धर्म परिवर्तन करने पर जातिगत आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा: भारत का सर्वोच्च न्यायालय
काठमांडू, 15 अक्टूबर।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया है कि धर्म परिवर्तन करने के बाद व्यक्ति अपनी पूर्व जातिगत पहचान के आधार पर आरक्षण की सुविधा का दावा नहीं कर सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था में पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति के अंतर्गत आने वाला व्यक्ति यदि दूसरा धर्म अपना लेता है, तो वह अपनी पूर्व सामाजिक स्थिति के आधार पर जातिगत आरक्षण का लाभ पाने का स्वतः हकदार नहीं होगा।
तमिलनाडु में धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बने व्यक्तियों को आरक्षण की सुविधा देने से संबंधित मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है। मद्रास उच्च न्यायालय ने धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बने व्यक्तियों को आरक्षण देने के तमिलनाडु सरकार के निर्णय को निरस्त कर दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के प्रावधानों और जातिगत आरक्षण से संबंधित सिद्धांतों के आधार पर इस मामले में दायर याचिका खारिज कर दी।
अदालत के अनुसार, हिंदू सामाजिक व्यवस्था में जाति के आधार पर उत्पन्न सामाजिक पिछड़ापन धर्म परिवर्तन के बाद स्वतः उसी रूप में दूसरे धर्म में स्थानांतरित नहीं हो जाता। इसलिए पहले किसी पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति में शामिल रहे व्यक्ति को धर्म परिवर्तन के बाद केवल अपनी पूर्व जातिगत पहचान के आधार पर आरक्षण का दावा करने का अधिकार नहीं है।
इस फैसले को भारत में धर्म परिवर्तन और जातिगत आरक्षण के बीच संबंध को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या के रूप में देखा जा रहा है।

