Mon. Oct 12th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

प्रेम मनुष्य के जीवन का वह आधार है, जिसकी कोई सीमा नहीं : बिमल सरार्फ

 

बिमल सरार्फ, रक्सौल, 24 सितम्बर 2026 । मनुष्य के जीवन में प्रेम एक ऐसा शब्द है, जिसे जितना समझने का प्रयास किया जाए, उतना ही वह गहरा और रहस्यमय प्रतीत होता है। प्रेम ईश्वर से हो सकता है, प्रकृति से, परिवार से, समाज से, किसी व्यक्ति से अथवा किसी जीव-जंतु और वस्तु से भी। प्रेम का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है, लेकिन उसकी अनुभूति हर रूप में मनुष्य के हृदय को भीतर से स्पर्श करती है। विभिन्न शायरों, साहित्यकारों, संतों और आध्यात्मिक चिंतकों ने प्रेम को अपने-अपने ढंग से समझाया है, लेकिन आज तक प्रेम को किसी एक निश्चित परिभाषा में पूरी तरह बाँधा नहीं जा सका है। प्रेम की यही विशेषता उसे असीम, अनंत और अपरिभाषित बनाती है।

जिस प्रकार ईश्वर को किसी सीमित परिभाषा में बाँधना संभव नहीं है, उसी प्रकार प्रेम की भी कोई निश्चित सीमा नहीं हो सकती। प्रेम को केवल शब्दों से नहीं समझा जा सकता, उसे अनुभव करना पड़ता है। संत कबीर ने प्रेम के ढाई अक्षर को जीवन के सबसे बड़े ज्ञान के रूप में देखा। वास्तव में जिसने प्रेम को समझ लिया, उसने जीवन के उस सत्य को जान लिया, जिसे केवल पुस्तकीय ज्ञान से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

यह भी पढें   कांग्रेस महाधिवेशन – किशोर सिंह राठौर ने अपनी उम्मीदवारी ली वापस

प्रेम मनुष्य को भीतर से बदलने की शक्ति रखता है। सच्चा प्रेम अहंकार को समाप्त करता है, संवेदनशीलता को जन्म देता है और मनुष्य को दूसरों के सुख-दुःख से जोड़ता है। प्रेम में डूबा हुआ व्यक्ति केवल स्वयं के लिए नहीं जीता, बल्कि दूसरों के जीवन में भी सुख, शांति और अपनापन बाँटने का प्रयास करता है। इसलिए प्रेम को केवल भावना नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सुंदर दृष्टि भी कहा जा सकता है।

भारतीय संस्कृति और अध्यात्म में प्रेम के अनेक अद्भुत उदाहरण मिलते हैं। मीरा का कृष्ण के प्रति समर्पण, शबरी की राम के प्रति भक्ति, गोपियों का कृष्ण के प्रति अनुराग और भक्त तथा भगवान के बीच का आत्मिक संबंध इस बात को दर्शाता है कि प्रेम जब अपने शुद्धतम रूप में होता है, तब उसमें स्वार्थ, अहंकार और किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं रहती। प्रेम तब केवल पाने का माध्यम नहीं रहता, बल्कि स्वयं को समर्पित करने का भाव बन जाता है।

यह भी पढें   दशहरा के अवसर पर सस्ता बाजार शुरू

प्रेम का अर्थ केवल आकर्षण या शारीरिक संबंध नहीं है। वह हृदय की गहराइयों से उत्पन्न होने वाली ऐसी अनुभूति है, जो मनुष्य को अपने से ऊपर उठकर दूसरे के लिए सोचने की प्रेरणा देती है। सच्चा प्रेम अधिकार नहीं जताता, बल्कि विश्वास देता है; बंधन नहीं बनाता, बल्कि स्वतंत्रता का सम्मान करता है; और बदले की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि देने में आनंद खोजता है।

प्रेम में एक अद्भुत शक्ति होती है। यह कठोर से कठोर हृदय को भी कोमल बना सकता है। जहाँ क्रोध दूरी पैदा करता है, वहीं प्रेम संबंधों में पुल बनाता है। जहाँ घृणा विभाजन करती है, वहीं प्रेम मनुष्यों को जोड़ता है। प्रेम से किसी को पराजित नहीं किया जा सकता, लेकिन प्रेम से किसी के हृदय को अवश्य जीता जा सकता है। यही प्रेम की सबसे बड़ी विजय है।

यह भी पढें   पृथ्वी राजमार्ग पुनः अवरुद्ध

आज के भागदौड़ भरे जीवन में मनुष्य भौतिक उपलब्धियों के पीछे तेजी से दौड़ रहा है, लेकिन उसके भीतर प्रेम, अपनापन और संवेदना की कमी बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में प्रेम का महत्व और भी बढ़ जाता है। यदि परिवार में प्रेम हो, समाज में संवेदना हो और मनुष्य के व्यवहार में अपनापन हो, तो अनेक समस्याएँ स्वतः कम हो सकती हैं।

वास्तव में प्रेम जीवन की वह मधुर धारा है, जो मनुष्य को भीतर से समृद्ध बनाती है। इसे न खरीदा जा सकता है, न किसी सीमा में बाँधा जा सकता है और न ही पूरी तरह शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है। प्रेम को केवल जिया और महसूस किया जा सकता है। जहाँ प्रेम है, वहीं जीवन में सच्ची मिठास है; जहाँ प्रेम है, वहीं संबंधों में आत्मीयता है और जहाँ प्रेम है, वहीं मानवता का वास्तविक स्वरूप दिखाई देता है।

बिमल सरार्फ

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com