Thu. Nov 7th, 2019

जीवन एक अवसर है, जिसके सदुपयोग में ही सार्थकता है : कालीप्रसाद रिजाल, गीतकार

मुझे विद्रोही करार देते हुए शिकायत पत्र में यह भी लिखा गया था कि वह विद्रोही सरकारी कर्मचारी है, इसीलिए ऐसे व्यक्ति को सरकारी नौकरी नहीं, मृत्युदण्ड (फांसी) मिलनी चाहिए ।

   ‘आँखा छोपी नरोऊ भनी भन्नुपरया छ, मुुटुमाथि ढुंगा राखी हास्नुपरया छ’

हिमालिनी, अंक अप्रील 2019 |श्री कालीप्रसाद रिजाल पूर्व कार्यकारी सचिव हैं । लेकिन बहुत लोग आप को सरकारी कर्मचारी के रूप में नहीं, एक कवि तथा गीतकार के रूप में जानते हैं । साहित्यिक जगत में आप का एक और सशक्त परिचय भी है वह है– व्यंग्य लेखन । आप का जन्म वि.सं. १९९६ साल चैत्र १० गते धरान (सुनसरी) में हुआ है । आपके पिता जी का नाम रुद्रप्रसाद रिजाल और माता जी का नाम कृष्णमाया रिजाल है । आप अपने जीवन में सरकारी नौकरी नहीं करना चाहते थे, लेकिन अन्ततः कार्यकारी–सचिव होकर सेवा–निवृत्त हैं । इसके पीछे बहुत सारी कथाएं जुड़ी हुई है । आपने अर्थशास्त्र में एम.ए और कानून में बी.एल किया । आज आप बौद्ध–महांकाल (काठमांडू) के स्थायी निवासी हैं । कविता संग्रह, गीति नाटक, गजल संग्रह जैसी विधाओं में आपकी १ दर्जन पुस्तकें प्रकाशित है । आप ने वीपी कोइराला द्वारा लिखित उपन्यास ‘सुम्निमा’ का हिन्दी में अनुवाद भी किया है । ५ गीति एल्बम (गीतों की संग्रह) भी बजार में हैं । आप के द्वारा रचित ३०० से अधिक गीतों में विभिन्न गायक–गायिकाओं ने अपनी आवाज दी है । रोयल नेपाल एकेडेमी पदक, रत्नश्री पदक, छिन्नलता गीति पुरस्कार, हरिहर शर्मा सावित्री पुरस्कार, भानुभक्त पुरस्कार जैसे गीत एवं साहित्य के साथ सम्बन्धित १ दर्जन से अधिक पुरस्कार तथा सम्मान आप को प्राप्त हैं । प्रस्तुत है कालीप्रसाद रिजाल का जीवन–सन्दर्भ आपके लिए –


झरेको पातझैं भयो उजाड मेरो जीन्दगी
निभेको दीपझै भयो उदास मेरो जीन्दगी ।

पारिवारिक पृष्ठभूमि
मेरे पिता–पूर्वज धनकुटा से स्थान्तरण होकर धरान होते हुए विराटनगर तक बसे हुए हैं । विराटनगर से मैंने काठमांडू तक का सफर किया । हम लोग ५ भाई थे, भाईयों में से मैं तीसरे नम्बर पर आता हूँ । पारिवारिक पृष्ठभूमि खेती पर आधारित है । उस समय तराई में घना जंगल हुआ करता था । अगर कोई व्यक्ति उस जंगल को विनाश करते हुए खेती करता था तो राज्य की ओर से कोई रुकावट नहीं होती थी । क्योंकि जंगल से राजश्व संकलन नहीं होता था, राजश्व संकलन के लिए भी तत्कालीन राणा शासकों ने जंगल को नाश कर आबादी बसाने के लिए छूट दे दी थी । उसी सुविधा के अनुसार धनकुटा लगायत अन्य पहाड़ी क्षेत्राें से तराई आकर खेती करनेवालों की संख्या में वृद्धि हो रही थी । सीमावर्ती भारतीय गांव से भी इसी तरह नेपाल आकर रहनेवाले लोग होते थे, विशेषतः वे लोग मजदूरी करने के लिए नेपाल आते थे । ऐसी ही पृष्ठभूमि में मेरे दादा–दादी और माता–पिता धरान आ गए, बाद में विराटनगर में जाकर जंगल को खेती योग्य जमीन बनाया, खेती शुरु की । पिता जी खेती में आधारित व्यपार भी करते थे । आज मैं अपनी पत्नी अजिता और अरुण रिजाल के साथ काठमांडू में रहता हूँ । मेरे तीन बेटों में से दो (अनिल और असिम) अमेरिका में रहते हैं ।

औपचारिक शिक्षा और साहित्यिक यात्रा
स्व. वीपी कोइराला के पिताजी कृष्णप्रसाद कोइराला ने विराटनगर में ‘आदर्श विद्यालय’ नामक स्कूल खोला था । मेरे चाचा और अन्य बड़े भाई लोग पढ़ने के लिए धरान से विराटनगर जाते थे । मेरे माता–पिता भी अधिकांश समय विराटनगर में ही रहते थे । कारण था– खेती, व्यापार और बच्चे लोगों की शिक्षा । लेकिन शुरु में मुझे यह अवसर नहीं मिला । अर्थात माता–पिता के साथ विराटनगर में रहने का सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ । उस समय बच्चों की शिक्षा–दीक्षा के लिए भारत से शिक्षक मँगवाया जाता था और अपने ही घर में आश्रय देकर बाल–बच्चों को शिक्षा–दीक्षा दिलाई जाती थी । मैं और गांव के अन्य समकक्षी के लिए भारत से एक शिक्षक को लाया गया । उन्ही से मैंने प्रारम्भिक शिक्षा शुरु की । बाद में विराटनगर आया । फिर विराटनगर से धरान गया और वि.सं. २०१३ साल में मैंने एसएलसी (प्राइवेट परीक्षा) पास की ।
तत्कालीन सामाजिक संस्कार के कारण मेरी मां कृष्णमाया ने औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी, लेकिन शिक्षा में उनकी रुचि अधिक थी, स्मरण शक्ति भी तेज थी । वह सामान्य लिख–पढ़ सकती थी । मेरे बड़े भाई और चाचा जी जब पढ़ने–लिखने के लिए बैठते थे तो मां भी मौका मिलते ही किसी जगह से छिप कर पढ़ने की आवाज सुना करती थी । इस तरह वह हिन्दी और नेपाली किताब पढ़ने में सक्षम हो गई थी । इसी तरह सुन सुनकर कई कविताओं को उन्होंने याद कर लिया था । इसका रहस्य मुझे बाद में पता चला ।
मां से मेरी मुलाकात कम होती थी पर जब भी मिलता तो माँ से उनकी याद की हुई कविताओं को सुना करता था और मंत्रमुग्ध हुआ करता था । विशेषतः लेखनाथ पौड्याल, लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा, बालकृष्ण सम, सिद्धिचरण श्रेष्ठ जैसे साहित्यकारों की कविता वह सुनाती थी । इसतरह ५–६ साल के उम्र में ही मुझे नेपाल के मुर्धन्य साहित्यकारों की कविता सुनने को मिली, जिसने मेरे अन्दर साहित्यिक कीड़ा को भर दिया । जिसका नतीजा है कि ७ साल की उम्र में ही मैं कवितात्मक शैली में अपनी मन की बातों की ‘तुकबन्दी’ कर लोगों के सामने प्रस्तुत करने लगा । ८–९ साल के उम्र में ही मैं धरान–विराटनगर क्षेत्र में आयोजन होने वाले साहित्यिक समारोह में सहभागी होने लगा । इस तरह के समारोह में मैं मञ्च में खड़ा होकर अपनी रचनावाचन करता था, खुद के द्वारा रचित गीत गाकर लोगों का मनोरञ्जन करता था । उस समय मेरी उम्र का कोई भी नहीं था, जो इस तरह खुद रचित नेपाली गीत और कविता मञ्च में जाकर गा सके । धरान–विराटनगर क्षेत्र में आयोजित प्रायः सभी कार्यक्रमों में मुझे आमंत्रित किया जाता था । इस तरह कम उम्र में ही उस क्षेत्र मैं चर्चित हो गया था ।

काठमांडू की यात्रा
वि.सं. २०१३ साल में एसएलसी पास करने के बाद मैं काठमांडू आना चाहता था । लेकिन मेरे अभिभावक इसके लिए तैयार नहीं थे । उच्च शिक्षा के लिए मेरे चाचा और बड़े भाई लोग भारत (बनारस और पटना) में थे । उस समय की पारिवारिक संस्कार में ‘ काशी– वास’ करने का प्रचलन था । अर्थात् वृद्ध अवस्था होने के बाद लोग काशी में जाकर रहते थे और उधर ही देह त्याग करते थे । उसी प्रचलन के अनुसार मेरे दादा–दादी भी ‘ काशी–वास’ के लिए गए थे । उन लोगों की सेवा के खातिर चाचा और बड़े भाई भी उधर ही रहते थे । दादा–दादी के साथ रहने से उच्च शिक्षा के लिए अवसर भी प्राप्त होता था । जब मैंने एसएलसी पास किया, मुझे भी उसी तरह दादा–दादी (धुव्रलाल और ललितदेवी) के साथ काशी में ही जाकर रहने के लिए कहा गया । लेकिन मैंने इस बात को अस्वीकार किया । विकल्प में पढ़ाई त्याग देने की धमकी दी । और मैंने कहा– ‘मुझे पढ़ना है तो मैं काठमांडू ही जाऊँगा, अन्यन्त्र नहीं ।’ अन्ततः मेरी जीत हुई, मुझे काठमांडू आने के लिए अनुमति मिल गई ।

काठमांडू में मेरे चाचा शंकरप्रसाद रिजाल जी रहते थे । कहा गया है कि काठमांडू जाकर तुझे चाचा जी के साथ ही रहना होगा, इस तरह मंै काठमांडू आ गया । इसके पीछे एक ही कारण है– मेरी मां द्वारा वाचित कविता, जो बचपन में वह सुनाती थी । मुझे पता था कि उस कविताओं के सर्जक काठमांडू में रहते हैं । जैसे भी हो, मैं उन लोगों से मिलना चाहता था । बालकृष्ण सम, लेखनाथ पौड्याल, लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा जैसे साहित्यकारों की कल्पना से ही मैं रोमाञ्चित हो जाता था । उन लोगों से मिलने का भूत मेरे ऊपर इस तरह सवार हो रहा था कि मैं एक तरह से इस बात के लिए पागल था । अगर मेरी चाहत पूरी होने की सम्भावना नहीं होती तो मैं काठमान्डू आने की जिद नहीं करता । अभिभावकों ने कहा था कि मुझे साइन्स पढ़ना है । लेकिन मेरी रुचि साहित्य की ओर थी । अंग्रेजी साहित्य पढ़ना चाहता था । इसीलिए साइन्स पढ़ने की चाहत को त्याग कर कॉमर्स विषय को लेकर त्रिचन्द्र कॉलेज में भर्ती हो गया ।

काठमान्डू आया और सभी मूर्धन्य साहित्यकारों से मुलाकात भी हुई पर मेरी जो पहचान बिराटनगर और धरान में थी वो यहाँ स्थापित नहीं हो पाई थी । वहाँ मुझे खोजा जाता था और यहाँ मैं गुमनाम था । यही कारण था कि मुझमें निराशा छा रही थी । इसी क्रम में एक दिन त्रिचन्द्र कॉलेज में एक सूचना प्रकाशित हुई । उस समय कॉलेज की ओर से ही ‘ज्योति’ नामक पत्रिका निकलती थी । सूचना अनुसार उक्त पत्रिका की ओर से अन्तर–कॉलेज साहित्यिक प्रतियोगिता होने जा रही थी । मैंने भी प्रतियोगिता में सहभागिता के लिए कविता लिखकर भेज दिया ।
उक्त कविता मेरे जीवन की प्रथम गद्य कविता है । बालकृष्ण शम, बालचन्द्र शर्मा, नेपाली विषय के अन्य प्राध्यापक कविता चयन समिति और निर्णायक मण्डल में थे । मेरे द्वारा रचित कविता को प्रथम पुरस्कार मिला, राजा महेन्द्र के हाथों तक्मा सहित पुरस्कार लेने का अवसर मिला । मेरी साहित्यिक यात्रा के लिए यह घटना महत्वपूर्ण साबित हुई । उसके बाद बहुत लोगों ने मुझे पहचान लिया, पत्र–पत्रिकाओं में मेरी रचना आने लगी, साहित्यिक समारोह में निमन्त्रण होने लगा । तराई निवासी एक सामान्य युवक को काठमांडू आना ही कठिन कार्य था । क्योंकि उस समय हम लोगों को काठमांडू आने के बदले भारत की ओर जाना सहज था । ऐसी पृष्ठभूमि में यहाँ आकर युवा उम्र में ही मैंने जो अवसर प्राप्त किया, वह कम ही लोगों को मिलता है । इसके साथ ही जीवन की अन्य यात्रा की शुरुआत हुई ।

अध्ययन के लिए भारत
त्रिचन्द्र कॉलेज से कॉमर्स में स्नातक करने के बाद एम.ए (स्नातकोत्तर) के लिए मैं भारत (बनारस) चला गया । बीएचयु से अर्थशास्त्र में एम.ए किया । एमए अध्ययन करते वक्त मंै भारत में भी साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रहा, चाचा हाथरसी, बेढ़क बनारसी, वीरेन्द्र मिश्र, सुमित्रानन्दन पन्त जैसे भारतीय साहित्यकारों से मिलने का अवसर भी प्राप्त हुआ । सिर्फ उन लोगों के ही नहीं, हिन्दी के अन्य साहित्यकारों की रचनाओं का खूब अध्ययन किया । उस वक्त मैं हिन्दी में ही कविता तथा गीत लिखकर साथियों को सुनाता था । यह मेरी बाध्यता भी थी । क्योंकि नेपाली समझनेवाले लोग कम थे । अधिक लोगों को अपनी कविता सुनानी है तो मुझे हिन्दी में ही लिखना पड़ता था । इसतरह मेरा जीवन साहित्य के साथ जुड़ा रहा ।

कम उम्र में ही प्रिन्सिपल
एमए पास होने के बाद मैं नेपाल वापस आया । उस समय धनकुटा में एक डिग्री कॉलेज था, जिसकी अवस्था दयनीय थी । पिताजी ने मुझे इसके बारे में कहा था । धनकुटा मेरे पुर्वजों का बासस्थान है, इसलिए मुझे भी दिलचस्पी रही । धनकुटा से भी एक विशेष प्रतिनिधि मण्डल आया और पिता जी से आग्रह किया कि कॉलेज बन्द होने की अवस्था में है । उन लोगों ने आगे कहा– ‘आपके पुत्र कालीप्रसाद ने डिग्री पास किया है, अगर आप कालीप्रसाद को हमारे कॉलेज में भेज देते हैं तो कॉलेज बन्द होने से बच जाएगा ।’ मैं कानून पढ़कर वकील बनना चाहता था । सरकारी नौकरी में प्रवेश करने की कोई चाहत नहीं थी । लेकिन पिताजी के आग्रह को अस्वीकार नहीं कर पाया । मैं धनकुटा चला गया । दो साल तक वहां प्रिन्सिप रहा और पढ़ाया । कॉलेज जीवन खतम होने के तुरन्त बाद मुझे यह अवसर मिला था । उस समय मैं २२–२३ साल का था । इतनी कम उम्र में प्रिन्सिपल होकर अपनी ही उम्र के स्नातक तह में अध्यनरत विद्यार्थी को पढ़ाना कम चुनौतीपूर्ण नहीं था, लेकिन चुनौती का सामना किया, परिणाम भी प्रशंसनीय रहा ।

भूमि–सुधार विभाग में दूसरी नियुक्ति
मैंने धनकुटा डिग्री कॉलेज में रहकर जो काम किया, उसकी प्रशंसा तत्कालीन राजा महेन्द्र तक पहुँच चुकी थी । राजा महेन्द्र उस समय भूमि सुधार ऐन लागू कर रहे थे । उसके लिए अर्थशास्त्री, प्राध्यापक, शिक्षित तथा सामाजिक कार्य में सक्रिय व्यक्तित्व की तलाश हो रही थी । कुछ व्यक्तियों ने मेरा नाम भी सिफारिश कर दिया । मुझे भूमि–सुधार अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया । कम उम्र की वजह से कई बार लोग मुझे अधिकारी नहीं मानना चाहते थे । मेरे पास प्रशासनिक ज्ञान भी नहीं था । तब भी भूमि–सुधार अधिकारी के रूप में मैं पाल्पा चला गया । राजनीतिक नियुक्ति लेनेवाले व्यक्ति को सरकारी कर्मचारी ही माना जाता था, लेकिन उन लोगों को अपनी सेवा परिवर्तन करने की सुविधा नहीं थी । जैसे भी मुझे भूमिसुधार विभाग में ही काम करना था, जो मैं नहीं चाहता था । इसीलिए २ साल के बाद मैंने भूमि–सुधार विभाग छोड़ दिया । पर उससे निकल नहीं पाया, इसीलिए मैंने लोकसेवा आयोग की परीक्षा देने का निर्णय किया ।

लोकसेवा प्रवेश
राजा से नियुक्ति प्राप्त सरकारी नौकरी तो थी, लेकिन मुझे काठमांडू से बाहर भी जाना पड़ता था । अपने बाल–बच्चाें की पढ़ाई के खातिर भी मैं काठमांडू में ही रहना चाहता था । इसीलिए भूमि–सुधार आयोग से बाहर होने के बाद मैंने लोकसेवा आयोग की परीक्षा दी । खुला प्रतिस्पर्धा में उतर कर मैंने द्वितीय श्रेणी (उप–सचिव) में नाम निकाला । मेरी पोस्टिङ सूचना विभाग के डायरेक्टर के रूप में हो गयी । यह वि.सं. २०३१–०३२ साल की बात है । यह सब होने के बाद भी मेरी साहित्यिक यात्रा नहीं रुकी थी । कविता और हास्य–व्यंग्य लगातार लिख रहा था ।

प्रथम गीत रिकॉर्डिंग
काठमांडू आने के बाद भूपि शेरचन, विजयबहादुर मल्ल जैसे साहित्यकारों की संगत से मैं गद्य कविता लिखने लगा, गीत लिखना छोड़ दिया था । आन्तरिक स्वभाव क्रान्तिकारी था, सरकारी नौकर होने के कारण उस को खुलकर नहीं लिख सकता था । तब भी राजनीतिक, प्रशासनिक सामाजिक आदि क्षेत्र में दिखाई देनेवाली विकृतियां के ऊपर मैं व्यंग्य लिखा करता था । जिस वक्त मैं सूचना विभाग में कार्यरत रहा, उस समय स्वरसम्राट नारायण गोपाल राष्ट्रीय नाचघर मातहत रहे सांस्कृतिक संस्थान में कलाकार के रूप में कार्यरत थे । वह अध्ययनशील व्यक्तित्व में से एक थे । मेरे द्वारा रचित कविता भी वह पढ़ लेते थे और काफी प्रभावित भी थे । यह सब मुझे बाद में पता चला । मेरा ऑफिस घण्टाघर स्थित जामे मस्जिद के नजदीक ही था, राष्ट्रीय नाचघर भी वसी के नजदीक ही था । अर्थात् हमारा ऑफिस एक दूसरे के सामने था । ऑफिस समय में एक दिन नारायण गोपाल जी मुझसे मिलने के लिए मेरे ऑफिस सूचना विभाग में आए । मैं उनका प्रशंसक था । उनहें देख कर मैं आश्चर्यचकित हो गया । उसके बाद हमारी मुलाकात नियमित होने लगी । मुलाकात में अक्सर गीतों पर चर्चा होती थी, इसी तरह समीक्षा भी हो जाती थी । अचानक एक दिन उन्होंने मुझे कहा– ‘रिजाल जी ! आप गीत लिखिए, मैं उसे गाऊँगा ।’
नारायण गोपाल द्वारा प्रस्तावित इस प्रस्ताव से मैं घबरा गया । क्योंकि २० साल से मैं गीत नहीं लिख रहा था । बचपन में धरान–धनकुटा करते वक्त गीत लिखकर गा लेता था, काठमांडू आने के बाद तो मैं सिर्फ कविता लिख रहा था, गीत नहीं । नारायण गोपालजी जैसे गायक के प्रस्ताव से तत्काल मैं कुछ नहीं बोल पाया । कुछ देर के बाद कहा कि मैं गीत नहीं लिख पाता हूं । लेकिन उन्होंने फिर कहा– ‘आप लिख सकते हैं, आप के पास वह क्षमता है ।’ मैंने भी कह दिया– ‘ठीक है, मै लिखता हूँ ।’ एक दिन ऑफिस का दरवाजा बन्द कर गीत लिखने के लिए बैठ गया–

आँखा छोपी नरोऊ भनी भन्नुप¥या छ
मुटुमाथि ढुंगा राखी हाँस्नुप¥या छ ।

(भाव ः खुद को आंख बंद कर न रोने के लिए कहना पड़ रहा है, हृदय के ऊपर पत्थर रख कर हँसना पड़ रहा है ) इस को लिखने के बाद मुझे लगा कि मेरा गीत नारायण गोपाल को पसन्द नहीं आएगा, इसीलिए पुनः दूसरा लिखा–

झरेको पातझैं भयो उजाड मेरो जीन्दगी
निभेको दीपझै भयो उदास मेरो जीन्दगी ।

(भावः पतझड़ की तरह हो गयी मेरी जिन्दगी, बुझा हुआ दीप की तरह बन गयी मेरी जिन्दगी) । खुद में आत्मविश्वास न होने के कारण मैंने उल्लेखित दो गीतों को लिख लिया था ।

५–७ दिनों के बाद नारायण गोपाल जी फिर आए और मुझ से पूछा– मैंने जो काम आप को दिया था, उसमें क्या प्रोग्रेस हो रहा है ?’ जान–बूझ कर भी मैंने अनजान बनते हुए कहा– कौन–सा काम थी, मैं तो भुलक्कड़ हूँ ।’ उन्होंने गीत की बात की । मैंने संकोच करते हुए जेब से कविता निकाली और उनकी ओर बढ़ा दिया । दोनों गीत उन्होंने बार–बार पढ़ा । लेकिन कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी । गीत गाने के लिए उपर्युक्त है या नहीं, कुछ भी नहीं कहा । अन्ततः कहा– ‘मै जाता हूँ ।’ मैंने चाय के लिए अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने इन्कार किया । चुप–चाप निकल गए ।
मैंने अनुमान किया कि शायद मेरे गीत उन्हें अच्छे नहीं लगे इसलिए चुपचाप चले गए । ५–७ दिनों के बाद वो फिर आए । उनके हाथ में एक कैसेट था, मुझे देते हुए कहा– ‘इस में जो गीत है, उसको सुनकर आप समीक्षा करें । इसको मैने सामान्य रूप में लिया, क्योंकि कई बार उन्होंने ऐसा किया था । इसीलिए मुझे लगा कि कोई नया गीत होगा । लेकिन जब मैं घर पहुँचा और कैसेट प्ले किया तो मैं आश्चर्यचकित हो गया । उसमें तो मेरे द्वारा रचित दोनों गीत थे । दोनों गीत आज भी उतने ही लोकप्रिय हंै ।
बाद में पता चला कि उन्होंने उक्त गीत एक ही दिन और एक ही सिटिंङ में रेडियो नेपाल में रिकॉर्ड किया है । इस तरह औपचारिक रूप में मेरा गीत लेखन शुरु हो गया । मुझे तो लगता है कि अगर नारायण गोपाल के साथ मेरी मुलाकात नहीं होती थी तो मैं शायद ही आज गीतकार के रूप में जाना जाता । जब तक नारायण गोपाल जीवित रहे, तब तक मेरे सारे गीत उन्होंने ही संगीतबद्ध और स्वरबद्ध किया । उनके देहावसान के बाद ही मैंने अन्य गायक–गायिकाआें को मेरी रचना दी । आज मेरे द्वारा रचित ३०० सौ से अधिक गीत विभिन्न गायक–गायिकाओं द्वारा स्वरबद्ध है ।

फांसी होने से बच गया
वि.सं. २०३१–०३२ साल की बात है । ३–४ महीने पहले ही मेरा गीत रिकॉर्ड हुआ था । लोकप्रिय होने के बावजूद भी मेरा गीत आकस्मिक रूप में बन्द हो गया, रेडियो नेपाल में नहीं बज रहा था । मुझे लगा कि हर चीज की एक निश्चित उम्र होती है, शायद मेरे गीत की भी उम्र खतम हो गई । एक दिन एक समारोह में धुस्वाँ सायमी से मेरी मुलाकात हुई । उन्होंने कहा– ‘पण्डित जी, आप जीवित हैं, खुशी मनाइए ।’ मैं असमंजस में पड़ गया । मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या कह रहे हैं । उस समय सायमी जी राजदरबार मातहत रहे जाँचबुझ केन्द्र में कार्यरत थे । बाद में पता चला– मेरे गीत के विरुद्ध एक राजावादी ने दरबार में शिकायत की थी । उक्त शिकायत पत्र में लिखा गया था कि मेरे द्वारा रचित गीत ‘विद्रोह’ का गीत है । मुझे विद्रोही करार देते हुए शिकायत पत्र में यह भी लिखा गया था कि वह विद्रोही सरकारी कर्मचारी है, इसीलिए ऐसे व्यक्ति को सरकारी नौकरी नहीं, मृत्युदण्ड (फांसी) मिलनी चाहिए । ‘आँखा छोपी नरोऊ भनी भन्नुप¥या छ, मुुटुमाथि ढुंगा राखी हास्नुप¥या छ’ यही शब्द को लेकर मेरे ऊपर इस तरह का आरोप लगाया गया था । लेकिन यथार्थ तो यह है कि उक्त गीत मैंने राजनीतिक विद्रोह की भावना से नहीं लिखी थी, अपनी ही पीड़ा को मैंने गीत में लिखा था । मैं सरकारी नौकरी करना नहीं चाहता था, लेकिन करना पड़ रहा था । वकालत करने की चाहत थी, लेकिन नहीं कर पा रहा था । अर्थात् खुद का जीवन अपने लिए पीड़ादायी थी । इसी पीडा को ‘मुटुमाथि ढुंगा राखी हाँस्नुप¥या छ’ कहकर लिख दिया था । लेकिन दरबार के लोगों ने मेरी व्यक्तिगत पीड़ा को राजनीतिक विद्रोह के रूप में अर्थ लगाया ।

शिकायत पत्र दर्ज होने के बाद गीत बन्द हो गया था । राजा वीरेन्द्र की ओर से छानबीन और कारवाही का आदेश जारी हो गया था । गीत और मेरे बारे में जाँचबुझ केन्द्र में बहस चली । बहस सञ्चार मन्त्रालय तक आ गया । मैं सञ्चार मन्त्रालय के ही मातहत रहे सूचना विभाग में डायरेक्टर के रूप में कार्यरत था । इसीलिए प्रश्न उठने लगा कि डायरेक्टर होकर भी इस तरह का गीत लिखते हैं क्या ? उस समय सञ्चार मन्त्रालय के सचिव थे– तीर्थराज तुलाधर, रेडियो नेपाल के डाइरेक्टर में भोग्यप्रसाद शाह थे । तुलाधर, शाह और दरबार तथा सञ्चार क्षेत्र में कार्यरत विशिष्ठ व्यक्तियों की बैठक बुलाई गई । अन्ततः बैठक ने निष्कर्ष निकाल लिया कि गीत के ऊपर प्रतिबन्ध लगाना और कालीप्रसाद रिजाल को फाँसी देना, दोनों कार्य तत्काल के लिए जरूरी नहीं है । उल्लेखित सारी घटना के संबंध में मुझे पता नहीं था, बाद में धुस्वां सायमी जी से ही पता चला । इसतरह मैं सम्भावित मृत्यदण्ड (फाँसी) होने से बच गया ।

पुनः लोकसेवा
मैं लम्बे समय तक सूचना विभाग में नहीं रहना चाहता था । तबदला या पदोन्नति होकर अन्यन्त्र जाना चाहता था । लेकिन दोनों परिस्थिति मेरे अधिकार से बाहर था । इसीलिए मैंने पुनः सह–सचिव पद के लिए लोकसेवा में सहभागी होने का निर्णय किया । सह–सचिव में वही व्यक्ति प्रतिस्पर्धा कर सकते थे, जो द्वितीय श्रेणी (उप–सचिव) में कार्यरत हैं । साल में १ या २ सिटों के लिए भ्याकेन्सी निकलती थी, तब भी मैं सहभागी होकर नाम निकाल दिया ।

सूचना विभाग छोड़ने की चाहत के पीछे उसके अन्दर व्याप्त विकृतियां भी थी । मुझे दो तरफ के दबाव को झेलना पड़ रहा था । एक– सञ्चार मन्त्रालय का दबाव, दूसरा– राजदरबार की ओर से आनेवाला दबाव । विद्रोही स्वभाव के होने के कारण कई असन्तुष्टियां थी । इसीलिए मैं वहां से बाहर आना चाहता था ।
मेरे सूचना विभाग में डायरेक्टर होने से पहले ही समीक्षा, समाज, मातृभूमि जैसे कई पत्र–पत्रिकाआें के ऊपर प्रतिबन्ध लगाया गया था । इस तरह की घटना बार–बार होती थी । लेकिन मैं प्रेस स्वतन्त्रता के पक्ष में था । मेरी मान्यता थी कि प्रेस के ऊपर अनावश्यक लगाम ठीक नहीं है । इस तरह के कई कारण थे, जिसके चलते मैं सूचना विभाग में नहीं रहना चाहता था । इसीलिए मैंने सह–सचिव में प्रतिस्पर्धा करने का निर्णय लिया ।

प्रधानमन्त्री के साथ द्वन्द्व
उस वक्त की एक घटना मेरे लिए अविस्मरणीय है । वि.सं. २०३७ साल आसपास की बात है । पञ्चायत और बहुदल के बीच में जनमत–संग्रह हो चुका था । प्रधानमन्त्री थे– सूर्यबहादुर थापा । जनमत–संग्रह में पञ्चायत को बहुमत मिली । यह सब तो राजनीतिक बात थी । लेकिन मुझे दो प्रकार का जीवन जीना पड़ रहा था । एक– सरकारी नौकर होने के कारण अपने से ऊपरवाले व्यक्तियों के आदेश का पालन करना । दूसरा मेरा साहित्यिक जीवन, जो तत्कालीन शासकीय चरित्र के विरुद्ध में खड़ा हो जाता था । अर्थात् उस वक्त मुझे विरोधाभाषपूर्ण जीवन जीना पड़ा, एक द्वन्द्व हमेशा चलता रहता था ।
तत्कालीन राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान (आज का प्रज्ञा प्रतिष्ठान) की ओर से हर साल ‘गाईजात्रा’ (नेपाल का विशेष सांस्कृतिक पर्व) के अवसर पर कार्यक्रम आयोजन किया जाता था । कार्यक्रम में विभिन्न कलाकारों को इकठ्ठा कर हास्य–व्यंग्यात्मक प्रस्तुति की जाती थी, जो आज भी होता आ रहा है । जनमत संग्रह के बाद आयोजित एक कार्यक्रम में मैंने भी एक व्यंग्यात्मक कविता प्रस्तुत की । उस कविता में तत्कालीन प्रधानमन्त्री, मन्त्री तथा शासन–प्रशासन के क्षेत्र में दिखे गए विकृतियों को उजागर किया गया था । एक सरकारी निकाय में कार्यरत विभागीय प्रमुख होकर भी सरकार के विरुद्ध व्यंग्य लिखने की हिम्मत उस समय किसी के पास नहीं थी, लेकिन मैंने किया । कविता वाचन होने के बाद तत्कालीन प्रधानमन्त्री सूर्यबहादुर थापा आक्रोशित हो गए । कुछ ही दिन के बाद मेरे ऊपर कारवाही प्रक्रिया शुरु हो गई ।
कोई भी स्पष्टीकरण बिना प्रधानमन्त्री के आदेश में मुझे नौकरी से बर्खास्त करने की सूचना मेरे ऑफिस में भेज दी गयी, जो मेरे ऑफिस तक नहीं पहुँची । लेकिन इसकी जानकारी मुझे नहीं थी । त्रिभुवन विश्वविद्यालय के भाइस–चान्सलर थे– जगतमोहन अधिकारी । मर्निङवाक में एकदिन बानेश्वर में उनके साथ मुलाकात हो गई । भेट में उन्होंने कहा– ‘आप की नौकरी जा रही है, प्रधानमन्त्री सूर्यबहादुर के आदेश से पुर्जी (पत्र) निकल चुकी है, जो आप के पास आनेवाला है । उन्होंने यह भी कहा– ‘आप ने तो ऐतिहासिक काम किया, कविता में वास्तविकता थी । लेकिन नौकरी चली गई क्या करें !’ बर्खास्ती संबंधी पत्र आ गया । लेकिन मैंने उसको अस्वीकार किया और अपने पद से इस्तीफा दी । मेरा इस्तीफा पास नहीं हुआ । गाईजात्रा के अवसर पर सरकार के विरुद्ध व्यंग्य करने के कारण पदोन्नति की सम्भावना भी नहीं थी, सूचना विभाग से अन्यन्त्र तबादला होने की सम्भावना भी नहीं थी । क्योंकि मुझे सूचना विभाग में ही रखना है या नहीं ? इस विषय को लेकर तत्कालीन प्रधानमन्त्री और दरबार लगायत अन्य निकायों के बीच विवाद का विषय बन गया था । सञ्चार मन्त्रालय, उस मातहत के अन्य निकाय में कार्यरत पदाधिकारी तथा दरबार के मातहत रहे सञ्चार विभाग मेरे पक्ष में थे । वे लोग मुझे सूचना विभाग में ही रखना चाहते थे । लेकिन प्रधानमन्त्री सूर्यबहादुर थापा जैसे भी हो मुझे सूचना विभाग से निकालना चाहते थे ।
इसी बीच मैंने सह–सचिव में नाम निकाल लिया था । सह–सचिव होना भी मेरे लिए समस्या बन गयी । क्योंकि सूचना विभाग के डायरेक्टर द्वितीय श्रेणी (उप–सचिव) के कर्मचारी होते थे । मेरी पोस्ट (सह–सचिव) उससे एक तह ऊपर वाली थी । तब भी मेरे पक्ष में रहे लोग मुझे सूचना विभाग में ही रखना चाहते थे । वे लोग विभाग में सह–सचिव का पद बना कर मुझे निर्देशक से महा–निर्देशक बनाना चाहते थे । पर प्रधानमन्त्री थापा मेरे विरुद्ध होने के कारण सम्भव नहीं हो पा रहा था ।
व्यक्तिगत रूप में मैं भी सूचना विभाग में नहीं रहना चाहता था । मेरे ही कारण प्रधानमन्त्री और दरबार आदि अन्य निकायों के बीच द्वन्द्व हो रहा था । जिसके चलते मैं हाजिर (कर्मचारी उपस्थिति) नहीं कर पाया । सूचना विभाग में हाजिर करने के लिए वहां मेरी पोस्ट नहीं थी । दरबार के लोग कहते थे कि आप को सूचना विभाग में ही रहना है । प्रधानमन्त्री निकट लोग कहते थे– आप को श्रम तथा समाज कल्याण मन्त्रालय में पोस्टिङ की गई है । मन्त्रालय में हाजिर करने के लिए जाते थे तो जबाव मिलता था– आप को यहां जिम्मेवारी नहीं दी गई है । लम्बे समय तक मुझे ऐसी ही अवस्था का सामना करना पड़ा । भोगेन्द्र रिमाल मुख्य–सचिव थे । एक दिन उन्होंने कहा– ‘हम लोग कर्मचारी हैं, इसतरह कई दिनों तक पेण्डुलम होकर रहना ठीक नहीं है । मैं सञ्चार मन्त्रालय में रहे सचिव को फोन कर देता हूँ, आप जाकर हाजिर कीजिए ।’ उनकी ही सलाह अनुसार मैं गया । एक अलग ही कागज में मेरी हाजिरी ली गई । तब कहीं जाकर मेरी श्रम तथा समाज कल्याण मन्त्रालय में पोस्टिङ की गई ।

रानी ऐश्वर्य के साथ काम
उस समय ‘सामाजिक सेवा राष्ट्रीय समन्वय परिषद्’ नामक एक संस्था थी, उसकी अध्यक्ष थीं– रानी ऐश्वर्य राज्यलक्ष्मी शाह । उक्त परिषद् में अर्थ मन्त्रालय, कानून मन्त्रालय, श्रम तथा समाज कल्याण मन्त्रालय जैसे कुछ मन्त्रालयाें की ओर से कुछ कर्मचारी प्रतिनिधि सदस्य के रूप में जाते थे । उसी क्रम में एक दिन मुझे भी समाज कल्याण मन्त्रालय की ओर से प्रतिनिधि सदस्य के रूप में भेजा गया । परिषद् के संबंध में कुछ भी पता नहीं था । परिषद् के सभी सदस्यों के साथ मेरी जान–पहचान भी नहीं थी । इसीलिए शुरुआती दिनों में आयोजित परिषद् बैठक में मैं चुपचाप रहा । अगर कुछ बोलना होता था तो शुरु में हाथ ऊपर करना पड़ता था, उसके बाद ही बोलने का अवसर मिलता था ।
एक दिन अचानक मेरा भी हाथ उठ गया । अन्य वक्ताओं की तुलना में मैंने कुछ अलग विचार व्यक्त किए आलोचनात्मक टिप्पणी सहित । मेरे कथन का तात्पर्य था– ‘हमारे यहाँ एक सदस्य सचिव जिसको चाहते हैं, उसको कर्मचारी के रूप में नियुक्त कर सकते हैं, कर्मचारी नियुक्ति के लिए कोई भी मापदण्ड नहीं हैं । अगर नया कर्मचारी नियुक्त करना ही है तो सबसे पहले सूचना प्रकाशित होनी चाहिए, उसकी योग्यता की जाँच–पड़ताल होनी चाहिए, लिखित और मौखिक परीक्षा लेनी चाहिए । एक व्यक्ति के विवेक में कर्मचारी चयन करना ठीक नहीं है । हमारे संस्था में तो रानी अध्यक्ष है, इसीलिए यहाँ तो नियम–कानून का पालन और भी जरूरी है । क्योंकि राजा–रानी किसी के अपने नहीं होते, सभी नेपाली नागरिकों के लिए राजा–रानी समान हैं । इसीलिए कानून का पालन आवश्यक है ।’ इस कथन से रानी ऐश्वर्य प्रभावित हो गईं । उसके बाद आयोजित परिषद् बैठक में तो रानी स्वयम् पूछने लगी– श्रम तथा सामाज कल्याण मन्त्रालय की ओर से आनेवाले प्रतिनिधि को कुछ कहना है ? इसतरह मैं रानी ऐश्वर्य की निगाह में आ गया ।

एक दिन परिषद् बैठक में रानी ऐश्वर्य ने एक प्रस्ताव पेश किया । प्रस्ताव था– एनजीओ–आईएनजीओं और विभिन्न गैर–सरकारी संस्था, सामाजिक संघ–संस्था आदि द्वारा संचालित गतिविधि अध्ययन के लिए एक समिति निर्माण किया जाए । सामाजिक संघ–संस्था द्वारा संचालित कार्यक्रम प्रभावकारी है कि नहीं ? भावी दिनों में उसको अधिक प्रभावकारी कैसे बनाया जा सकता है ? उसके लिए किस तरह का नीति–नियम आवश्यक है ? ऐसे ही प्रश्नों पर केन्द्रीत रहकर अध्ययन करने के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाने की बात आई । समिति में शंकरराज पाठक, मैं (कालीप्रसाद रिजाल) और गुरुवरसिंह थापा का नाम प्रस्तावित हुआ । प्रस्ताव पास हुआ । रेडक्रॉस सोसाइटी, क्षयरोग निवारण संस्था, परोपकार संस्था जैसे बहुत सारे स्वदेशी तथा विदेशी संस्थाओं के संबंध में हम लोगों ने अध्ययन किया और समिति द्वारा निर्धारित उद्देश्य अनुसार प्रतिवेदन तैयार कर रानी को दे दिया । प्रतिवेदन में संस्थाओं के नकारात्मक पक्ष में आलोचनात्मक टिप्पणी करते हुए आवश्यक सुझाव भी दी गई थी । तत्कालीन सन्दर्भ में उस प्रतिवेदन को लेकर खूब चर्चा हुई, आलोचना करनेवाले भी थे । बाद में रानी ऐश्वर्य ने कहा कि मैंने ही इस तरह का प्रतिवेदन निर्माण के लिए कहा था । सब चुप हो गए ।

प्रतिवेदन हस्तान्तरण के बाद मैंने रानी से कहा– ‘अब मैं मन्त्रालय वापस होना चाहता हूँ ।’ मुझे लगता है कि रानी मेरी बात से खुश नहीं थी । लेकिन मुझे वहां काम करना असहज महसूस हो रहा था । कारण था– परिषद् में हरदम दरबार के नियमानुसार अनुशासन में रहना पड़ता था । किसी के साथ भी मुलाकात करने की अनुमति नहीं थी । अगर किसी के साथ मुलाकात होती तो कई सवाल पूछे जाते । इसीलिए मैं वहां से विदा होकर मन्त्रालय वापस हो गया । कुछ दिनों के बाद फोन आया । फोन में ही सुनने को मिला– ‘आप ने प्रतिवेदन तो अच्छा बनाए है, अब इसका कार्यान्वयन भी आपको ही करना पड़ेगा, सदस्य सचिव की जिम्मेवारी के साथ आप परिषद् में आ जाइए ।’
मैंने कहा– ‘मै तो मन्त्रालय मातहत का कर्मचारी हूँ, अपने मन से नहीं आ पाउंगा ।’ बाद में मन्त्रालय की ओर से ही मैं काज में परिषद् गया, सदस्य सचिव के रूप में वहां चार साल तक काम किया और अपने द्वारा बनाए गए प्रतिवेदन को कार्यान्वयन किया । चार साल के बाद मैं पुनः मन्त्रालय वापस आ गया । इसी बीच में वि.सं. २०४६ साल का जनआन्दोलन हुआ, देश में प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था शुरु हो गई । नई शासन व्यवस्था में शामिल लोग कुछ परिवर्तन दिखाना चाहते थे । ऐसी ही अवस्था में रानी ऐश्वर्य का साथ देने के अभियोग में मुझे वि.सं. २०४८ साल में बर्खास्त किया गया । अर्थात् मेरी नौकरी चली गई ।

विडम्बना ! उल्लेखित सारी घटना प्रकरण में मेरा कोई भी दोष नहीं था । पूर्ववर्ती सरकार (मन्त्रालय) के निर्णयानुसार ही मैं परिषद में काज में गया था । उस समय सिर्फ मुझे ही नहीं, अन्य कुछ कर्मचारियों को भी इसी तरह नौकरी से निकाल दिया गया था । उनमें से कई मित्रों ने अदालत में मुद्दा दायर किया और उनकी पुनर्बहाली हुई । उन लोगों को सचिव में पदोन्नति भी मिल गई और बहुदलीय शासन व्यवस्था के अनुसार मन्त्रालय भी संचालन किया । लेकिन मैं अदालत नहीं गया । अदालत जाने के लिए मेरा मन नहीं मान रहा था । इसी विषय को लेकर मेरे घरपरिवार में सामान्य विवाद भी हो गया । पारिवारिक सदस्याें का कहना था कि आपको भी अदालत जाना चाहिए और पुनर्बहाली होकर सचिव बनना चाहिए । लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया ।

अगर पारिवारिक सदस्यों का सुझाव मान लिया होता तो मुझे भी सचिव होकर रिटायर्ड होेने का अवसर मिलता । सचिव का पेन्सन होल्डर हो जाता, कर छूट सहित गाडी (पजेरो) की सुविधा मिल जाती । यह सब देखने पर पारिवारिक दृष्टिकोण भी गलत नहीं था । आज मैं सह–सचिव का पेन्सन लेता हूँ, कहीं जाना होता है तो सार्वजनिक गाड़ी में चढ़ना पड़ता है । लेकिन मुझे ज्यादा शिकायत नहीं है । मुझे लगता है कि मैं एक ‘दासता’ से दूसरी ‘दासता’ में फंसने से बच गया । नौकरी छोड़ने के बाद मैंने अपना सम्पूर्ण जीवन, अध्ययन और साहित्य सृजना को समर्पित किया है ।

दास–प्रथा अन्त के लिए पहल
पुरानी पीढ़ी और नेपाल का इतिहास पढ़ने वाली नयी पीढ़ी को भी पता है कि नेपाल में दास–प्रथा किस तरह चल रही थी । इस प्रथा में अमीर लोग गरीब लोगों को कुछ रूपया देकर अपने नियन्त्रण में रखते थे और उनके ऊपर अमानवीय व्यवहार करते थे । अर्थात् अमीर लोग गरीब लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर कुछ रूपया देते थे, बदले में इस तरह का तमसुक (शर्त पत्र) बनाते थे कि गरीब लोग जीवन भर अमीर लोगों के लिए गुलामी करें । सिर्फ पैसा लेनेवाले व्यक्ति ही नहीं, उनके सन्तान दर सन्तान को भी अमीर लोगों के घर में जा कर बिना पारिश्रमिक काम करना पड़ता था, अमीर लोगाें के खेत में काम करना पड़ता था । राणा प्रधानमन्त्री चन्द्र शमशेर ने ही अपने समय में घोषणा की थी कि अब ‘दास–प्रथा’ नेपाल में नहीं रहेगी । लेकिन जब मैं भूमि–सुधार अधिकारी होकर पाल्पा पहुँचा तो देखने को मिला कि वहां के कई गांव में इस तरह का दास–प्रथा कायम ही है, जो गैर–कानून भी था । उस समय मैंने कम से कम ३–४ सौ तमसुक फाड़ दिया, जो गरीब लोगों को गुलाम बनाने के लिए बनाया गया था । इस प्रकार लाखों रुपयों की ऋण से हजारों बधुवा मजदूर मुक्त हो गए । मेरे इस काम के कारण कुछ लोग तो आँसु बहा रहे थे, कई लोग मेरे ऊपर आक्रोशित बन गए थे । लेकिन वह मेरा कर्तव्य भी था । इसतरह कर्तव्य का पालन करते वक्त कई लोग मुझसे नाराज हो गए होंगे, उसका कोई भी लेखाजोखा नहीं है । लेकिन मैंने जानबूझ कर जीवन में कोई भी गलती नहीं की है ।

मेरा अधूरा सपना
मैं नौकरी नहीं करना चाहता था, लेकिन करना पड़ा । वकील बनना चाहता था, नहीं बन पाया । इसी तरह मेरी दूसरी इच्छा थी– संगीत सीखकर गायक बनने की, लेकिन यह भी सम्भव नहीं हो पाया । बनारस में रहते वक्त थोड़ा अवसर तो मिला था । बीएचयु में एक संगीत विद्यालय था, जहां शाम के समय में कक्षा होती थी, ओंकारनाथ ठाकुर प्रिन्सिपल थे । लेकिन संगीत सीखने वालाें में युवतियां ज्यादा होती थीं । मैंने अपने मित्रों से कहा– ‘चलो संगीत भी सीखते हैं, कभी तो काम आएगी ।’ वे लोग नहीं मानते थे और मुझे अकेले ही जाने के लिए कहते थे । लेकिन अकेले जाने के लिए मेरे अन्दर हिम्मत नहीं थी । इसतरह मैंने संगीत सिखने का अवसर भी गंवा दिया, गायक बनने की चाहत पूरी नहीं हो पाई ।

नेपाल में परिवर्तन नहीं आया है !
आज भी मेरा लेखन–कार्य जारी है । गीत, कविता और व्यंग्य साहित्य लिखता रहता हूँ । मुझे लगता है कि अन्तर आत्मा से सत्य बोलना और व्यंग्य–साहित्य सृजन करना एक बड़ी चुनौती है । क्योंकि जो व्यक्ति व्यंग्य साहित्य लिखते हैं, जो सच बोलते हैं, उन लोगों के लिए करीबी मित्र प्रायः असम्भव होते है । शासक लोग तो दुश्मन ही बन जाते हैं । यह मेरा अनुभव है । मैं सरकारी कर्मचारी, लेकिन मेरे लेखन कार्य के कारण ही मैं कभी भी सत्ताधारियों के नजदीक नहीं हो पाया, वे लोग मुझे हरदम दुश्मन के रूप में ही देखते थे । पञ्चायतकाल में हो या प्रजातान्त्रिक कालखण्ड में, इसका अनुभव मैंने किया है । मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि नेपाली कांग्रेस से जुड़ी हुई थी, मेरे सबसे बड़े भाई चिरञ्जिवी रिजाल नेपाली कांग्रेस के कार्यकर्ता थे । इसीलिए पूरे पञ्चायत काल में सत्ताधारियों ने मुझे कांग्रेसी कार्यकर्ता के रूप में देखा और ‘अराष्ट्रिय’ तत्व के रूप में वर्णन किया । बाद में प्रजातन्त्र आया । हम लोग जिसको कांग्रेस के रूप में जानते थे, उन लोगों ने ही रानी ऐश्वर्य के साथ काम करने के अभियोग में मुझे नौकरी से निकाल दिया । आज मैं व्यंग्य लिखता हूं । मेरा व्यंग्य सत्ता, प्रशासन तथा सामाजिक विकृति के विरुद्ध केन्द्रित होता है, जो सत्ता में हैं, उन लोगों के लिए घांव में नमक बन जाता है ।

देश में कई राजनीतिक क्रान्ति सम्पन्न हो गए । शासन व्यवस्था में परिवर्तन आ गया । लेकिन शासन–सत्ता में रहनेवालों के चरित्र और चिन्तन में आज भी परिवर्तन नहीं आया है । राजाओं के शासनकाल में मन्त्री और सचिव बननेवालों में जो मनोविज्ञान था, आज प्रजातन्त्र और गणतन्त्र में मन्त्री और सचिव बननेवालों का चिन्तन वैसा ही है । आलोचना सुनने की हिम्मत किसी में भी नहीं है । सत्ता में पहुँचते ही वे लोग खुद को मालिक समझते हैं । ‘मैं जो कुछ कहता हूँ और करता हूँ, वह कानून बन जाता है’ इस तरह की सोच और व्यवहार प्रकट करते हैं । कहा जाता है कि बहुत परिवर्तन हुए है, लेकिन आम जनता के जीवनस्तर में परिवर्तन नहीं आया है । हां, जो सत्ता में पहुँच पाते हैं, उन लोगों के व्यक्तिगत जीवन में कुछ परिवर्तन आया है । लेकिन नेता और कर्मचारीतन्त्र के भीतर आज भी चाकड़ी प्रथा कायम है, हर छोटे व्यक्ति को अपने से बड़े व्यक्ति की चाकड़ी करनी पड़ती है । सत्ता में रहनेवाले लोग सिर्फ उसको ही अपना आदमी समझते हैं, जो उसके लिए चाकड़ी करत हैं । व्यववस्था और सत्ता में व्यक्तियों की अदला–बदली होना परिवर्तन नहीं है ।

विभेद अस्वीकार्य
मैं साधारण व्यक्ति होकर जीना चाहता हूँ । किसी भी प्रकार का विभेद मुझे स्वीकार्य नहीं है । अगर कोई व्यक्ति मुझे ‘बुद्धिजीवी’ कहकर सम्बोधन करता हैं तो मुझे असहज महसूस होता है । मैं मानता हूं– हर व्यक्ति अपने क्षेत्र में ‘बुद्धिजीवी’ ही होता है । क्या आप को लगता है कि कोई व्यक्ति बुद्धिहीन होता है ? भानुभक्त को शिक्षा देने वाले श्रमजीवी ! घांस काटनेवाले से शिक्षा लेकर साहित्य रचना करनेवाले बुद्धिजीवी ! कॉलेज से ‘डिग्री’ का सर्टिफिकेट लेनेवाले बुद्धिजीवी, और मजदूरी कर अपनी क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करनेवाले बुद्धिहीन ? ऐसा नहीं हो सकता । कोई भी व्यक्ति अधिक बुद्धिजीवी नहीं होता है । हमारी गलत सोच और मानसिकता के कारण ही कोई व्यक्ति ‘बुद्धिजीव’ कहलाते हैं । श्रम सभी को करना चाहिए, श्रम का सम्मान होना चाहिए । हर व्यक्ति के अन्दर कोई न कोई प्रतिभा होती है, समय–परिस्थिति के कारण वह दब कर रह जाती है । अगर अवसर मिल जाता है तो वह बाहर आती है, इसीलिए अवसर प्राप्त करनेवाले बुद्धिजीवी और अवसरहीन व्यक्ति ‘बुद्धिहीन’ नहीं होते हैं ।

मेरी लेखन शैली साधारण है । मैं भी साधारण व्यक्ति होकर ही लिखना चाहता हूँ । समसामयिक घटना और असन्तुष्टि को व्यक्त करता हूं । मैं चाहता हूं कि मेरे साहित्य को कोई भी समझ जाए । मैं मानता हूं कि मेरा लेखन ‘बौद्धिक’ कहलानेवाले वर्ग के लिए नहीं, साधारण व्यक्ति के लिए हो सके । लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा रचित ‘मुनामदन’ विशिष्ट और चर्चित साहित्य है । उसको समझने के लिए क्या कोई विशेष बौद्धिकता की आवश्यकता है ? नहीं है । जो लेखनी साधारण व्यक्ति की समझ में नहीं आती हैं वो लेखनी साहित्य नहीं हो सकती । साहित्य में आम लोगों की मन की भावना होनी चाहिए, जो सहज ही समझ में आ सके ।

जातीयता स्वीकार्य नहीं है
मैं सुबह ५–६ बजे उठ जाता हूँ । कमर में समस्या होने के कारण सामान्य फिजियो थेरापी करता हूं । योग संबंधी कुछ आसन और मर्निङवाक प्रायः नियमित जाता हूँ । अध्यात्मिक आस्था है, लेकिन पूजापाठ और मन्दिरों में कभी–कभार ही शामिल होता हूँ । लेकिन मेरे लिए जातीय और धार्मिक विभेद स्वीकार्य नहीं है । भजन करना, टीका लगाना, पूजापाठ करना, होम करना और मन्त्रों का जाप करना ही आध्यात्म नहीं है । धर्म एक संस्कृति और संस्कार भी है, जो हर व्यक्ति को सही राह पर ले जाता है । भगवान है या नहीं ? बहस के लिए यह अलग विषय है । लेकिन जो व्यक्ति भगवान है, इस बात की कल्पना करते हैं तो वह महान् है । धार्मिक कथाओं में भी कहा जाता है कि भगवान है, परलोक है, धर्म है और पाप भी है । इसी मान्यता के कारण लोग अपने को संयमित रखते हैं । हरधर्म में इस तरह की कथा है, जो व्यक्ति को आपराधिक कर्म करने से हतोत्साहित करता है । अगर इस तरह की धार्मिक कथा नहीं होती थी तो समाज में और भी ज्यादा विकृतियां दिखाई देती थी । इसीलिए धर्म सही रास्ता दिखाने वाली संस्कृति है, लेकिन मैं धार्मिक विभेद नहीं मानता हूँ । हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार धार्मिक जीवन जीने की स्वतन्त्रता है ।

मानव जीवन एक अवसर
मानव जीवन एक अवसर है । हमारा जन्म अपनी इच्छा के अनुसार नहीं हुआ है । लेकिन जन्म तो हो चुका है, इसीलिए हमारा जन्म किसी के लिए भी अभिशाप नहीं बनना चाहिए । सत्कर्म से अपनी पहचान बनाने के लिए ही एक अवसर प्राप्त है । समाज, देश एवं मनुष्य जाति के लिए आप को अपनी जगह से सकारात्मक काम करने का अवसर मिला है । हमारा जीवन इसी के लिए समर्पित होना चाहिए ।
सिर्फ भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति और सुविधाओं से ही सुख, शान्ति और सन्तुष्टियां नहीं मिल सकती । वास्तविक सुख तो आत्मिक सुख है । आत्मिक सुख उस वक्त ही प्राप्त हो सकता है, जब आप अपनी अन्तरआत्मा से सन्तुष्ट होते हैं । बाहर से प्राप्त होनेवाला वस्तु ही आप को सन्तुष्ट बनाता है, यह बात सही नहीं है । अपने व्यक्तिगत जीवन से लेकर पारिवारिक जीवन, समाज, देश एवं मानव जाति के लिए कुछ सकारात्मक काम करते हैं तो हम लोगों को आत्मसन्तुष्टि का अनुभव होता है, वही आत्मसन्तुष्टि आप के जीवन के लिए सुख और शान्ति का माध्यम बन सकता है । महल में रहने से, कार में सवार होने से और मनपसन्द मिष्ठान्न भोजन से ही आत्मसन्तुष्टि प्राप्त होती है, अगर आप की सोच ऐसी है तो वह गलत है ।

प्रस्तुतिः लिलानाथ गौतम

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