सत्ता की परीक्षा, विपक्ष की चुनौती और संघ की भूमिका: किस दिशा में जाएगा भारतीय लोकतंत्र ? : बिमल सरार्फ
बिमल सरार्फ, रक्सौल, 17 अक्टूबर 2026 । भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां सत्ता, विपक्ष, युवा पीढ़ी और संवैधानिक संस्थाओं के बीच बढ़ता तनाव कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर रहा है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के प्रति असंतोष, जेन-जी के युवाओं का विरोध, मतदाता सूची में बदलाव को लेकर उठे सवाल और न्यायपालिका से लगाई जा रही उम्मीदें इस राजनीतिक परिस्थिति को और महत्वपूर्ण बना रही हैं।
हाल के दिनों में विपक्षी दलों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। विपक्ष इसे चुनावी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बता रहा है, जबकि चुनाव आयोग ने पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है। ऐसे में असली जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर तथ्यों की निष्पक्ष जांच और जनता के विश्वास को मजबूत करने की है।
कांग्रेस और विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती
कांग्रेस सहित पूरे विपक्ष के सामने आज दोहरी चुनौती है। पहली, सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज पर उठाए जा रहे सवालों को ठोस तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर जनता के सामने रखना। दूसरी, विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच मतभेदों के बावजूद एक साझा लोकतांत्रिक मुद्दे पर जिम्मेदार और प्रभावी भूमिका निभाना।
केवल सरकार का विरोध करना किसी विपक्ष की सफलता का प्रमाण नहीं हो सकता। विपक्ष की वास्तविक ताकत उसके तर्कों, जनसमर्थन, संगठन, वैकल्पिक नीतियों और जनता के प्रति जवाबदेही से तय होती है।
यदि विपक्ष अपने आरोपों को प्रमाणित करने में सफल होता है, तो उसे न्यायिक और संवैधानिक रास्तों से समाधान मांगना चाहिए। लेकिन यदि उसके आरोप प्रमाणों पर खरे नहीं उतरते, तो उसे अपनी रणनीति पर आत्ममंथन भी करना चाहिए। लोकतंत्र में सवाल उठाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी सवालों का जवाब देना भी है।
जेन-जी का असंतोष क्या संकेत देता है ?
युवा पीढ़ी केवल नारों और राजनीतिक भाषणों से संतुष्ट नहीं होना चाहती। वह रोजगार, शिक्षा, पारदर्शिता, अवसरों की समानता और संस्थाओं की विश्वसनीयता जैसे सवालों पर स्पष्ट जवाब चाहती है।
जब युवाओं को लगता है कि उनकी आवाज नहीं सुनी जा रही, तो उनका असंतोष आंदोलन का रूप ले सकता है। लेकिन किसी भी आंदोलन की स्थायी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह भावनाओं के साथ तथ्यों, लोकतांत्रिक मर्यादाओं और व्यावहारिक समाधान को कितना महत्व देता है।
सरकार को युवाओं के सवालों को केवल राजनीतिक विरोध मानकर खारिज नहीं करना चाहिए। वहीं आंदोलनकारियों को भी शांतिपूर्ण विरोध, संवाद और कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
युवाओं की ऊर्जा देश की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है, बशर्ते उसे टकराव के बजाय रचनात्मक बदलाव की दिशा मिले।
सुप्रीम कोर्ट से उम्मीदें और संवैधानिक मर्यादा
जब जनता का किसी संस्था पर भरोसा कमजोर पड़ता है, तो न्यायपालिका से उम्मीदें बढ़ जाती हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का काम किसी राजनीतिक दल को जीत दिलाना या किसी सरकार को हराना नहीं, बल्कि संविधान और कानून के अनुसार विवादों का समाधान करना है।
मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली, चुनाव आयोग के निर्णयों की वैधानिकता और मतदाता सूची के पुनरीक्षण से संबंधित सवालों पर न्यायालय तथ्यों, कानून और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर विचार कर सकता है।
यह भी समझना होगा कि किसी मामले में अदालत का नोटिस जारी करना अंतिम फैसला नहीं होता। इसी तरह किसी पक्ष का आरोप अपने आप में अपराध या संवैधानिक उल्लंघन का प्रमाण नहीं बन जाता।
यदि सुप्रीम कोर्ट सरकार या चुनाव आयोग के किसी निर्णय पर प्रतिकूल टिप्पणी करता है अथवा उसे बदलने का आदेश देता है, तो सरकार और संबंधित संस्था की जिम्मेदारी होगी कि वे उस आदेश को गंभीरता से लें और कानून के अनुसार उसका पालन करें। असहमति होने पर उपलब्ध कानूनी विकल्प अपनाए जा सकते हैं, लेकिन न्यायिक आदेश की अनदेखी संवैधानिक व्यवस्था को संकट में डाल सकती है।
चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सामने क्या जिम्मेदारी है ?
चुनाव आयोग लोकतंत्र की उस महत्वपूर्ण संस्था का नाम है, जिस पर निष्पक्ष चुनाव कराने और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारी है। इसलिए उसके निर्णय केवल कानूनी रूप से उचित होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि जनता के सामने पारदर्शी और विश्वसनीय भी दिखाई देना चाहिए।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के लिए वर्तमान परिस्थिति में सबसे महत्वपूर्ण कदम यह होगा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण, नाम हटाने की प्रक्रिया, आपत्तियों के निपटारे और मतदाताओं को उपलब्ध शिकायत निवारण व्यवस्था के संबंध में स्पष्ट जानकारी दी जाए।
यदि किसी निर्णय पर कानूनी सवाल उठते हैं, तो उनका जवाब दस्तावेजों और नियमों के आधार पर दिया जाना चाहिए। यदि कहीं प्रक्रिया संबंधी गलती सामने आती है, तो उसे सुधारने में संकोच नहीं होना चाहिए।
निष्पक्षता केवल किसी संस्था का दावा नहीं, बल्कि उसके कामकाज से जनता को मिलने वाला विश्वास है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ी हुई है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका क्या होगी ?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका को समझने के लिए उसके इतिहास और वर्तमान राजनीतिक संबंधों, दोनों पर नजर डालना आवश्यक है।
वर्ष 1925 में स्थापित संघ ने स्वतंत्रता के बाद सामाजिक और राजनीतिक जीवन में अपनी अलग पहचान बनाई। महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में उस पर प्रतिबंध लगा, जो बाद में हटाया गया। आपातकाल के दौरान 1975 में भी संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद लगाए गए प्रतिबंधों के दौर से भी उसे गुजरना पड़ा। इन घटनाओं ने संघ और सरकारों के संबंधों को अलग-अलग समय पर प्रभावित किया।
संघ स्वयं को सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन मानता है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के साथ उसके वैचारिक और संगठनात्मक संबंधों के कारण उसकी राजनीतिक भूमिका पर लगातार चर्चा होती रही है।
पिछले लगभग 12 वर्षों में केंद्र में भाजपा की सरकार रहने के दौरान संघ का सामाजिक नेटवर्क, संगठनात्मक पहुंच और सार्वजनिक विमर्श में प्रभाव चर्चा का विषय रहा है। संघ से जुड़े संगठनों की विभिन्न क्षेत्रों में सक्रियता भी उसके व्यापक सामाजिक प्रभाव को दर्शाती है।
हालांकि, यह मान लेना सही नहीं होगा कि सरकार जब भी किसी मुश्किल में आती है, संघ अनिवार्य रूप से उसे बचाने के लिए सामने आ जाता है। संघ ने कई अवसरों पर सरकार की नीतियों या उनके क्रियान्वयन पर सुझाव और असहमति भी व्यक्त की है। इसलिए उसकी भूमिका को केवल सरकार के संकटमोचक के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण होगा।
क्या संघ सरकार को रास्ता दिखाएगा ?
वर्तमान राजनीतिक तनाव के बीच संघ के सामने भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्या वह केवल अपने वैचारिक आधार और सामाजिक गतिविधियों पर ध्यान देगा, या सरकार को जनता की बदलती अपेक्षाओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने में अपनी भूमिका निभाएगा?
संघ यदि सरकार को संवाद बढ़ाने, युवाओं की चिंताओं को सुनने, प्रशासनिक पारदर्शिता मजबूत करने और जनता के बीच विश्वास कायम करने का सुझाव देता है, तो ऐसी भूमिका राजनीतिक तनाव कम करने में सहायक हो सकती है।
लेकिन लोकतंत्र में किसी भी संगठन की सलाह सरकार के संवैधानिक दायित्वों का स्थान नहीं ले सकती। सरकार को अपने निर्णयों की जिम्मेदारी स्वयं उठानी होती है। संघ का प्रभाव चाहे जितना हो, उसे न्यायपालिका, चुनाव आयोग, संसद और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्र भूमिका का विकल्प नहीं माना जा सकता।
यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सरकार के प्रतिकूल आया तो ?
यह वर्तमान बहस का सबसे महत्वपूर्ण काल्पनिक प्रश्न है। यदि सुप्रीम कोर्ट मतदाता सूची के पुनरीक्षण या चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के किसी हिस्से को कानून के विरुद्ध पाता है और सरकार या आयोग को सुधार करने का आदेश देता है, तो आगे की दिशा उनके संवैधानिक आचरण से तय होगी।
सरकार के सामने पहला रास्ता होगा कि वह फैसले का पालन करे, आवश्यक सुधार करे और जनता के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करे। यदि उसे फैसले के किसी हिस्से पर कानूनी आपत्ति है, तो उसे कानून में उपलब्ध उचित उपाय अपनाने चाहिए।
दूसरा, चुनाव आयोग को अपने अधिकारों और दायित्वों के भीतर रहते हुए न्यायालय के निर्देशों का पालन करना होगा। मतदाता सूची में सुधार, प्रक्रियाओं की समीक्षा या आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने जैसे कदम आदेश की प्रकृति पर निर्भर करेंगे।
तीसरा, संघ और भाजपा से जुड़े संगठनों की भूमिका भी इस परिस्थिति में चर्चा के केंद्र में आ सकती है। वे सरकार को संवाद और सुधार की सलाह दे सकते हैं, लेकिन किसी न्यायिक आदेश को राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाना समस्या को बढ़ा सकता है।
यह भी याद रखना चाहिए कि अदालत की प्रतिकूल टिप्पणी और किसी निर्णय को रद्द करने का आदेश अलग-अलग बातें हैं। वास्तविक परिणाम न्यायालय के अंतिम आदेश और उसमें दिए गए निर्देशों पर निर्भर करेंगे। अभी से यह मान लेना कि सरकार टकराव का रास्ता चुनेगी या चुनाव आयुक्त पद छोड़ देंगे, केवल अटकल होगी।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा कौन ?
राजनीति में सरकार बदलती रहती है, विपक्ष की भूमिका बदलती रहती है और संस्थाओं के प्रमुख भी समय के साथ बदलते हैं। लेकिन संविधान, नागरिकों के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थायी महत्व रखते हैं।
सरकार को यह समझना होगा कि बहुमत मिलने का अर्थ हर निर्णय पर असीमित अधिकार मिल जाना नहीं है। विपक्ष को यह समझना होगा कि विरोध के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है। न्यायपालिका को कानून के अनुसार स्वतंत्र निर्णय देना है, जबकि चुनाव आयोग को निष्पक्षता और पारदर्शिता के माध्यम से विश्वास अर्जित करना है।
संघ सहित सभी सामाजिक संगठनों को भी देशहित की चर्चा में संवैधानिक मर्यादाओं और सामाजिक सद्भाव को महत्व देना चाहिए।
आज भारत को किसी संस्था की जीत या किसी दल की हार से अधिक जरूरी है—जनता का विश्वास, निष्पक्ष चुनाव और संविधान के प्रति सभी पक्षों की प्रतिबद्धता।
अंततः लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं है कि संकट के समय कौन किसके साथ खड़ा होता है, बल्कि यह है कि संकट के समय कौन संविधान, सत्य और जनता के अधिकारों के साथ खड़ा रहता है।

