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चीन और भारत के बीच सतुलन स्थापित करने में नाकाम नेपाल : त्रिभुवन सिंह

 

हिमालिनी, अंक नोभेम्बर 2018,नेपाल और चीन की बढती घनिष्ठता कई सवालों को जन्म देती है । जिसके परिप्रेक्ष्य में नेपाल और भारत के सम्बन्धों को भी तौला जा रहा है । नेपाल और भारत का सम्बन्ध सिर्फ राजनैतिक नहीं है इस सम्बन्ध की नींव संस्कृति पर टिकी है । दो अलग राष्ट्र होने के बावजूद इन दो रिश्तों की घनिष्ठता ऐसी है कि इसे संस्कृति की धरातल पर अलग कर के देखना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगता है । नेपाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में भारत और भारत की धरती ने हमेशा साथ दिया है, ठीक उसी तरह जिस तरह भारत की आजादी की लड़ाई में नेपाल ने साथ दिया था । ये और बात है कि इस साथ को नेपाल में कभी कभी दखल का नाम देकर आलोचित भी किया जाता रहा है । कई मामलों में यह देश के आन्तरिक मामले में सच हो भी सकता है, पर कहीं ना कहीं एक आत्मीयता का रिश्ता भी इन दोनों देशों के बीच है इससे इनकार नहीं किया जा सकता है । जब दो देशों की खुली सीमाएँ हों तो वहाँ एक दूसरे के देशों में घटी घटनाओं में दिलचस्पी स्वाभाविक सी बात है हाँ अति का विरोध स्वाभाविक है । इधर नेपाल भारत सम्बन्धों में कहीं ना कहीं एक ठंडापन अवश्य आ गया है । और इसी बीच भारत और चीन के रिश्तों में बढता तनाव नेपाल और भारत के रिश्तों पर भी अनदेखा सा प्रभाव डाल रहा है
हालाँकि नेपाल ने चीन से इसके चार बंदरगाह और तीन लैंडपोर्ट का इस्तेमाल करने की इजाजत हसिल कर लिया है । नेपाल भले ही इससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कुछ वैकल्पिक रास्ते बनाने की बात कर रहा हो लेकिन इस कदम को भारत की चिन्ता बढ़ाने वाला कदम ही माना जा रहा है ।
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने इस वर्ष की शुरुआत में यह कहा था कि वह चीन के साथ सम्बन्धों को प्रगाढ़ बनाकर नए अवसर को तलाशेंगे और भारत के साथ पहले हुए समझौतों से अधिक फायदे लेने की कोशिश करेंगे । लेकिन इससे जुड़ा हुआ सवाल यह है कि क्या चीन के इन बंदरगाहों का इस्तेमाल नेपाल के लिए व्यापारिक रूप से फायदेमन्द है ?
चीने ने नेपाल के लिए बंदरगाह दिया है, उसमें सबसे करीब तियानजिन नेपाली सीमा से लगभग तीन हजार किलोमीटर दूर है । वही भारत के कोलकाता की दूरी नेपाल सीमा करीब सात सौ किलोमीटर और विशाखापत्तनम की दूरी लगभग १,२०० किलोमीटर है । जाहिर है कि यह दूरी आयात और निर्यात दोनों मामलों में नेपाल को मंहगी पड़ने वाली है । यह दूरी एक ही सूरत में फायदेमन्द हो सकती है जब चीन नेपाल के लिए अतिरिक्त ढाँचा तैयार करे । पर वास्तविकता यह है कि चीन की एक महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना जिसमें भारत को शामिल करने की चीन की कोशिश और दवाब लगातार जारी है । देखा जाय तो नेपाल को चीन को दी जा रही सुविधाएँ इसी का हिस्सा है । लेकिन फिलहाल मुद्दा भारत के प्रति नेपाल के बदलते रुख का है ।
नेपाल ने बिमस्टेक शिखर सममेलन के दौरान भारत केसाथ संयुक्त सैन्य अभ्यास में भाग लेने की सहमति जताई थी किन्तु बाद में अचानक फैसला बदल लिया । ऐसा नहीं है कि ये सारी चीजें अचानक हुई हैं । नेपाल का व्यापार घाटा पहली बार दस अरब डालर को पार कर चुका है । महज पाँच वर्ष पहले नेपाल का व्यापार घाटा ४.८७ अरब डालर था । यानि पाँच वर्ष में दोगुने से ज्यादा हो गया है । इस दौरान आयात भी दोगुना बढ़ा है । जबकि निर्यात में मामुली वृद्धि ही हुई है । नेपाल का आयात २०१३–१४ में ५.५७ अरब डालर का था जो अब ११.२८ अरब डालर का हो गया है । निर्यात २०१३–१४ में ७०.३१ करोड़ डालर था जो अब ७३.७५ करोड़ डालर हो गया है ।
अब आयात निर्यात के लिए नेपाल ने चीन में जो वैकल्पिक रास्ते खोजे हैं वे उसकी आर्थिक समस्याओं को बढ़ाने वाले हैं । एक तरफ उसे आयात के लिए ज्यादा रकम खर्च करना होगा, तो वहीं दूसरी तरफ उसका निर्यात महँगा हो जाएगा ।
नेपाल दुनिया के दो बडे ताकत वाले देशों का पडोसी है और इनमें से किसी से भी नेपाल के रिश्ते कटु नहीं हैं । वह चाहे तो समझदारी दिखाकर इन दोनों से ही देश हित में फायदा ले सकता है । शुरु में नेपाल ऐसा करता हुआ दिखा भी । नेपाल और चीन के बीच इस वर्ष टापनी प्रवेश बिन्दु को शुरु करनेको लेकर समझौते हुए और केरुंग और रसुवागढी में बेहतर आधारभूत ढाँचा खडा करनेपर भी सहमति बनी । एक समझौता दोनों देशों में रेल ढाँचा विकसित करने पर हुआ । लेकिन समस्या तब शुरु हुई जब नेपाल ने भारत और चीन के बीच रिश्तों को इसे संतुलित करने के बजाय अपना झुकाव स्पष्ट तौर पर चीन की ओर कर लिया जबकि भारत से बेरुखी नेपाल के लिए कई मायने में घाटे का सौदा हो सकता है और हो भी रहा है ।
नेपाल के कुल विदेशी व्यापार में भारत की हिस्सेदारी ६६ प्रतिशत की है । इसके अलावा भारत में करीब ६० लाख नागरिकों को रोजगार मिला हुआ है । फिर भी यथार्थ की इस जमीं को नजरअंदाज करते हुए नेपाल का पूरी तरह से चीन के लिए झुकाव देश के लिए अच्छा संकेत नहीं है और वह भी उस हालत में जब पूरा विश्व चीन की बढती महत्तवाकांक्षा और विस्तारवादी नीति से परिचित है और इस कोशिश में है कि चीन से सतर्क रहे । चीन की यही नीति ये सोचने पर बाधित करती है कि नेपाल के साथ चीन का सम्बन्ध सिर्फ नेपाल के विकास को लेकर है या भारत को घेरने की एक सोची समझी नीति । सदियों का रिश्ता राजनीतिक तौर पर कमजोर होता नजर आ रहा है ।

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