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कोई तो बचाए, डूबते इस देश को : गंगेशकुमार मिश्र

 

 गंगेशकुमार मिश्र, कपिलबस्तु, ६ अप्रिल |

नेपाल का गौरवपूर्ण इतिहास कहें या अभिशाप,  यह देश कभी ग़ुलाम न रहा।

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ग़ुलामी के दर्द को न सहा, इसी गौरवगाथा का बयान करते न थकने वाले; हमारे राष्ट्रवादी भद्रजन, मौके पर चूके नहीं: जब भी अवसर मिला जमकर लूटा देश को
आर्थिक रूप से जर्जर हो चुका, यह देश दान पर पल रहा है। सारे भौतिक पूर्वाधार, विदेश की मेहरबानी पर टिके हुए हैं।फ़िर भी ग़ुरूर से सीना ताने , हर वक़्त ज़हर उगलने वाले, अपने गिरेबान में झाँकने के बजाय भारत को कोसते रहते हैं।
शालीनता तो दूर की बात  आपत्तिजनक शब्दों से लैश रहते हैं, यहाँ के नेतागण। राष्ट्रीयता के नाम का माला जपते हुए, देश की संपदा में सुराख करने की प्रवृत्ति ने देश को असफ़ल राष्ट्र की श्रेणी में, लाकर खड़ा कर दिया है।
युवा जनशक्ति रोजगार के लिए, विदेश पलायन पर मज़बूर है; भाई-भतीजावाद से त्रस्त यह देश अपनी दशा पर आँसू बहाने के सिवा कुछ नहीं कर पा रहा।
राजधानी, काठमांडू; शक्तिकेन्द्र काठमांडू,  असहाय काठमांडू।
जो धूल और धूँवें से आच्छादित है, जहाँ ईंधन की किल्लत से परेशान लोग, अपनी किस्मत को कोसने पर मज़बूर हैं।भूख और बेकारी की मार पर महगाई, कोढ़ पर खाज़ का काम कर रही है। क्या यही इस देश की नियति है ? सोचने पर विवश क्यों नहीं होती  सरकार ?
आम जनमानस, व्यथित मन से; आहें भरता यही कह रहा है……
” कोई तो बचाए आए, डूबते इस देश को।”

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