कारागार या मृत्युघर ? : रणधीर चौधरी
नेपाल सरकार भी अपने ही द्वारा स्थापना किए गए संबैधानिक संस्था अर्थात राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को महत्व नहीं दे रही है इससे यह प्रतीत होता है कि मानव अधिकार के लिए नेपाल मे कोई जगह नहीं है । 
हिमालिनी, अंक जुलाई २०१८ | समान्यतया, कारागार, अपराध करने वाले व्यक्तियाें को सजा के रूप मे और अपराध से सम्बन्धित आरोप लगे हुए व्यक्तियाें को पुर्पक्ष हेतु हिरासत मे रखने के लिए राज्य के दवारा बनाए गए कमरे को इंगित करता है । अपराधी वा अपराधी आरोपितों के लिए कारागार घर तुल्य होता है । वैसा घर जहाँ किसी को उसके जान की गारेन्टी की अनुभूति होनी चाहिए । परंतु नेपाल का कारागार सुरक्षा की दृष्टिकोण से उपयुक्त नहीं है । इस बात को प्रमाणित करता है नेपाल के कारागार में ‘कस्टडियल डेथ’ । वर्तमान गृह मंत्री राम बहादुर थापा ने कारागार का अवलोकन कुछ महीने पहले किया था । भ्रमण पश्चात उन्होने अभिव्यक्ति दी थी कि नेपाल के कारागार की अवस्था दयनीय है । यह किसी गृहमन्त्री की फगत अभिव्यक्ति नहीं है । अपितु कारागार की अवस्था नाजुक होने के सत्य के उपर सरकारी लालमोहर भी है । करागार भौतिक हिसाब से बहुत ही पुराना है । जिसका निर्माण राणाकालीन युग मे ही हुआ था । गृहमन्त्री ने कारागार भवन के वातावरण आदि के आयाम को ही सिर्फ केन्द्र मे रखकर अनुगमन किया था, समाचारपत्र में आए खबर को माध्यम बना कर देखा जाए तो । वर्तमान में करोड़ों के निवेश में बनाया गया भवन भी है यहाँ । फिर भी इस देश में हिरासत कक्ष और कारागार के भीतर ही आरोपी और कैदी सुरक्षित नहीं हैं । प्रदेश १ के गौरीगंज और प्रदेश २ के सिरहा के बिस्नुपुर मे थाने के भीतर ही हरिनारायण यादव और प्रियंका यादव की हत्या÷मौत की घटना बाहर आयी थी । दोनों ने फाँसी लगा कर आत्म हत्या किया था । ऐसा कहना है सम्बन्धित थाने के जिम्मेबार अधिकारियाें का । हालाँकि इसका कोई भी अनुसन्धान नही किया गया कि यह हत्या है या आत्महत्या । कुछ मानव अधिकार संस्थाओ ने इस घटना में अपना ध्यान केन्द्रित किया था । राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने भी इन घटनाओ का अनुगमन कर अपना कर्मकाण्ड पूरा किया । परंतु आयोग का प्रतिवेदन अब तक सार्वजनिक नहीं हो पाया है । हालाँकि पीडि़त परिवारजन के द्वारा आयोग मे याचिका दायर कर उचित क्षतिपूर्ती के दिलवाने के लिए गुहार भी लगाया था ।
धनुषा जिला ढल्केबर गा.बि.स वडा नं ३ के रहने बाले वर्ष २५ के विनोद यादव की मौत भी हिरासत में ही हुई थी । जिसमें प्रहरी को दोषी करार किया गया था । मानना यह है कि हिरासत मे रखे गए आरोपी की अगर संदेहास्पद मौत हो जाय तो इसका जिम्मेदार वहाँ के अधिकारियों को ही माना जाता है । अतः विनोद यादव की मृत्यु के पश्चात परिवार के भरणपोषण और सन्तान की शिक्षा दीक्षा में स्वाभाविक तौर से असर पड़ता है । जिसकी वजह से मृतक के परिवार को कानून बमोजिम रु.१,००,००० क्षतिपूर्ति प्रदान करने के लिए तथा इलाका प्रहरी दप्स्तर, ढल्केबर के प्रहरी निरीक्षक श्यामप्रसाद केसी और घटना होने के वक्त ड्यूटी में रहे प्रहरी जवान दुर्गा घिमिरे को विभागीय कारबाही करने के लिए मानव अधिकार आयोग के द्वारा बि.सं २०६६ कार्तिक १७ गते नेपाल सरकार को सिफारिश किया गया था ।
उसी तरह आयोग द्वारा ही प्रकाशित ‘कारागार तथा हिरासत मानव अधिकार प्रतिवेदन’ मे इसी प्रकृति की दर्जनो घटनाओं का उल्लेख किया गया है । जिस में अनुसन्धान कर क्षतिपूर्ति के लिए सिफारिश भी किया गया है । विडंबना ही कहा जाना चाहिए कि सरकार मानव अधिकार आयोग को कौड़ी का भाव देने को तैयार नही । और ऐसी घटनाओ में अन्य अपने आपको वरिष्ठ मानव अधिकारकर्मी कहने वाले महानुभावों की चुप्पी भी सोचनीय है और आलोचनीय भी । रोजमर्रा की जिन्दगी से रोज लड़ने वाले नेपाली नागरिक का आए दिन मानव अधिकार उल्लंघन हो रहा है इस देश में । कैसे न्याय मिल पाएगा उन लोगो को ? एक गहन चुनौती का विषय बना है नेपाल में । नेपाल में मानव अधिकार के ही नाम पर दर्जनों गैरसरकारी संस्था खुली हुई है । लोक कल्याण के नाम पर भी संस्थाओं की कमी नही है । विदेशी सहायता भी मिल रही है उन सभी संस्थाओ को । तो फिर क्यों नैतिकता को तख्त पे रख सिर्फ पैसा कमाने में आगे बढ़ रहे हैं और दुनिया को बस मानव अधिकार का पाठ पढ़ाने मे लगे हुए हैं । सामाजिक न्याय के पैरवीकर्ता के नाम पर सिर्फ ढोंगी बने हुए हंै । और तो और नेपाल सरकार भी अपने ही द्वारा स्थापना किए गए संबैधानिक संस्था अर्थात राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को महत्व नहीं दे रही है इससे यह प्रतीत होता है कि मानव अधिकार के लिए नेपाल मे कोई जगह नहीं है ।
हिरासत और कारागार के भीतर किसी की मौत होना अपने आप मे सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है । अपितु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की बदनामी भी है । और वैसी मौत वास्तव मे मौत है या हत्या है, प्रायः बिना अनुसन्धान किए दबा दिया जाता है । कोई अगर हिरासत या कारागार मे आत्महत्या भी करता है तो उसको वैसा करने से रोकने के लिए भी जिम्मेवार नेपाल सरकार द्वारा नियुक्त प्रहरी प्रशासन ही है ।
नेपाल सरकार के भूतपुर्व अतिरिक्त एआइजी नवराज ढकाल ने स्तम्भकार को कहा कि नयी संरचना वाले हिरासत कक्ष में कुछ सुधार लाने की आवश्यकता है । दीवारों मे बनाए गए ‘भ्यान्टिलेटर’ में लगाए गए सरिया को मजबूत जाली से विस्थापन करना होगा । और खटाए गए प्रहरी जवान को भी हरपल चौकन्ना रहने की आवश्यकता है । अन्त में, गृहमन्त्री द्वारा किया गया कारागार अनुगमन एक कर्मकाण्ड बनकर ना सीमित रह जाय । इसका फलोअप कर पूर्ण जिम्मेवार गृहमन्त्री को बनना चाहिए । और राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग भी अपनी उपस्थिति को वास्तविक रूप देने के लिए नेपाल सरकार को बारम्बार दबाब देते रहने की आवश्यकता है । अपने आप को वरिष्ठ मानव अधिकारकर्मी कहने वाले महानुभावाें को भी अपनी वरिष्ठता कर्म से सिद्घ करने की जरुरत है ।

