सुशासन बिना विकास ः भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार
हिमालिनी, अंक मार्च 2019 | नविन कुमार नवल, परिवार हो या गाँव, शहर से लेकर देश तक विकास करने के लिए सुशासन यानी विधि, नियम, संस्कृति, धर्म अनुशासन जरुरी है । इस सबके संस्थागत उत्थान से विकास की अनुभूति होनी है । लेकिन हमारे देश नेपाल में सुशासन की अनुभूति कम होती जा रही है । हमारे देश के नागरिक आशाओं कें रेत पर टिकी हुई है ।
जब देश तानाशाह राना शासन के बाद राजतन्त्र फिर राजतन्त्र के वाद प्रजातन्त्र प्रजातन्त्र के वाद साम्राज्यवाद कम्युनिष्ट, फिर जनविद्रोह के वाद सर्वहारा माक्र्सवाद, गणतन्त्र और फिर गणतन्त्र के बाद संघीय गणतन्त्र में आकर फसा हुआ हैं । हमारे देश की जनता प्राकृतिक सम्पदा के धनी, इमानदार, बहादुर औंर धार्मिक रुप से पहले से ही ख्याति प्राप्त हैं । फिर भी विकास में पीछे और भ्रष्टाचार मे आगे चल रहा हैं । इसका मूल कारण हैं सुशासन का अभाव । सुशासनका मतलब विधि, नीति, अनुशासन, पारदर्शिता, न्याय इत्यादि इसमे अभी तक असफल हैं । इस देश मे न्यायपालिका पहले ही फेल था फिर कार्यपालिका और फिर व्यवस्थापिका नियमों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं । इसी का परिणाम हैं सोना काण्ड, निर्मला हत्या काण्ड, सुडान काण्ड, वाइडवडी काण्ड, जिसमे पर्यटनमन्त्री से लेकर गृहमन्त्री एवम् पूर्व प्रधानमन्त्री असुरक्षित एवम् कमजोर होते हुए विकास के नाम पर भ्रष्टाचार के विस्तार में लगे हुए हैं ।
जब केन्द्र मे सुशासन की ऐसी दशा हो तो प्रदेश और स्थानीय सरकार में हो रहे चौतरफा ब्रम्हलूट का क्या कहना । उपर से लेकर स्थानीय स्तर तक विरोध, तालाबन्दी और मारपीट होने लगा है वो भी कर्मचारी और मन्त्री के बीच में तो वहाँ सुशासन का मतलब क्या । जहाँ अनुगमन, अनुसन्धान, अख्तियार, आयोग जैसी संस्था और विभाग भ्रष्टाचार नियन्त्रण के नाम पर औपचारिकता निभाएँ तो वहाँ किस पर भरोसा किया जाए ? इस देश में कृपावाद, स्वार्थवाद एवम् आर्शिवाद सें राष्ट्रपति, मन्त्री, साँसद की कुर्सी मिलती हो, बडेÞ बडेÞ काम का ठेका मिलता हो , एनजिओ में प्रोजेक्ट मिलता हो, न्यायालय से अवैध ८० लाख अमेरिकी डलर निकासी की अनुमति मिले तो उस देश के कानून नियम को क्या कहा जाएगा । मात्र एक प्रदेश मे जहाँ विकास खर्च के ८ अरब में से ३ अरब रुपया खर्च हो और उसमें एक अरब रुपया गाड़ी खरीद से लेकर तलव भत्ता में खर्च हो जाए तो वहाँ विकास की कैसी अनुभूति होगी ? इसके अलावा प्रधानमन्त्री के रोक आदेश के बावजूद मन्त्री, कर्मचारी, स्थानीय प्रमुख, अध्यक्ष विदेश भ्रमण से लेकर धार्मिक भ्रमण (कुम्भ, अयोध्या, बैजनाथधाम) मे सरकारी खर्च कर दुरुपयोग करें तो इस से कैसी प्रजातन्त्र की झलक दिखाइ देंगी ?
यहाँ तो प्रजातन्त्र नही मनतन्त्र कहना जायज होगा । इस देश में विं.सं. २००७ से ७ संविधान बना यानि प्रत्येक १० साल पर एक संविधान बनना और इसको कागज एवम् भाषण तक सीमित रखना तो दूसरी तरफ पहाड़ी शासक द्वारा पहाड़ी के हक अधिकार तो मधेशी शासक द्वारा मधेशी के हक, अधिकार के नाम पर कुर्सी, पद पाने मेें लगा हुआ है ।
जिस समाज देश में कानून का राज न हो, पारदर्शिता न हो, उचित न्याय न हो, उत्तरदायित्व न हो, प्रभावकारिता और कुशलता न हो तो वहाँ सुशासन कैसे दिखेगा ? और सुशासन ही न हो तो वहाँ विकास के नाम पर भ्रष्टाचार के अलावा क्या दिखेंगा ? इस देश की प्राकृतिक सम्पदा एवम् कृषि के साथ–साथ विदेश में जाकर श्रम कर इस देश की जनता आशा और सपना के आधार पर जीवन बिताते हुए इस देश की शान को बचाए हुए हैं न कि सुशासन और विकास के बदौलत, स्वास्थ्य शिक्षा की अवस्था, कृषि पानी की अवस्था, न्याय कानून की अवस्था इतनी दयनीय होती जा रही है कि इस देश की सुशासन और विकास के रूप में परिणत करना मुश्किल लग रहा हैं ।
महोत्तरी

