिद्धियों का संचय करने के बजाय अहंकार का पूरी तरह से विसर्जन किया।

​3. *ट्रेन वाला ऐतिहासिक प्रसंग और ‘नीब करोडी’ नामकरण*
​फिल्म का सबसे रोमांचक और केंद्रीय मोड़ वह क्षण है, जब 25 वर्ष की अवस्था में बाबा एक प्रथम श्रेणी के ट्रेन डिब्बे में यात्रा कर रहे थे। फर्रुखाबाद के पास ‘नीब करोडी’ (Niba Karori) नामक गाँव के पास एक अंग्रेज टीटीई (TTE) ने बिना टिकट सफर करने के कारण उन्हें जबरन ट्रेन से उतरवा दिया। बाबा बिना किसी विरोध या क्रोध के मुस्कुराते हुए ट्रेन से नीचे उतर गए और अपनी चिमटी-कमंडल के साथ पास के एक पेड़ के नीचे बैठ गए।
​इसके बाद जो हुआ, उसने इतिहास रच दिया:
​गार्ड ने हरी झंडी दिखाई, ड्राइवर ने थ्रॉटल दबाया, लेकिन ट्रेन का शक्तिशाली इंजन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा।
​रेलवे के वरिष्ठ इंजीनियरों को बुलाया गया, दूसरा इंजन जोड़ा गया, ब्रेक और तकनीकी प्रणाली की जाँच की गई—सब कुछ दुरुस्त था, फिर भी ट्रेन टस से मस नहीं हुई।
​स्थानीय ग्रामीणों ने अधिकारियों को समझाया कि जिस साधु को आपने उतारा है, वे कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं।
​अंततः अंग्रेज अधिकारियों ने अपनी गलती मानी, बाबा से क्षमा याचना की और उनसे वापस ट्रेन में बैठने का अनुरोध किया।
*​बाबा ने दो शर्तें रखीं:* पहली, रेलवे उस गाँव में स्थानीय गरीब ग्रामीणों के लिए एक रेलवे स्टेशन बनाएगा; और दूसरी, साधु-संतों का सम्मान किया जाएगा।

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​अधिकारियों के शर्त स्वीकार करते ही बाबा जैसे ही डिब्बे में चढ़े, ट्रेन स्वतः चलने लगी। इसी अलौकिक घटना के बाद वे ‘नीब करोडी बाबा’ (जो कालक्रम में नीम करोली बाबा कहलाए) के नाम से जगत् प्रसिद्ध हुए।

​4. *’हनुमान अंश’ के रूप में लोक कल्याण*
​फिल्म के अंतिम खंड में उनके द्वारा स्थापित कैंची धाम (उत्तराखंड) और वृंदावन आश्रम के निर्माण, अनवरत भंडारों, और उनके द्वारा किए गए गुप्त दानों को दर्शाया गया है। वे स्वयं को कभी भगवान या गुरु नहीं कहते थे; वे सदैव यही दोहराते थे—”सब हनुमान जी करते हैं, मैं तो बस एक निमित्त हूँ।”

*हिट होने का कारण* (Why it became a Blockbuster)
​शुरुआत में बहुत ही सीमित स्क्रीन्स और महज़ कुछ सौ शो के साथ रिलीज़ हुई यह फिल्म धीरे-धीरे एक जन-आंदोलन में बदल गई। इसके हिट होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:-
*​सच्ची आस्था और सादगी:* आज के दौर में जहाँ अधिकांश धार्मिक फिल्मों में भारी-भरकम स्पेशल इफेक्ट्स और कृत्रिम नाटकीयता का सहारा लिया जाता है, वहीं ‘हनुमान अंश’ ने सादगी को अपना हथियार बनाया। इसमें कोई दिखावा नहीं था, केवल भाव था। दर्शकों ने इसे सिनेमा देखने के बजाय एक ‘आध्यात्मिक अनुभव’ माना।

*​माउथ टु माउथ पब्लिसिटी का चमत्कार*(Word of Mouth): इस फिल्म के पीछे किसी बड़े कॉर्पोरेट हाउस या भारी-भरकम पीआर (PR) कैंपेन का हाथ नहीं था। फिल्म देखकर निकले आम दर्शकों ने ही इसके रील्स, वीडियो और रिव्यूज़ सोशल मीडिया पर शेयर किए, जिससे सिनेमाघरों के बाहर लंबी कतारें लग गईं।

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*​वैश्विक संदर्भ और युवा पीढ़ी का जुड़ाव*: आज की युवा पीढ़ी तनाव और भ्रम से जूझ रही है। नीम करोली बाबा का जीवन-जिसने स्टीव जॉब्स (Apple), मार्क जुकरबर्ग (Meta), जूलिया रॉबर्ट्स और पंडित रविशंकर जैसी वैश्विक हस्तियों को शांति और दिशा दी-युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।
*​सशक्त अभिनय और मंत्रमुग्ध कर देने वाला संगीत:* मुख्य अभिनेता शोभिनव सत्या ने नीम करोली बाबा की भूमिका में अपनी आँखों की शांति, मंद मुस्कान और सौम्य भाव-भंगिमाओं से आत्मा फूँक दी। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और हनुमान चालीसा का शास्त्रीय गायन दर्शकों को भाव-विभोर कर देता है।
*​आस्था का सुंदरतम इतिहास*
​’हनुमान अंश’ केवल भूतकाल की घटनाओं का वर्णन भर नहीं है, बल्कि यह सनातन परंपरा के मूल सिद्धांतों—’अहंकार विसर्जन’, ‘अतिथि देवो भव:’ और ‘निःस्वार्थ मानव सेवा’—का एक सुंदरतम दस्तावेज़ है।
​यह फिल्म इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सच्चा संत वह नहीं है जो महल बनाता है या लाखों के वस्त्र पहनता है, बल्कि वह है जो एक कंबल ओढ़कर पूरे संसार को अपने प्रेम की गर्मी से ढंक लेता है। महाराज जी का जीवन यह सिखाता है कि राम-नाम का निरंतर स्मरण और भूखे को भोजन कराना ही सबसे बड़ी पूजा है। यही कारण है कि यह फिल्म देखने के बाद दर्शक सिनेमाघर से एक अलग ही शांति और मानसिक शुद्धि लेकर बाहर निकलते हैं।

*​आर्थिक कमाई और बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड*(Box Office Collection)
​व्यावसायिक और वित्तीय दृष्टि से ‘हनुमान अंश’ ने भारतीय सिनेमा के इतिहास में सफलता के सारे गणित बदल दिए हैं। अत्यंत सूक्ष्म बजट में बनी इस फिल्म ने अपने लागत की तुलना में अभूतपूर्व रिटर्न (ROI) अर्जित किया है।

अन्तमे,
*मैने तेरे ही भरोसे हनुमान*
*सागर मे नैया डार दई।*

डॉ विजय दत्त
विश्लेषक

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