पंजीकृत विधेयक को सहमति से पारित एवं चुनाव की घोषणा एक साथ हो : राजु विश्वकर्मा
राजु विश्वकर्मा, काठमांडू, ७ फरवरी |
मधेशी व जनजाति पार्टियों की शिकायतों को मद्देनजर रखते सत्तारुढ़ दल ने अगहन १४ गते संविधान संशोधन विधेयक संसद सचिवालय में पंजीकृत किया है । उसी समय से प्रतिपक्षी पार्टी एमाले व अन्य छोटी–छोटी पार्टियां पंजीकृत विधेयक को लेकर प्रतिरोध कर रही हैं । देश के विभिन्न स्थानों के साथ–साथ काठमांडू के हृदय स्थल खुलामंच में बृहत् प्रदर्शन सहित जनसभा का आयोजन भी किया गया । जबकि यह देश के लिए सकारात्मक संकेत नहीं है ।
वैसे संविधान हिन्दुओं की प्रसिद्ध धर्म पुस्तक गीता व ईसाइओं की प्रसिद्ध धर्म पुस्तक बाइबिल नहीं है, जिसे संशोधन नहीं किया जा सकता । संविधान तो एक विशिष्ट अभिलेख है, राजनीतिक सहमति व समझौते का साझा दस्तावेज है, जिसमें निरंतर संशोधन व सुधार संभव है । राष्ट्र एवं उसके नागरिकों के विकास के पथ पर यह कदापि आड़े नहीं आता है । लेकिन दुर्भाग्य है कि प्रतिपक्षी एमाले व कुछ पार्टियों ने मौजूदा संविधान को गीता व बाइबिल की संज्ञा दी है । उनका कहना है कि गीता व बाइबिल की तरह संविधान के अद्र्धविराम व पूर्ण विराम तक भी संशोधन नहीं किया जा सकता है । दूसरी तरफ अपना हक, अपनी पहचान स्थापित करने हेतु मधेशी एवं जनजाति पार्टियां एमाले विरुद्ध संघर्ष एवं आन्दोलन करने की चेतावनी दी है । इससे स्पष्ट होता है कि देश में पुनः मुठभेड़ की स्थिति पैदा हो सकती है । इसके लिए जरुरी है कि सियासी पार्टियां, प्रतिपक्षी और मधेशी व जनजाति पार्टियों के बीच घनीभूत रुप में विमर्श हो, परिसंवाद हो व वार्ता हो ।
वैसे देखा जाए तो चुनाव के मसलों में मधेशी और जनजाति पार्टियां कुछ हद तक सहमत हो चुकी हैं, जिसे सकारात्मक रुप में लिया जा सकता है । इसी प्रकार विगत के दिनों में संविधान पुनर्लेखन की मांग करनेवाली मधेशी एवं जनजाति पार्टियों के नेता संविधान संशोधन विधेयक में सकारात्मक होना भी राजनीतिक रुप में महत्वपूर्ण माना जाता है ।
इसलिए पंजीकृत विधेयक को सहमति से पारित करने का काम एवं चुनाव की घोषणा एक साथ हो, तो इन मसलों को आसानी से हल किया जा सकता है । इसके लिए यह जरुरी है कि दलीय ध्रुवीकरण को ‘ब्रेक थ्रु’ करके ईमानदारी पूर्वक मौजूदा समस्याओं को अविलम्ब सुलझाने की ओर आगे बढ़ें ।
(राजु विश्वकर्मा प्रेस सेंटर के केन्द्रीय सदस्य हैं ।)


