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मधेस प्रदेश सरकार पर संकट, एमाले ने समर्थन वापस लिया; मुख्यमंत्री यादव के सामने बहुमत जुटाने की चुनौती

 

जनकपुरधाम।

सत्ता में साझेदार नेकपा एमाले (सीपीएन-यूएमएल) द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाली मधेस प्रदेश सरकार संकट में घिर गई है। सरकार गठन के समय हुए 15 सूत्री समझौते को लागू नहीं करने का आरोप लगाते हुए एमाले के सरकार से बाहर होने के बाद मुख्यमंत्री कृष्णप्रसाद यादव के सामने अब अपनी सरकार बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है।

एमाले ने शुक्रवार को सरकार से समर्थन वापस लेने के साथ ही अपने चारों मंत्रियों से इस्तीफा भी दिलवा दिया। पार्टी के इस फैसले ने सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल नेपाली कांग्रेस और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) को भी नए राजनीतिक समीकरण पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।

मधेस प्रदेश में एमाले संसदीय दल के नेता सरोज यादव ने प्रदेश प्रमुख को पत्र लिखकर सरकार से समर्थन वापस लेने की जानकारी दे दी है। पत्र में कहा गया है कि सरकार गठन के दौरान सत्तारूढ़ दलों के बीच हुए 15 सूत्री समझौते को लागू नहीं किए जाने के कारण यह निर्णय लिया गया है।

मधेस प्रदेश में एमाले के प्रमुख सचेतक हरिनारायण महतो ने बताया कि पार्टी ने पिछले साउन (श्रावण) महीने में हुए 15 सूत्री समझौते को लागू करने के लिए मुख्यमंत्री से कई बार आग्रह किया था। लेकिन समझौते के क्रियान्वयन में रुचि नहीं दिखाए जाने के बाद पार्टी को सरकार से बाहर होने का निर्णय लेना पड़ा। उन्होंने बताया कि दशहरे के बाद पार्टी की बैठक में आगे की राजनीतिक रणनीति पर ठोस निर्णय लिया जाएगा। सरकार से बाहर होने से पहले केंद्र स्तर पर भी चर्चा की गई थी।

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एमाले के समर्थन वापस लेने के बाद मुख्यमंत्री यादव के सामने प्रदेशसभा में विश्वास का मत हासिल करने की स्थिति पैदा हो गई है। इससे सरकार के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।

कांग्रेस ने फैसले को बताया राजनीतिक स्टंट

सत्ता में साझेदार नेपाली कांग्रेस ने एमाले के फैसले पर असंतोष जताया है। कांग्रेस के प्रमुख सचेतक कुँवरकान्त झा ने अन्य सहयोगी दलों से चर्चा किए बिना एमाले के मंत्रियों के इस्तीफे को राजनीतिक स्टंट करार दिया।

उन्होंने कहा, “एमाले को सरकार में अच्छे मंत्रालय मिले थे और मुख्यमंत्री ने मंत्रियों के कामकाज में हस्तक्षेप भी नहीं किया था। यदि समझौते के क्रियान्वयन में कोई समस्या थी, तो बातचीत और विचार-विमर्श के जरिए समाधान खोजा जा सकता था। ऐसी स्थिति में अचानक सरकार से समर्थन वापस लेना उचित नहीं था।”

झा ने कहा कि एमाले के फैसले से सरकार की आगामी दिशा अनिश्चित हो गई है। दशहरे के बाद पार्टी की बैठक में इस विषय पर निर्णय लिया जाएगा। प्रदेश सरकार के मुद्दे पर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में भी चर्चा होगी और अन्य दलों के साथ संवाद आगे बढ़ाया जाएगा।

दूसरी सहयोगी पार्टी नेकपा ने भी कहा है कि उसे एमाले के सरकार से बाहर होने के फैसले की कोई पूर्व सूचना नहीं थी। नेकपा संसदीय दल के नेता युवराज भट्टराई ने बताया कि दशहरे के बाद पार्टी की बैठक में सरकार को दिए गए समर्थन के संबंध में निर्णय लिया जाएगा। समर्थन वापस लेना है या सरकार में बने रहना है, इस पर पार्टी ही अंतिम फैसला करेगी।

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जसपा की भूमिका होगी अहम

प्रदेशसभा में सबसे बड़ी पार्टी और प्रमुख विपक्षी जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) ने एमाले के फैसले को अस्वाभाविक नहीं बताया है।

जसपा के प्रदेशसभा सदस्य और पूर्व मुख्यमंत्री लालबाबू राउत ने कहा कि समझौते के क्रियान्वयन में विफलता के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई होगी। उन्होंने कहा कि अब मुख्यमंत्री को संवैधानिक प्रावधान के अनुसार 30 दिनों के भीतर विश्वास का मत हासिल करना होगा। इसके बाद ही सरकार के भविष्य की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

राउत के अनुसार, मधेस प्रदेशसभा में सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण आगामी राजनीतिक समीकरण में जसपा की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, सरकार गठन के लिए उनकी पार्टी दावा पेश करेगी या नहीं, इस पर अभी टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी।

सूत्रों के अनुसार, केंद्र में एमाले और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) के बीच राजनीतिक समीकरण को देखते हुए एमाले प्रदेशसभा में मौजूद विभिन्न दलों को साथ लेकर अपने नेतृत्व में सरकार बनाने की संभावनाओं पर चर्चा कर रही है।

एमाले के समर्थन वापस लेने के बाद अब कांग्रेस और नेकपा का अगला कदम, साथ ही जसपा और जनमत पार्टी की रणनीति, मधेस प्रदेश में सत्ता का भविष्य तय करेगी। समझौते के क्रियान्वयन को लेकर शुरू हुआ विवाद अब इस सवाल पर केंद्रित हो गया है कि मुख्यमंत्री विश्वास का मत जुटा पाएंगे या नहीं।

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नेताओं का कहना है कि दशहरे के बाद होने वाली राजनीतिक चर्चाओं से वर्तमान सरकार की निरंतरता और संभावित नए सत्ता समीकरण की दिशा स्पष्ट होगी।

गौरतलब है कि गत 12 जेठ को तीन दलों के बीच समझौता होने के बाद नेकपा एमाले सरकार में शामिल हुई थी। सरकार में शामिल होने के करीब साढ़े पांच महीने बाद समझौते को लागू नहीं किए जाने का आरोप लगाते हुए पार्टी ने समर्थन वापस ले लिया है।

मधेस प्रदेशसभा में दलों की स्थिति

107 सदस्यीय मधेस प्रदेशसभा में सरकार बनाने के लिए 54 सीटों की आवश्यकता है। वर्तमान में दलों की स्थिति इस प्रकार है:

  • नेपाली कांग्रेस — 22 सीटें

  • नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) — 15 सीटें

  • नेकपा एमाले — 23 सीटें

  • जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) — 27 सीटें

  • जनमत पार्टी — 12 सीटें

  • संघीय समाजवादी पार्टी — 1 सीट

  • राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (राप्रपा) — 1 सीट

एमाले के समर्थन वापस लेने के बाद प्रदेश सरकार अल्पमत में आ गई है। अब मुख्यमंत्री यादव के लिए बहुमत जुटाना सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गया है।

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