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नारी और पुरुष रथ के दो पहिये
प्रभा सिंह कुंवर

 

व्यक्ति निर्माण से लेकर विश्व निर्माणतक महिलाओं के महइभ्व और भूमिकाको हम
सभी अच्छी तर ह से जानते हैं । परि वार जो
कि समाज की सबसे छोटी इकाई है, चाहे
संयुक्त हो या एकांकी, उसकी जीवन पद्धति
तथा सामाजिक व्यवहार उस परि वार की
प्रमुख महिला के संस् कार ो से प्रतिविम्बित
होते है । परि वार के हर सदस् य के संस् कार ों
को परि ष्कृत कर ने की प्रत्यक्ष या पर ोक्ष
जिम्मेवार ी उसी पर होती है । इतिहास
साक्षी है कि विश्व के महान से महान चरि त्र
चाहे महार ाजा शिवाजी हों या भार त के
लाल बहादुर शास् त्री, महात्मा गान्धी हों या
लाला लाजपत, नेपाल के प्रथम र ाष्ट्रपति
डा. र ामवर ण यादव, इन सभी को गढÞने
में माताओं का ही सबसे बडÞा हाथ र हा
है । नार ी, सेवा, ममता, कल्याण, त्याग और
उच्च मूल्यो की संजीव प्रतिमा है ।
वतर्म ान दारै म ंे उस क े जीवन का े यदि
ध्यान साधना और अभ्यास का सम्बल देकर
विकसित और परि ष्कृत कर दिया जाए तो उस
के स् नेह से विनयशील, निःस् वार्थी, कर्तव्यनिष्ठ
और विशाल दृष्टिकोण बाले उदार मना व्यक्ति
निमिर्त हो सकते हैं । आज इसी की आवश्यकता
है । इस के लिए नार ी का आध्यात्मिक और
नैतिक सशक्तिकर ण होना चाहिए । आर्थिक,
सामाजिक, र ाजनैतिक शसक्तिकर ण तो
नैतिक सशक्तिकर ण की पर र्छाई मात्र है ।
बहुत दिनो से दवी हर्ुइ नार ीवृति
स् वतन्त्रता का अर्थ उच्छृंखलता मान बैठी
है । इस के परि णामस् वरुप, स् वच्छ समाज
के स् थान पर एक स् वच्छन्द समाज का
बातावर ण बनने लगा है । सर कार ी कानून
ने भी वासनात्मक भाव-भंगिमाओं को कला
के नाम पर स् वीकृति देकर आग मे घी का
काम किया है । फिर वर्तमान काल के
कुछ चिन्तकों ने कहा कि मनुष्य हर कार्य
कामप्रेरि त होकर कर ता है । इससे नार ी
के प्रति पूज्या के स् थान पर भोग्या का
गलत दृष्टिकोण समग्र रुप से पनपने लगा
है । कई मनोवैज्ञानिकों, लेखको, चिन्तको ने
पर्ूवाग्रही होकर नार ी को शार ीरि क, मानसिक,
मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक आदि स् तर ों पर
पुरुष की तुलना में निम्न स् तर की होने की
भ्रान्त धार णाओं को प्रचलित किया । जिस के
कार ण समाज ने सचमुच ही उसे निम्न स् तर
की मान लिया । इस तथा अन्य भी बहुत सी
बातो को जब तक वैज्ञानिक और निष्पक्ष
आधार के द्वार ा सही रुपमे न जाना जाए,
जब तक हमार ी मान्यताएँ नहीं बदल सकती
और जब तक मान्यताएँ नहीं बदलती, तब
तक दृष्टिकोण नहीं बदलता और जब तक
दृष्टिकोण नहीं बदलता तब तक सशक्तिकर ण
हो नहीं सकता ।
देशांे के सम्बन्ध में सशक्तिकर ण कार्
अर्थ है कि अब नार ी नैतिक और आध्यात्मिक
शक्ति प्राप्त कर के पुरुषत्व की गुलामी कर ना
छोडे । वह पुरुष को सहयोग देकर सयोगिनी
बने । उसके साथ मिलकर गृहस् थी चलाए,
गृहस् थ आश्रम को सफल बनाएँ, कमिनी के
बजाए कल्याणी बने और अबला के बजाए
शक्तिरुपा बने ।
मातृजाति सेवाकी जीवन्त प्रतिमा है ।
उस के ममत्व का कही अन्त नहीं होता । उस
के पास सब के कल्यण की कामना है । वह
किसी का अहित नहीं सोचती । स् वयं उस का
व्यक्तिगत हित और व्यक्तिगत स् वार्थ परि वार
में नगण्य हो जाता है । अपने व्यक्तिगत सुख
और स् वार्थ की भावना को त्याग कर वह
पूर े परि वार के मंगल और हित के लिए
निःस् वार्थ भाव से समर्पित है । यह माता का
चरि त्र “र्सवजनहिताय” एक आर्दश चरि त्र है ।
यदि परि वार की किसी माता की संस् कृति
अर्थात उसकी जीवनपद्धतिको ध्यान, साधना
और अभ्यास के द्धार ा और अधिक विकसित
या परि ष्कृत कर दिया जाए तो उस माता के
प्रभाव से परि वार ो में मनुष्यता के श्रेष्ठ गुणों
का और उच्च कोटी के चरि त्र का निर्माण
और विकास होते देर नहीं लगती ।
सामाजिक व्यवहार और उस की
जीवन पद्धति का स् वरुप परि वार की प्रमुख
महिला के संस् कार ो से ही प्रतिबिम्बित
और निर्मित होता है । परि वार के छोटे
से बडे तक को संस् कार ो से परि ष्कृत
कर ने का प्रत्यक्ष और परे ाक्ष दायित्व
परि वार की प्रमुख मातृशक्ति पर आ
पडÞता है । ऐसा लगता है कि पर मेश्वर
विश्व मे मातृ जाति पर ही यह दायित्व
देकर उन्हे पृथ्वी पर भेजा है । कि वे
अपनी श्रमशक्ति, सेवा भावना, निष्ठा और
साहिष्णुता से परि वार के लोगों मंे चरि त्र
के उदात्त गुणों का बीजार ोपण कर े और
अपने अलौकिक स् नेह की शीतल छाया मंे
उन गुणों का विकास कर ने का अवसर
पर वार के लोगों को दे ।

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