उत्तरी सीमा पर चीन का विकास, नेपाल की चुप्पी और बढ़ता प्राकृतिक जोखिम : अनिल तिवारी
अनिल तिवारी, बीरगंज 14 सितम्बर। नेपाल और चीन के बीच संबंध केवल दो पड़ोसी देशों के बीच का कूटनीतिक रिश्ता नहीं है। यह हिमालय, तिब्बत, सीमा सुरक्षा, व्यापार, बुनियादी ढाँचे, पर्यावरण और नेपाल के रणनीतिक हितों से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय भी है। पिछले एक दशक में नेपाल के राजनीतिक दलों ने भारत के साथ संबंधों में दबाव बनाने के लिए चीन के साथ संबंधों को एक रणनीतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। चीन से रेल लाने का सपना, उत्तरी सीमा के नाकों के विस्तार की योजनाएँ, केरुंग–काठमांडू रेलमार्ग की चर्चा और चीनी बुनियादी ढाँचे के सहयोग को लेकर राजनीतिक उत्साह इसी मानसिकता की अभिव्यक्तियाँ हैं।
समस्या चीन के साथ संबंध विस्तार करने में नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब राष्ट्रीय हित का स्पष्ट मूल्यांकन किए बिना किसी भी शक्तिशाली राष्ट्र के प्रति राजनीतिक आकर्षण और अंधभक्ति दिखाई जाने लगे।
चीन ने तिब्बत में पिछले वर्षों के दौरान सड़क, रेल, हवाई अड्डे, जलविद्युत परियोजनाओं, ऊर्जा तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे का तेजी से विस्तार किया है। चीन के लिए ये परियोजनाएँ आर्थिक विकास, क्षेत्रीय संपर्क और सीमा सुरक्षा से जुड़ी हो सकती हैं। लेकिन नेपाल के दृष्टिकोण से हिमालय की कमजोर भौगोलिक संरचना में हो रहे इतने बड़े पैमाने के निर्माण से उत्पन्न पर्यावरणीय और आपदा संबंधी जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विशेष रूप से नेपाल–चीन सीमा से जुड़े हिमालयी क्षेत्रों में सड़क विस्तार, सुरंगों, जलविद्युत परियोजनाओं, बाँधों तथा अन्य भौतिक संरचनाओं के निर्माण का प्रभाव सीमा पार नेपाल तक पहुँच सकता है। भूस्खलन, हिमताल विस्फोट, नदी के प्रवाह में बदलाव, अचानक आने वाली बाढ़ और भूक्षरण जैसे जोखिम किसी राजनीतिक सीमा को नहीं मानते। एक देश में किया गया पर्यावरणीय हस्तक्षेप दूसरे देश की बस्तियों, कृषि भूमि, सड़कों, पुलों और जलविद्युत संरचनाओं तक नुकसान पहुँचा सकता है।
चीन के हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली अनेक नदियाँ नेपाल के रास्ते भारत के विभिन्न राज्यों से होकर समुद्र में मिलती हैं। नेपाल में आने वाली बाढ़ और नदीजनित आपदाओं का प्रभाव भारत तक भी पहुँचता है। इसलिए हिमालय और उसकी नदी प्रणालियों को केवल राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर देखकर नहीं समझा जा सकता।
इसी कारण नेपाल को उत्तरी सीमा पर हो रही बड़ी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को केवल ‘चीन का विकास’ कहकर तालियाँ बजाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। प्रत्येक परियोजना के संभावित सीमापार प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय मूल्यांकन और समयबद्ध सूचना के आदान-प्रदान की माँग करनी चाहिए।
रसुवा सहित हिमालयी क्षेत्रों में हुई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं ने इस प्रश्न को और गंभीर बना दिया है। किसी भी प्राकृतिक आपदा को सीधे किसी एक परियोजना या देश से जोड़कर निष्कर्ष निकालना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। अत्यधिक वर्षा, हिमताल, जलवायु परिवर्तन, भूगर्भीय संरचना, वन विनाश, अव्यवस्थित सड़क निर्माण और नदी प्रणालियों में बदलाव जैसे अनेक कारण प्राकृतिक आपदाओं के पीछे हो सकते हैं। लेकिन सीमा पार की गतिविधियों से जोखिम बढ़ा है या नहीं, इस पर अध्ययन ही न करना अपने आप में एक गंभीर कमजोरी है।
दुर्भाग्य से नेपाल में चीन से जुड़े संवेदनशील विषय उठते ही बहस अक्सर अतिवाद की ओर चली जाती है। राष्ट्रवादी कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े कई लोग चीन की आलोचना को ही राष्ट्रविरोधी व्यवहार के रूप में प्रस्तुत करते दिखाई देते हैं। यह दृष्टिकोण न तो नेपाल के दीर्घकालीन हित में है और न ही स्वतंत्र विदेश नीति की भावना के अनुरूप।
नेपाल को चीन के साथ मित्रता रखनी चाहिए, लेकिन ऐसी मित्रता नहीं जिसमें सवाल पूछने की गुंजाइश ही न हो। भारत के साथ असहमति होने पर चीन का कार्ड खेलना और चीन के साथ असहमति होने पर भारत का कार्ड इस्तेमाल करना अंततः नेपाल की अपनी कूटनीतिक क्षमता को कमजोर करता है। पड़ोसियों के बीच संतुलन बनाए रखने के नाम पर किसी एक पड़ोसी के प्रति अंधभक्ति दिखाना स्वतंत्र विदेश नीति नहीं है।
नेपाली नेताओं को चीनी नेतृत्व की प्रशंसा करने का अधिकार है और यह सामान्य कूटनीतिक व्यवहार भी हो सकता है। लेकिन प्रशंसा और राष्ट्रीय हित के बीच की सीमा समाप्त नहीं होनी चाहिए। नेपाल को किसी भी विदेशी बुनियादी ढाँचा परियोजना में ऋण, अनुदान, निर्माण लागत और तत्काल राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर पर्यावरणीय सुरक्षा, स्थानीय समुदायों के अधिकार, आपदा जोखिम और दीर्घकालीन आर्थिक प्रतिफल को प्राथमिकता देनी चाहिए।
अब नेपाल को उत्तरी सीमा पर सीमापार पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की स्थायी व्यवस्था बनाने की पहल करनी चाहिए। बड़े बाँधों, जलविद्युत परियोजनाओं, सुरंगों, सड़कों तथा नदी के प्रवाह में बदलाव लाने वाली परियोजनाओं के बारे में नेपाल को समय पर जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था होनी चाहिए। नेपाल की नदियों और हिमतालों की संयुक्त वैज्ञानिक निगरानी, बाढ़ की पूर्व चेतावनी प्रणाली और आपातकालीन सूचना आदान-प्रदान भी अनिवार्य होना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व को मौन की राजनीति छोड़नी होगी। चीन हमारा महत्वपूर्ण पड़ोसी है, भारत भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अमेरिका से लेकर यूरोप तक दुनिया की प्रमुख शक्तियों के साथ नेपाल के संबंध हैं। नेपाल का भविष्य किसी एक शक्ति की कृपा पर निर्भर नहीं होना चाहिए, बल्कि संतुलित कूटनीति, राष्ट्रीय स्वाभिमान और प्रमाण आधारित निर्णयों पर आधारित होना चाहिए।
नेपाल चीन से रेल माँग सकता है, सड़क माँग सकता है, व्यापारिक नाके खोल सकता है और जलविद्युत सहयोग कर सकता है। लेकिन इसके बदले अपने हिमालय, नदियों और नागरिकों की सुरक्षा पर मौन नहीं रह सकता। मित्रता बराबरी के संवाद से मजबूत होती है, अंधभक्ति से नहीं।
उत्तरी हिमालय में हो रहे तेज विकास को नेपाल न तो केवल विरोध के नारों तक सीमित करे और न ही प्रशंसा के गीतों तक। जहाँ अवसर है, वहाँ सहयोग; जहाँ जोखिम है, वहाँ सवाल; और जहाँ नेपाल का राष्ट्रीय हित जुड़ा है, वहाँ स्पष्ट रुख—यही परिपक्व कूटनीति का रास्ता है।
हिमालय की पीड़ा और जलवायु अन्याय
नेपाल ने वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बहुत कम योगदान दिया है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के सबसे कठोर और तत्काल प्रभावों का सामना करने वाले देशों में वह अग्रिम पंक्ति में है। हिमालय पिघल रहा है, हिमतालों का खतरा बढ़ रहा है और भूस्खलन तथा अचानक आने वाली बाढ़ का स्वरूप अधिक जटिल होता जा रहा है। विडंबना यह है कि जिसने वैश्विक तापमान वृद्धि में बेहद कम योगदान दिया, वही उसके परिणामों की असमान रूप से बड़ी कीमत चुका रहा है।
विश्व बैंक के वर्ष 2024 के आँकड़ों के अनुसार वैश्विक औसत प्रति व्यक्ति वार्षिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन लगभग 4.67 टन है। चीन में यह 9.3 टन, अमेरिका में 13.6 टन और भारत में 2.17 टन है। इसके मुकाबले नेपाल में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन लगभग 0.54 टन ही है। इससे स्पष्ट होता है कि वैश्विक जलवायु संकट पैदा करने में नेपाल की भूमिका बेहद नगण्य है। फिर भी संकट के प्रभाव से नेपाल बच नहीं पा रहा है।
हिमालय केवल नेपाल का भूगोल नहीं है। यह भारत, नेपाल और चीन को जोड़ने वाली एक विशाल प्राकृतिक प्रणाली है। हिमनद सीमाएँ नहीं पहचानते। हिमताल, नदी घाटियाँ, भूस्खलन, हिमस्खलन और हवाओं की धाराएँ राजनीतिक नक्शे की रेखाओं का अनुसरण नहीं करतीं। एक देश के हिमालयी क्षेत्र में होने वाला भौगोलिक परिवर्तन दूसरे देश की नदियों, बस्तियों और जनजीवन को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए भारत, नेपाल और चीन के बीच पर्यावरणीय सहयोग के लिए एक संस्थागत त्रिपक्षीय व्यवस्था की आवश्यकता है। जब प्रकृति सीमाओं को नहीं मानती, तो पर्यावरणीय प्रबंधन केवल राजनीतिक सीमाओं के भीतर सीमित क्यों रहे?
विशेष रूप से वास्तविक समय में जल और मौसम संबंधी आँकड़ों का आदान-प्रदान, हिमतालों और हिमनदों की निगरानी, अचानक आने वाली बाढ़ की पूर्व चेतावनी तथा सीमापार आपदा प्रबंधन के लिए तीनों देशों के बीच पारदर्शी व्यवस्था आवश्यक है।
यहाँ चीन की भूमिका विशेष रूप से संवेदनशील है। तिब्बती पठार एशिया की महत्वपूर्ण नदी प्रणालियों का स्रोत क्षेत्र है। नेपाल की कोशी, बागमती, गंडकी, कर्णाली और महाकाली जैसी नदी प्रणालियाँ तथा भारत की ब्रह्मपुत्र, सिंधु और गंगा प्रणाली की कई प्रमुख सहायक नदियाँ इसी व्यापक हिमालयी भूभाग से जुड़ी हैं।
चीन तिब्बत में सड़क, सुरंग, जलविद्युत परियोजनाओं, बाँधों तथा अन्य बुनियादी ढाँचे का तेजी से विस्तार कर रहा है। विकास करना चीन का अधिकार है। प्रश्न विकास के अधिकार का नहीं, बल्कि पारदर्शिता का है।
क्या इन बड़ी परियोजनाओं के सीमापार पर्यावरणीय प्रभावों के बारे में नेपाल और भारत को पर्याप्त जानकारी दी जाती है? आपदा के समय आवश्यक हाइड्रोलॉजिकल आँकड़े कितनी जल्दी उपलब्ध होते हैं? संभावित जोखिमों के बारे में पूर्व चेतावनी की व्यवस्था कितनी विश्वसनीय है?
ये सवाल चीन विरोधी नहीं हैं। ये नेपाल की सुरक्षा, जीवन और भविष्य से जुड़े सवाल हैं।
नेपाल ने पिछले वर्षों में उत्तरी पड़ोसी के साथ संबंध विस्तार को कई बार राजनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा है। चीन से रेल आने का सपना, उत्तरी नाकों का विस्तार, सड़क और बुनियादी ढाँचे में सहयोग तथा चीनी निवेश को लेकर राजनीतिक उत्साह दिखाई दिया। भारत के साथ तनाव पैदा होने पर चीन को रणनीतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति भी दिखाई दी। लेकिन मित्रता और अंधभक्ति के बीच का अंतर नेपाली राजनीति को अभी भी स्पष्ट रूप से समझना होगा।
रसुवा सहित हिमालयी क्षेत्रों में हुई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने इस प्रश्न को और गंभीर बना दिया है। उपलब्ध वैज्ञानिक विश्लेषण बताते हैं कि ऐसी घटनाओं की व्याख्या केवल एक कारण से नहीं की जा सकती। बर्फ और चट्टानों का खिसकना, तापमान वृद्धि, पर्माफ्रॉस्ट का कमजोर होना, भूगर्भीय संरचना, अत्यधिक वर्षा और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियाँ एक साथ भूमिका निभा सकती हैं।
लेकिन एक बात स्पष्ट है—जलवायु परिवर्तन हिमालयी क्षेत्र की प्राकृतिक संवेदनशीलता को बढ़ा रहा है।
वैज्ञानिकों के अनुसार हिंदूकुश हिमालय दुनिया के कई अन्य हिस्सों की तुलना में तेज तापमान वृद्धि का सामना कर रहा है। हिमनद सिकुड़ रहे हैं और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से चट्टानों और हिमनदों को जोड़कर रखने वाली प्राकृतिक संरचना कमजोर हो रही है। परिणामस्वरूप हिमस्खलन, चट्टान गिरने, हिमताल विस्फोट और अचानक आने वाली बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है।
काठमांडू को भारत की तरह चीन के सामने भी अपने प्रश्न स्पष्ट रूप से रखने में सक्षम होना चाहिए। नदी के आँकड़ों, बाँधों के संचालन, अचानक आने वाली बाढ़ की सूचना, सीमावर्ती बुनियादी ढाँचे के पर्यावरणीय प्रभाव और आपदा की पूर्व चेतावनी के संबंध में नेपाल को संस्थागत संवाद की माँग करनी चाहिए।
जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण मंत्रालय का विषय नहीं रह गया है। यह विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, जल संसाधन, ऊर्जा, बुनियादी ढाँचे और आर्थिक नीति का भी विषय बन चुका है।
नेपाल द्वारा संयुक्त राष्ट्र के ‘फंड फॉर रिस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज’ के तहत क्षतिपूर्ति और सहायता की माँग आगे बढ़ाना इसी कारण महत्वपूर्ण है। नेपाल ने वैश्विक जलवायु संकट पैदा करने में बेहद कम योगदान दिया है, लेकिन इसके प्रभाव से भारी क्षति झेल रहा है। इस तर्क को अंतरराष्ट्रीय मंच पर और मजबूती से उठाया जाना चाहिए।
लेकिन क्षतिपूर्ति की माँग के साथ नेपाल को अपने घर को भी व्यवस्थित करना होगा। हिमालयी क्षेत्रों में अव्यवस्थित सड़क निर्माण, कमजोर बुनियादी ढाँचा, जोखिम वाले स्थानों पर बस्तियाँ और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की अनदेखी करने वाली परियोजनाएँ आपदा की क्षति को और बढ़ा सकती हैं। जलवायु न्याय की माँग करने वाले देश को अपनी विकास नीति को भी जलवायु-संवेदनशील बनाना होगा।
अब नेपाल की प्राथमिकता स्पष्ट होनी चाहिए—भारत विरोधी चीन कार्ड नहीं, और न ही चीन या भारत में से किसी एक के प्रति अंधसमर्थन। नेपाल का रास्ता राष्ट्रीय हित पर आधारित संतुलित कूटनीति होना चाहिए।
क्योंकि हिमालय कमजोर हुआ तो उसका असर केवल नेपाल की सीमा तक सीमित नहीं रहेगा। करोड़ों लोगों का पानी, कृषि, ऊर्जा, आजीविका और जीवन इसी हिमालयी प्रणाली से जुड़ा है। इसका भविष्य पूरे दक्षिण एशिया के भविष्य से जुड़ा हुआ है।
इसलिए नेपाल को अब मौन कूटनीति नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित सक्रिय जलवायु कूटनीतिअपनानी होगी। हिमालय की आवाज अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचानी होगी। भारत और चीन दोनों से समान रूप से सवाल करने होंगे। सीमापार पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की व्यवस्था की माँग करनी होगी। वास्तविक समय में पानी और मौसम संबंधी आँकड़ों के आदान-प्रदान की बाध्यकारी व्यवस्था बनाने की पहल करनी होगी।
हिमालय साझा है तो उसका जोखिम भी साझा होना चाहिए और उसकी रक्षा की जिम्मेदारी भी।
नेपाल के छोटे से उत्सर्जन ने दुनिया को गर्म नहीं किया। लेकिन दुनिया के गर्म होने से नेपाल के हिमालय पिघल रहे हैं।
इसलिए नेपाल की माँग दान नहीं—न्याय है।और वह न्याय माँगने के लिए नेपाल को सबसे पहले अपनी मौन कूटनीति तोड़नी होगी।






