गणतंत्र से गुणतंत्र की ओर : अजय कुमार झा
अजयकुमार झा, हिमालिनी अंक ऑक्टोबर। समकालीन विश्व में गणतांत्रिक व्यवस्थाएँ अनेक संकटों से गुजर रही हैं । निर्वाचन नियमित रूप से हो रहे हैं, राजनीतिक दल सक्रिय हैं और नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त है; फिर भी शासन की गुणवत्ता, सार्वजनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और नीति–निर्माण की क्षमता को लेकर असंतोष बढ़ रहा है । अनेक समाजों में राजनीतिक पद लोकप्रियता, पहचान–आधारित ध्रुवीकरण, धनबल, बाहुबल और प्रचार–प्रबंधन से निर्धारित होते दिखाई देते हैं । परिणामस्वरूप शासन में ऐसे व्यक्तियों का प्रवेश होता है जिनके पास जनसमर्थन तो हो सकता है, परंतु प्रशासनिक दक्षता, नैतिक दूरदृष्टि और सार्वजनिक नीति की समझ अपर्याप्त होती है । यहीं से “गणतंत्र से गुणतंत्र की ओर” का प्रश्न जन्म लेता है । इसका आशय गणतंत्र के स्थान पर किसी अलोकतांत्रिक अभिजन–शासन की स्थापना नहीं होना चाहिए । प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र को केवल संख्या–आधारित प्रतिनिधित्व से आगे बढ़ाकर गुणवत्ता–आधारित शासन में रूपांतरित किया जा सकता है ? क्या जनादेश के साथ ज्ञान, चरित्र, क्षमता और उत्तरदायित्व को भी राजनीतिक वैधता का आधार बनाया जा सकता है ?
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अनुसार समावेशी, उत्तरदायी और प्रभावकारी शासन सतत विकास की आधारशिला है । उसके शासन–संबंधी ढाँचे में भागीदारी, समावेशन, समानता, विधि का शासन और उत्तरदायित्व जैसे सिद्धांत केंद्रीय हैं । इससे स्पष्ट है कि शासन की गुणवत्ता केवल प्रशासनिक दक्षता का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक न्याय और नागरिक अधिकारों से भी जुड़ी हुई है । इस लेख के जरिए हमने तीन प्रश्नों पर ध्यान केन्द्रित किया है–
१. गणतंत्र और गुणतंत्र की संकल्पनाओं में क्या अंतर और संबंध है ?
२. आधुनिक लोकतंत्र में गुणतंत्रीय तत्वों की आवश्यकता क्यों उत्पन्न हुई है
३. सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को सुरक्षित रखते हुए गुणतंत्र की स्थापना कैसे की जा सकती है ?
गणतंत्र का शाब्दिक अर्थ है– जनता का राज्य या सार्वजनिक सत्ता का ऐसा स्वरूप जिसमें शासन किसी राजा या वंश के बजाय नागरिकों की संप्रभुता से वैधता प्राप्त करता है । आधुनिक गणतंत्र के प्रमुख तत्व हैं– नागरिकों की राजनीतिक समानता । निर्वाचित प्रतिनिधित्व । संविधान और विधि का शासन । सत्ता का विभाजन और संस्थागत नियंत्रण । मौलिक अधिकारों की रक्षा । शांतिपूर्ण सत्ता–परिवर्तन । सार्वजनिक पदों के प्रति उत्तरदायित्व ।
गणतंत्र का आदर्श व्यक्ति–विशेष की निरंकुशता को रोकता है, किंतु निर्वाचन अपने–आप में सुशासन की गारंटी नहीं देता । बहुमत से चुनी गई सरकार भी अल्पसंख्यकों के अधिकारों की उपेक्षा कर रही है, संस्थाओं को कमजोर कर रही है । और प्रशासन को दलगत हितों के अधीन कर रही है । इसलिए गणतांत्रिक वैधता को शासन की गुणवत्ता से जोड़ना आवश्यक है ।
“गुणतंत्र” शब्द को यहाँ व्यापक अर्थ में प्रयुक्त किया जा रहा है । इसका आशय ऐसी राजनीतिक–सामाजिक व्यवस्था से है जिसमें सत्ता, अवसर और उत्तरदायित्व का वितरण व्यक्ति की योग्यता, नैतिक विश्वसनीयता, कार्यक्षमता, ज्ञान, अनुभव और लोकसेवा की प्रतिबद्धता के आधार पर किया जाए । दार्शनिक साहित्य में मेरिटोक्रेसी का सामान्य अर्थ ऐसी व्यवस्था है जिसमें प्रभाव या सामाजिक प्रतिष्ठा “मेरिट” के आधार पर निर्धारित होती है; किंतु स्वयं “मेरिट” की परिभाषा विवादास्पद रहती है । यदि मेरिट को केवल परीक्षा–अंक, आर्थिक उत्पादकता या तकनीकी दक्षता तक सीमित कर दिया जाए, तो सामाजिक संवेदना, नैतिकता, समावेशन और न्याय जैसे गुण उपेक्षित हो सकते हैं । इसलिए गुणतंत्र में गुण के कम–से–कम पाँच आयाम होने चाहिए–
बौद्धिक योग्यताः विषय–ज्ञान, विश्लेषण और समस्या–समाधान क्षमता । प्रशासनिक दक्षताः नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने की क्षमता ।
नैतिक चरित्रः ईमानदारी पारदर्शिता और सार्वजनिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी ।
सामाजिक संवेदनशीलताः वंचित, अल्पसंख्यक और कमजोर वर्गों के प्रति न्यायपूर्ण दृष्टि ।
लोकतांत्रिक उत्तरदायित्वः नागरिकों, संसद, न्यायपालिका और स्वतंत्र संस्थाओं के प्रति जवाबदेही । इस प्रकार गुणतंत्र केवल “श्रेष्ठ लोगों का शासन” नहीं है । वह तभी वैध हो सकता है जब गुण की पहचान पारदर्शी हो, अवसरों तक पहुँच समान हो और गुणवान शासक जनता के प्रति उत्तरदायी बने रहें ।
गणतंत्र की सीमाएँ और गुणतंत्र की आवश्यकताः लोकतंत्र का आधार राजनीतिक समानता है– हर नागरिक का मत समान मूल्य रखता है ।
यह सिद्धांत नागरिक गरिमा की रक्षा करता है । परंतु नीति–निर्माण, वित्तीय प्रबंधन, स्वास्थ्य, शिक्षा, जलवायु, डिजिटल शासन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों जैसे क्षेत्रों में जटिल विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है । जनमत दिशा प्रदान कर सकता है, लेकिन नीति का निर्माण और क्रियान्वयन ज्ञान, अनुभव और संस्थागत क्षमता की मांग करता है । इसलिए समस्या लोकतंत्र में नहीं, बल्कि उस लोकतंत्र की संकीर्ण व्याख्या में है जो नागरिक भागीदारी को केवल मतदान तक सीमित कर देती है । यदि जनता चुनाव के दिन मतदाता और शेष अवधि में निष्क्रिय दर्शक बन जाए, तो प्रतिनिधित्व धीरे–धीरे राजनीतिक अभिजन के नियंत्रण में चला जाता है । जब सार्वजनिक पद राजनीतिक निष्ठा, रिश्तेदारी या आर्थिक प्रभाव के आधार पर दिए जाते हैं, तो राज्य की निष्पक्षता कमजोर होती है । ऐसी स्थिति में प्रशासन सरकार के प्रति वफादार तो दिख सकता है, लेकिन संविधान और नागरिकों के प्रति उसका उत्तरदायित्व कम हो जाता है ।
हाल के शोध में यह पाया गया है कि मेरिट–आधारित भर्ती और सामाजिक प्रतिनिधित्व दोनों नौकरशाही की वैधता को बढ़ा सकते हैं; विशेष रूप से कमजोर शासन–गुणवत्ता वाले संदर्भों में मेरिट–आधारित नियुक्ति का प्रभाव अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है । इसका अर्थ यह नहीं कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और योग्यता परस्पर विरोधी हैं । वास्तविक चुनौती ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें नियुक्तियाँ सक्षम भी हों और समाज की विविधता को प्रतिबिंबित भी करें । आधुनिक राजनीति में लोकप्रियता कभी–कभी नीति–क्षमता से अधिक महत्वपूर्ण बन जाती है । दृश्य माध्यमों, सामाजिक मीडिया और त्वरित राजनीतिक नारों के कारण दीर्घकालिक नीति की तुलना में तत्काल भावनात्मक प्रतिक्रिया को अधिक महत्व मिलने लगता है । इससे नेतृत्व का मूल्यांकन परिणाम, दृष्टि और नैतिकता के बजाय प्रचार–कौशल से होने लगता है । वैसे लोकप्रिय नेता आवश्यक रूप से अयोग्य नहीं होते, और विशेषज्ञ आवश्यक रूप से लोकतांत्रिक नहीं होते । इसलिए समाधान लोकप्रियता को समाप्त करना नहीं, बल्कि लोकप्रिय जनादेश को विवेकपूर्ण संस्थागत परीक्षण से जोड़ना है ।
मेरिटोक्रेसी की सबसे गंभीर आलोचना यह है कि उपलब्धि हमेशा व्यक्तिगत प्रतिभा और परिश्रम का परिणाम नहीं होती । गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पोषण, भाषा, पारिवारिक संसाधन, सामाजिक पूँजी और सुरक्षित वातावरण भी सफलता को प्रभावित करते हैं । यदि समान अवसर उपलब्ध कराए बिना केवल परिणामों के आधार पर लोगों को “योग्य” और “अयोग्य” घोषित किया जाए, तो गुणतंत्र सामाजिक असमानता को वैध ठहरा सकता है । अतः वास्तविक गुणतंत्र का पहला दायित्व है– ऐसी सामाजिक परिस्थितियाँ बनाना जिनमें प्रत्येक नागरिक अपनी क्षमता विकसित कर सके । समान अवसर के बिना मेरिट का दावा अधूरा है ।
गणतंत्र और गुणतंत्र के संबंध को तीन दृष्टियों से समझा जा सकता है ।
विरोध का दृष्टिकोणः
इस दृष्टिकोण के अनुसार लोकतंत्र जनसमानता पर आधारित है, जबकि गुणतंत्र योग्य और श्रेष्ठ लोगों को अधिक अधिकार देता है । यदि विशेषज्ञों या सक्षम अभिजनों को अधिक राजनीतिक शक्ति दी जाए, तो सामान्य नागरिक की समान राजनीतिक प्रतिष्ठा समाप्त हो सकती है । यह आशंका वास्तविक है, क्योंकि “योग्यता” की परिभाषा अक्सर सत्ता–संपन्न वर्ग अपने हित में तय करता है ।
पूरकता का दृष्टिकोणः
दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार लोकतंत्र वैधता प्रदान करता है और गुणतंत्र क्षमता । जनता यह निर्धारित करती है कि शासन किस दिशा में चले, जबकि योग्य संस्थाएँ उस दिशा को नीति और कार्यक्रम में परिवर्तित करती हैं । इस मॉडल में नागरिक संप्रभुता और विशेषज्ञ प्रशासन का संतुलन स्थापित किया जाता है ।
लोकतांत्रिक गुणतंत्रः
तीसरा और अधिक संतुलित दृष्टिकोण “लोकतांत्रिक गुणतंत्र” का है । इसमें–सत्ता का अंतिम स्रोत जनता रहती है । सार्वजनिक पदों के लिए योग्यता और नैतिक मानदंड निर्धारित होते हैं । नागरिकों को निर्णय–प्रक्रिया में निरंतर भागीदारी मिलती है । विशेषज्ञ संस्थाएँ निर्वाचित सरकार के अधीन, परंतु पेशेवर स्वतंत्रता के साथ कार्य करती हैं । सभी निर्णय पारदर्शिता, न्यायिक समीक्षा और सार्वजनिक आलोचना के अधीन रहते हैं । पदाधिकारियों का मूल्यांकन केवल चुनाव से नहीं, बल्कि कार्य–परिणाम और नैतिक आचरण से भी होता है ।
गुणतंत्रीय व्यवस्था के संस्थागत आधारः
गुणतंत्र का निर्माण चुनावी सुधार से पहले शैक्षिक सुधार की मांग करता है । नागरिकों में संवैधानिक चेतना, तर्कशीलता, मीडिया–साक्षरता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सार्वजनिक नैतिकता का विकास आवश्यक है । विद्यालय और विश्वविद्यालय केवल रोजगार के लिए नहीं, बल्कि विवेकशील नागरिक तैयार करने के लिए भी उत्तरदायी हैं । एक गुणतंत्रीय शिक्षा–व्यवस्था में निम्नलिखित तत्व होने चाहिए–आलोचनात्मक चिंतन । इतिहास और संविधान का अध्ययन । स्थानीय समस्याओं पर परियोजना–आधारित शिक्षा । नैतिक और नागरिक शिक्षा । डिजिटल सूचना की सत्यापन क्षमता । नेतृत्व, संवाद और सहयोग का प्रशिक्षण । वंचित समूहों के लिए वास्तविक शैक्षिक अवसर । नौकरशाही, विश्वविद्यालय, सार्वजनिक संस्थान, नियामक निकाय और राजदूतों जैसे पदों पर नियुक्ति के लिए स्पष्ट मानदंड, स्वतंत्र चयन–समिति और सार्वजनिक घोषणा आवश्यक हैं । चयन प्रक्रिया में केवल परीक्षा या डिग्री नहीं, बल्कि समस्या–समाधान, नैतिक निर्णय, सामाजिक संवेदनशीलता और नेतृत्व क्षमता का भी परीक्षण होना चाहिए ।
गुणतंत्र का आधार मजबूत संस्थाएँ हैं, न कि “अच्छे शासक” की आशा । न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, लोकसेवा आयोग, लेखा–परीक्षा संस्था, सूचना आयोग, मानवाधिकार निकाय और विश्वविद्यालयीय संस्थाओं की स्वतंत्रता सुरक्षित रहनी चाहिए । अनुसंधान से यह भी स्पष्ट होता है कि लोकतंत्र की स्थिरता केवल मेरिट–आधारित भर्ती से नहीं, बल्कि निष्पक्ष और प्रभावकारी नौकरशाही से अधिक जुड़ी होती है । निष्पक्षता विपक्ष और नागरिकों को भेदभाव से बचाती है, जबकि प्रभावकारिता सरकार की नीतियों को परिणाम तक पहुँचाती है ।
गुणतंत्रीय शासन में नागरिक केवल मतदाता नहीं, बल्कि निरंतर निगरानीकर्ता होते हैं । सार्वजनिक सुनवाई, नागरिक चार्टर, सामाजिक लेखा–परीक्षा, सूचना का अधिकार, सहभागी बजट और स्थानीय परामर्श–व्यवस्थाएँ शासन को जनता से जोड़ती हैं । राष्ट्रीय निति निर्माणों में एक एक नागरिक का तर्क अथवा निर्णय सार्वजनिक रूप से विचारणीय होते हैं । अंतिम व्यक्ति के तर्कपूर्ण विचार भी सरकार प्रमुख के निर्णयों को परिवर्तित करने का अधिकार रखता है । इस प्रकार विशेषज्ञता को जनता से ऊपर नहीं, जनता के प्रति उत्तरदायी बनाया जाता है ।
दक्षिण एशिया में गणतंत्र और गुणतंत्र का प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण है । यहाँ समाज ऐतिहासिक रूप से विविध, बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुजातीय हैं । राज्य–निर्माण की प्रक्रिया में सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व, विकास और प्रशासनिक क्षमता को साथ लेकर चलना आवश्यक है । इस क्षेत्र में राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र कमजोर होने, प्रशासनिक संस्थाओं पर राजनीतिक प्रभाव, शिक्षा और रोजगार में असमानता तथा स्थानीय शासन की सीमित क्षमता जैसी चुनौतियाँ विद्यमान हैं । ऐसी परिस्थितियों में गुणतंत्र का अर्थ केवल उच्च प्रशासनिक परीक्षा में सफलता नहीं हो सकता । उसे सामाजिक न्याय और स्थानीय वास्तविकताओं के साथ जोड़ना होगा । दक्षिण एशियाई समाजों की पारंपरिक ज्ञान–परंपराओं में भी शासन और नेतृत्व के लिए नैतिकता, आत्मसंयम, विद्या, न्यायबुद्धि और लोकहित को आवश्यक माना गया है । प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में राजा या शासक की वैधता केवल वंश से नहीं, बल्कि प्रजा–पालन, न्याय और उत्तरदायित्व से जुड़ी थी । आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र इस परंपरा को नागरिक अधिकारों, सार्वभौमिक मताधिकार और विधि के शासन के साथ नए रूप में संयोजित कर सकता है ।
नेपाल जैसे संघीय गणतंत्र में गुणतंत्रीय शासन का विशेष महत्व स्थानीय और प्रादेशिक संस्थाओं की क्षमता–वृद्धि से जुड़ा है । संघीय संरचना तभी प्रभावी होगी जब स्थानीय निकायों को प्रशिक्षित कर्मचारी, विश्वसनीय आँकड़े, पारदर्शी बजट, तकनीकी सहायता और नागरिक निगरानी प्राप्त हो । विकेंद्रीकरण केवल अधिकारों का हस्तांतरण नहीं, बल्कि प्रशासनिक योग्यता का भी विकेंद्रीकरण है । निर्वाचित प्रतिनिधि कम–से–कम चुनाव के माध्यम से जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं । विशेषज्ञ अधिकारी यदि पर्याप्त निगरानी से मुक्त हों, तो वे नागरिकों से दूर और आत्मसंतुष्ट हो सकते हैं । इसलिए गुणतंत्र में नियुक्ति के साथ कार्यकाल समीक्षा, संपत्ति–घोषणा, हित–संघर्ष नियंत्रण और नागरिक शिकायत व्यवस्था भी आवश्यक है ।
इस लेख के आधार पर एक संतुलित मॉडल प्रस्तावित किया जा सकता है, जिसे “उत्तरदायी लोकतांत्रिक गुणतंत्र” कहा जाए । इसके प्रमुख स्तंभ निम्नलिखित हैं–जनसत्ताः सत्ता का अंतिम स्रोत नागरिक और संविधान हों । योग्यताः सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति ज्ञान, क्षमता और अनुभव पर आधारित हो । नैतिकताः भ्रष्टाचार, हित–संघर्ष और सत्ता के दुरुपयोग पर कठोर नियंत्रण हो । समावेशनः महिला, दलित, जनजातीय, अल्पसंख्यक, ग्रामीण और वंचित समुदायों के लिए वास्तविक अवसर सुनिश्चित हों । पारदर्शिताः नियुक्ति, बजट, नीति और परिणाम सार्वजनिक हों । निरंतर मूल्यांकनः अधिकारियों और सरकारों का मूल्यांकन चुनावी चक्र के बाहर भी किया जाए । संस्थागत संतुलनः विशेषज्ञ संस्थाएँ स्वतंत्र हों, परंतु लोकतांत्रिक निगरानी से मुक्त न हों । नागरिक भागीदारीः जनसुनवाई, सामाजिक लेखा–परीक्षा और सहभागी नीति–निर्माण को संस्थागत बनाया जाए । स्थानीय क्षमताः स्थानीय शासन को प्रशिक्षित मानव संसाधन और वित्तीय स्वायत्तता मिले । सुधार की क्षमताः नीतियों को आँकड़ों, शोध और सार्वजनिक प्रतिक्रिया के आधार पर संशोधित किया जाए । ध्यान रहे ! यह मॉडल किसी “श्रेष्ठ वर्ग” के शासन का समर्थन नहीं करता । इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ सक्षम, न्यायपूर्ण और नागरिक–केंद्रित बनें ।
निष्कर्ष
“गणतंत्र से गुणतंत्र की ओर” का सही अर्थ गणतंत्र का परित्याग नहीं, बल्कि गणतंत्र की गुणवत्ता का उन्नयन है । केवल जनादेश पर्याप्त नहीं; जनादेश को ज्ञान, नैतिकता, प्रशासनिक क्षमता, सामाजिक न्याय और उत्तरदायित्व से जोड़ना होगा । लोकतंत्र नागरिकों को सत्ता का स्रोत बनाता है, जबकि गुणतंत्र शासन को सक्षम और परिणामपरक बनाने का प्रयास करता है । फिर भी गुणतंत्र तभी स्वीकार्य है जब वह सामाजिक समानता, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक नियंत्रण के भीतर विकसित हो । मेरिट को जन्म, संपत्ति, जाति, भाषा या विशेषाधिकार का दूसरा नाम नहीं बनने दिया जा सकता । वास्तविक गुणतंत्र वह है जो अवसरों की समानता का विस्तार करे, संस्थाओं को निष्पक्ष बनाए, सार्वजनिक पदों को सेवा का माध्यम समझे और सत्ता को निरंतर उत्तरदायी रखे । अतः भविष्य का आदर्श न तो अंध–बहुमतवाद है और न ही निरंकुश विशेषज्ञतंत्र । आवश्यक दिशा है– लोकतांत्रिक वैधता और गुणतंत्रीय क्षमता का संस्थागत समन्वय । यही समन्वय गणतंत्र को जीवंत, न्यायपूर्ण और लोककल्याणकारी बना सकता है ।

