Mon. Oct 12th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

नेपाल में भारत का ‘राजनीतिक दूत’: क्या कूटनीति के रिसेट बटन पर है नई दिल्ली ? : कृतिका यादव

 


कृतिका यादव, काठमांडू, १६ सितम्बर। ​दक्षिण एशियाई कूटनीति के कैनवास पर इन दिनों एक नई इबारत लिखी जा रही है। काठमांडू के राजनीतिक और कूटनीतिक गलियारों में यह बहस उफान पर है कि भारत नेपाल में अपने अगले राजदूत के रूप में किसी करियर कूटनीतिज्ञ (IFS अधिकारी) के स्थान पर किसी उच्च-स्तरीय ‘राजनीतिक व्यक्ति’ को नियुक्त कर सकता है। नेपाल में भारत के वर्तमान राजदूत नवीन श्रीवास्तव का कार्यकाल  इसी माह अपनी समाप्ति की ओर है और उनकी विदाई की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। ऐसे में नई दिल्ली की अगली पसंद को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है।

*​कूटनीति बनाम राजनीति: बदलती प्राथमिकताओं का संकेत*

​इस पूरे विमर्श को बल हाल ही में बांग्लादेश में हुई भारतीय नियुक्ति से मिला, जहाँ अप्रैल 2026 में भारत ने पूर्व रेल मंत्री और वरिष्ठ नेता दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में उच्चायुक्त नियुक्त किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल में यह पहला अवसर था जब किसी राजनीतिक नेता को किसी विदेशी मिशन का प्रमुख बनाकर भेजा गया। गृह मंत्रालय द्वारा उन्हें केंद्रीय कैबिनेट मंत्री का विशेष दर्जा दिया जाना इस बात का स्पष्ट संकेत था कि ढाका के साथ संबंधों को सीधे उच्च-स्तरीय राजनीतिक धरातल पर साधने का प्रयास किया जा रहा है।
​काठमांडू में अब यही प्रश्न तैर रहा है—क्या भारत नेपाल में भी अपने पारंपरिक ‘करियर कूटनीति’ के मॉडल को बदलकर ‘राजनीतिक कूटनीति’ की ओर कदम बढ़ा सकता है ?
​विदेश नीति में राजनीतिक दूरदर्शिता और सीधा संवाद कई बार नौकरशाही की औपचारिक जटिलताओं को पार करने में अधिक कारगर साबित होता है। एक राजनीतिक दूत बिना किसी प्रशासनिक हिचकिचाहट के सीधे दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व से संवाद स्थापित कर निर्णय प्रक्रिया को गति दे सकता है।

यह भी पढें   रसुवा की बाढ़ ने दिया हिमालय का चेतावनी संदेश : श्वेता दीप्ति

*​रोटी-बेटी का अटूट रिश्ता और रणनीतिक प्रगाढ़ता*

​भारत और नेपाल के संबंध केवल औपचारिक कूटनीतिक दस्तावेजों या संधियों तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सदियों पुराना ‘रोटी-बेटी’ और गहरा सांस्कृतिक संबंध है, जो विश्व स्तर पर बेमिसाल है। खुली सीमाओं और जन-जन के आपसी जुड़ाव के कारण दोनों देशों का सामाजिक ताना-बाना एक-दूसरे से रचा-बसा है।
​नेपाल में हालिया राजनीतिक परिवर्तनों और नई शक्तियों के उभार के बीच सीमा विवादों, 1950 की शांति एवं मित्रता संधि के पुनरावलोकन और ईपीजी (Eminent Persons Group) रिपोर्ट से जुड़े संवेदनशील मुद्दों के समाधान के लिए एक ऐसे सशक्त चेहरे की जरूरत महसूस की जा रही है, जो इस अनूठे रिश्ते की गरिमा को समझते हुए सीधा संवाद स्थापित कर सके।

यह भी पढें   पडा गिरफ्त मे उन्मादी : डा.विजय दत्त

​इसके अलावा, भारत और नेपाल के बीच का संबंध गहरा आर्थिक भी है:
​व्यापार एवं आर्थिक प्रगाढ़ता: भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 10 से 11 अरब डॉलर का है, और नेपाल का 65% से अधिक आयात भारत से ही होता है। जलविद्युत (Hydropower) और बुनियादी ढांचे के बड़े समझौतों को तेजी से लागू करने के लिए  राजदूत की भूमिका अहम हो जाती है।

​सकारात्मक संकेत: हाल ही में भोटेकोशी-त्रिशूली बाढ़ के दौरान भारत द्वारा दी गई त्वरित मानवीय सहायता तथा वर्तमान राजदूत श्री नवीन श्रीवास्तव की सराहनीय भूमिका  ने यह साबित किया है कि दोनों देशों के बीच संबंधों की जमीनी पकड़ बेहद मजबूत है।

यह भी पढें   कांग्रेस महाधिवेशन – उम्मीदवारों के खिलाफ दावे और विरोध की प्रक्रिया शुरू

*​निष्कर्ष*
​नेपाल के विदेश मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत काठमांडू में किसी राजनीतिक व्यक्ति को नियुक्त करता है, तो इसे किसी भी तरह की विफलता या कड़वाहट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके विपरीत, यह इस बात का सकारात्मक संकेत है कि भारत नेपाल के साथ जन-स्तर और ‘रोटी-बेटी’ के इस खास रिश्ते को अपनी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति में कितना उच्च और विशेष राजनीतिक दर्जा देता है। देखना यह होगा कि नई दिल्ली से काठमांडू के लिए अगला टिकट किसी वरिष्ठ कूटनीतिज्ञ का कटता है या किसी मंजे हुए राजनीतिज्ञ का ?

कृतिका यादव
लेखिका

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com