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”हत्या हिंसा की राजनीति कब तक करेगी मोर्चा”? रोशन झा

 
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रोशन झा, राजबिराज २८ मार्च 2२०१७ | संयूक्त लोकतान्त्रिक मधेसी मोर्चा द्वारा घोषणा की गई ओली बिरोध कार्यक्रम पाँच निर्दोष मधेसीयों को अपने प्राणो की आहुति देनी पडी । सप्तरी जिल्ला अभीतक शोक मग्न है मधेसी की यह एतिहासिक भूमी सप्तरी खुन से लतपत है यहाँ के स्थानिय मधेसी जनता खौप में जी रहे है क्या पता कब नेपाली पुलिस घर में घुसकर गोली मार्दें, ऐसे हालात में शहिदों के सम्मान मे मोर्चा द्वारा आयोजित श्रद्धाञ्जली सभा जहाँ हजारौं मधेसी जनता नेपाली राज्य द्वारा मधेसी बीरों की हत्या के कारण शोक मग्न थें वहाँ पर मोर्चा के प्रमुख दल संघिय समाजवादी फोरम नेपाल के राष्टिय अध्यक्ष द्वारा मनतव्य प्रस्तुत किया जाना मधेसवादी दल के नेताओं की बिमार मानसिकता साफ-साफ दर्साता है ।
लोकतान्त्रिक प्रक्रिया मानकर राजनिती करनेवाले पार्टि के जिम्मेवार नेता उपेन्द्र यादव ने जिस तरह चैत 13 गते मलेठ मे आयोजित श्रद्धाञ्जली सभा मे मधेसी यूवाओं हथियार उठाने के लिए तैयार रहने को कह दिया । सवाल यह पैदा होता है कि अगर आप अच्छाई के लिए भी हथियार उठाते है हत्या, हिंसा करवाते या करते है तो दुनिया उसे आतंकवादी मानते है और वर्तमान परिवेश में दुनिया की सारी बडी सक्तियाँ आतंकवाद के खिलाप लड़ने के लिए एकजुट हो रही है । ऐसे में मधेसीयों को हिंसात्मक गतिविधियों के लिए उक्साना क्या नेताओं की नाकामी तो नही, हम पिछले 11 वर्षों से देखते आ रहे हैं मधेसी हक अधिकार के नामपर वोटबैंक की राजनीति करनेवाले मधेस केन्द्रित दलों ने सिधे-साधे मधेसी जनता को भडकाकर मौत के सहारे करते आए है । सैंकडो मधेसीयों की नेपाली पुलिस ने गोली से हत्या कर दिया, नाजाने कितने घर से बेघर हुए घायलों की स्थिति दयनिय है अनाथ हुए बच्चों को देखनेवाला कोई नही है, कितने माताओं की कोख उजड गया, बहुत सारी सुहागन बिध्वा हो गई और कष्टकर जिवन निर्वाह कर रही है । किन्तु मधेसवादी दल के नेताओं को देखिये सहिदों के लास को सत्ता की सिढी बनाकर मन्त्री पे मन्त्री हुए, देस-विदेस का भ्रमण करते रहे, महंगी गाडी और होटलों मे ऐसो-आराम फरमाते रहे, बेसुमार दौलत का आर्जन किया और जब खुद मे ही सामनजस्ता नही रहा तो सत्ता लोभ मे आकर छोटे-छोटे टुकडों मे विभाजन हो गए | ईतना बडा-बडा मधेस आन्दोलन, कुर्बानी, जन धन की क्षति से मधेसीयों को क्या मिला सम्झौता और आश्वासन……! एकबार मधेसी नेपाल में हक-अधिकार पाने के लिए प्राणों की आहुति देते हैं तो नेपाली राज्य द्वारा अधिकार देने का सम्झौता किया जाता है, उसी सम्झौता को कार्यान्वयन करवाने के लिए फिर से मधेसीयों को प्राणो की आहुति देना पडता है । लेकिन कोई भी अधिकार स्थायी रुपसे प्राप्त नही होता है तो फिर क्यूँ हमारे नेतागण मधेसीयों को नेपाली राज्य के आग की भट्ठी में झोकना चाहते है । ये हत्या हिंसा कि राजनीति मधेस में आखिर कब तक……….?

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