विश्वप्रकाश शर्मा का संकल्प : चुनाव जीतने से पहले नागरिकों का विश्वास जीतने की राजनीति
काठमांडू।
नेपाली कांग्रेस के उपसभापति विश्वप्रकाश शर्मा ने चुनाव जीतने की तैयारी से अधिक नागरिकों का विश्वास जीतने वाली राजनीतिक संस्कृति को प्राथमिकता देने का संकल्प व्यक्त किया है। कांग्रेस के 15वें महाधिवेशन के बंद सत्र में ‘राजनीतिक संस्कृति का क्षय और युगानुकूल रूपांतरण का दायित्व’ शीर्षक से प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में शर्मा ने कहा कि महाधिवेशन केवल नेतृत्व परिवर्तन का अवसर नहीं है, बल्कि नेतृत्व की संस्कृति, संगठन की कार्यशैली और संगठन के चरित्र में बदलाव का भी माध्यम है।
शर्मा ने पार्टी के अतीत के अनुकरणीय पक्षों को आत्मसात करते हुए कमियों के लिए आत्मालोचना के साथ आगे बढ़ने का संकल्प व्यक्त किया है। उनका कहना है कि अतीत की राजनीतिक कमजोरियों ने समग्र राजनीति के प्रति लोगों में बढ़ते विकर्षण में योगदान दिया है। इसलिए 15वें महाधिवेशन से राजनीतिक संस्कृति के क्षरण की समीक्षा और उसके पुनर्जागरण की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस अपने हिस्से की कमियों के लिए आत्मालोचनात्मक रवैया अपनाएगी और नेपाली राजनीतिक संस्कृति के युगानुकूल रूपांतरण तथा पुनर्जागरण के लिए गंभीर पहल करेगी। लोकतांत्रिक संस्कृति को निरंतर ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करने तथा जहां पार्टी से चूक हुई है, वहां उसे सुधारने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की गई है।
शर्मा ने कहा कि कांग्रेस केवल देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के कारण ‘ज्येष्ठ’ नहीं, बल्कि अपने कार्य और विचारों से ‘श्रेष्ठ’ होने को भी प्रमाणित करेगी। उनके अनुसार, विशेष महाधिवेशन से पार्टी को नया नेतृत्व, ऊर्जा और नया संदेश मिला, लेकिन चुनाव के समय की कमी के कारण उसे व्यापक स्तर पर जनता तक पहुंचाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल सका।
उन्होंने कहा, “हमारे लिए पार्टी की जीत दूसरा विषय है, देश पहले होना केवल नारा नहीं, बल्कि प्रतिबद्धता है।”
शर्मा ने उम्मीद जताई कि 15वां महाधिवेशन कांग्रेस को ठहरे हुए पोखर के बजाय बहती नदी जैसा संदेश देगा। उनके अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व में निरंतर ताजगी, ऊर्जा और गतिशीलता बनाए रखने का संकल्प लेगी।
विपक्ष की भूमिका अधिक जिम्मेदार होगी
शर्मा ने कहा कि समाज में मौजूद आवेग, अप्रत्याशित द्वंद्व और निराशा से विपक्षी दल को राजनीतिक लाभ लेने की नकारात्मक मानसिकता से बचना होगा। प्रमुख विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस अधिक जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत होगी।
उनके अनुसार, जिम्मेदार विपक्ष नागरिकों के सवालों को मजबूत करता है और समाज में आशा की लौ को बुझने नहीं देता।
पार्टी के भीतर किसी व्यक्ति के गलत कार्य का दोष पूरी संस्था पर नहीं डाला जाना चाहिए। शर्मा ने कहा कि पार्टी के वार्ड स्तर से लेकर केंद्र तक यदि कोई सदस्य कानून का उल्लंघन करता है तो उसके लिए स्वयं वही व्यक्ति जिम्मेदार होना चाहिए।
लोकतंत्र में अब केवल बोलने का अधिकार पर्याप्त नहीं
शर्मा ने लोकतंत्र की पारंपरिक परिभाषा पर भी सवाल उठाया। उनके अनुसार, लोकतंत्र को लंबे समय तक ‘बोलने के अधिकार’ के रूप में परिभाषित किया जाता रहा है, लेकिन आज लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा इस बात से होती है कि नागरिक की आवाज सुनी गई या नहीं और उसकी बात पर सुनवाई हुई या नहीं।
उन्होंने पिछले 35 वर्षों में कुछ भी नहीं होने के रूप में निर्मित राजनीतिक भाष्य को भी चुनौती दी। उनके अनुसार, 2072 साल (2015) के बाद प्रधानमंत्रियों के पद को लेकर चली ‘म्यूजिकल चेयर’ की राजनीति ने युवाओं में निराशा बढ़ाई है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पिछले 35 वर्षों में देश में कोई विकास नहीं हुआ।
जलविद्युत, पुल, सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में हुए कामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शर्मा का कहना है कि विकास की उपलब्धियों और राजनीतिक असफलताओं के बीच संतुलित मूल्यांकन आवश्यक है।
विरासत नहीं, विचार बने लोकतंत्र का आधार
शर्मा ने कहा कि लोकतंत्र में सवाल राजनीतिक विरासत का नहीं, विचार का होना चाहिए। किसी विचार की वैधता किसी संस्था की तरह कंपनी रजिस्ट्रार के कार्यालय में जाकर तय नहीं होती।
उन्होंने कहा कि बीपी कोइराला द्वारा स्थापित कांग्रेस को नई पीढ़ी के कंधों और मस्तिष्क में भरोसे के साथ स्थापित करना होगा। नई पीढ़ी के लिए लोकतंत्र का प्रश्न स्पष्ट है—लोकतंत्र में सवाल विरासत का नहीं, विचार का होता है।
गुटबंदी के बजाय विचार की राजनीति
शर्मा ने व्यक्ति के देवत्वकरण या दानवीकरण की राजनीति से बचने तथा समूहों के नाम पर पार्टी के भीतर गुट बनाने की प्रवृत्ति को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उम्मीदवार चयन में पहुंच और व्यक्तिगत संबंधों के प्रभाव को खत्म करने के लिए ‘इलेक्शन ब्यूरो’ बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया है। किसी व्यक्ति के पद पर पहुंचने के बाद पद छोड़ना न चाहने की प्रवृत्ति को विधि और संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से नियंत्रित करने का संकल्प भी व्यक्त किया गया है।
उनका स्पष्ट मत है कि गुट का वास्तविक विकल्प विचार है। हालांकि, इसका अर्थ पार्टी के भीतर भिन्न मतों को दबाना नहीं है। प्रश्न, असहमति और विरोध को लोकतांत्रिक पार्टी की स्वाभाविक प्रक्रिया मानते हुए उन्हें सार्थक नीति बहस की दिशा में ले जाने की आवश्यकता है।
शर्मा ने कहा कि पारंपरिक गुटों को समाप्त करने का अर्थ नए गुटों की नींव रखना नहीं है। कांग्रेस को आंतरिक स्वतंत्र विवेक का सम्मान करते हुए नीति और विचार पर आधारित राजनीति को प्रोत्साहित करना चाहिए।
‘डिजिटल कांग्रेस’ पर जोर
शर्मा ने सोशल मीडिया के दुरुपयोग को लेकर भी गंभीर बहस की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार, सोशल मीडिया का इस्तेमाल लोकतांत्रिक संस्कृति के विकास के लिए किया जा सकता है और किया जाना चाहिए।
उन्होंने दावा किया कि विशेष महाधिवेशन के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने ‘डिजिटल कांग्रेस’ की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है। डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल पार्टी के निर्णयों में बहुसंख्यक सदस्यों की भावना को शामिल करने के लिए आवश्यक बताया गया है।
शर्मा के अनुसार, डिजिटल युग में राजनीतिक संगठन केवल कार्यालयों और भौतिक बैठकों तक सीमित नहीं रह सकता। डिजिटल रूपांतरण केवल तकनीक को अपनाना नहीं, बल्कि पार्टी सदस्यों और नागरिकों की भावनाओं को निर्णय प्रक्रिया तक पहुंचाने की व्यवस्था विकसित करना भी है।
सरकार की गलत नीतियों का विरोध करेगी कांग्रेस
रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान सरकार यदि जनता के हितों के विरुद्ध निर्णय लेती है तो कांग्रेस उसका प्रतिरोध करेगी। राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) को मिले जनादेश के आधार पर सरकार चलाने का अधिकार स्वीकार करते हुए भी उसकी हर कार्यशैली को मौन समर्थन देने की कोई बाध्यता नहीं होगी।
शर्मा ने व्यक्ति-केंद्रित राजनीति और विचारविहीन गुटबंदी को हतोत्साहित करने का संकल्प दोहराया। चुनावी घोषणापत्र को ‘ऋण लेकर भूल जाने वाले तमसुक’ तक सीमित न रखने, कानूनी प्रक्रिया में राजनीतिक संरक्षण को अस्वीकार करने और सार्वजनिक पद को निजी लाभ का माध्यम नहीं बनने देने की प्रतिबद्धता भी रिपोर्ट में व्यक्त की गई है।
इसी तरह सोशल मीडिया को आंतरिक विवादों का अखाड़ा न बनाने और परिपक्व राजनीतिक एजेंडे को उम्र के आधार पर रोकने से बचने की बात कही गई है।
‘तीन दिन पार्टी के लिए, चार दिन अपने जीवन के लिए’
शर्मा ने पार्टी के नेता-कार्यकर्ताओं के लिए एक नई अवधारणा भी प्रस्तुत की है। उनका सुझाव है कि कार्यकर्ताओं के जीवन में तीन दिन पार्टी के लिए और चार दिन अपने व्यक्तिगत जीवन तथा आय-आर्जन के लिए होने चाहिए।
यह प्रस्ताव राजनीति को पूर्णकालिक निर्भरता और राजनीतिक पदों से मिलने वाले लाभ के बजाय आत्मनिर्भर सामाजिक-राजनीतिक जीवन से जोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। शर्मा के व्यापक राजनीतिक दृष्टिकोण में यही बात केंद्रीय दिखाई देती है कि कांग्रेस को केवल सत्ता प्राप्त करने वाली संस्था नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कार, उत्तरदायित्व और नागरिक विश्वास को पुनर्स्थापित करने वाली राजनीतिक शक्ति के रूप में स्वयं को रूपांतरित करना होगा।

