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31 अगस्त से भी उत्तम 1 सितंबर, मंगलवार को अनंत चतुर्दशी व्रत

 

आचार्य राधाकान्त शास्त्री । इस वर्ष अनंत व्रत में पंचांगों के मत भेद है।
विश्व पंचांग एवं हृषिकेश पंचांग के अनुसार 31 अगस्त सोमवार को ही मध्यान्ह में अनंत चतुर्दशी व्रत करना उत्तम होगा। क्योँ की अनंत चतुर्दशी व्रत मध्यान्ह व्यापिनी व्रत है इसे मध्यान्ह में ही करना चाहिए और 31 को ही मध्यान्ह में चतुर्दशी मिल रही है।
किन्तु निर्णय सिंधु के अनुसार 1 सितंबर मंगलवार को प्रातः 8:45 तक चतुर्दशी और उसके बाद पूर्णिमा का मिलन होने से इस दिन अगर प्रातः 5 बजे से 8:40 तक अगर व्रत कर लिया जाय या व्रत आरम्भ कर 11:45 तक
कर लिया जाय तो सर्वोत्तम होगा।
अतः 1 सितंबर को ही प्रातः में ही व्रत पूजन कर लेना सर्व श्रेष्ठ होगा।
पूजा मुहूर्त :-
5:40 से 8:40 तक इस
अवधि : 3 घंटे में कभी भी पूजन आरम्भ हो जाने पर अगले 3 घण्टे तक भी पूजन सम्पन्न किया जा सकता है।

अनंतचतुर्दशी व्रत का हमारे धर्म में बड़ा महत्व है, इसे अनंत चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा होती है। भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस दिन अनंत भगवान (भगवान विष्णु) की पूजा के पश्चात बाजू पर अनंत सूत्र बांधा जाता है। ये कपास या रेशम से बने होते हैं और इनमें चौदह गाँठें होती हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन भी किया जाता है इसलिए इस पर्व का महत्व और भी बढ़ जाता है ।

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अनंत चतुर्दशी का शास्त्रोक्त नियम

1.  यह व्रत भाद्रपद मासमें शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। इसके लिए चतुर्दशी तिथि सूर्य उदय के पश्चात दो मुहूर्त में व्याप्त होनी चाहिए।
2.  यदि चतुर्दशी तिथि सूर्य उदय के बाद दो मुहूर्त 8 बजे से पहले ही समाप्त हो जाए, तो अनंत चतुर्दशी पिछले दिन मनाये जाने का विधान है। इस व्रत की पूजा और मुख्य कर्मकाल दिन के प्रथम भाग में करना शुभ माने जाते हैं। यदि प्रथम भाग में पूजा करने से चूक जाते हैं, तो मध्याह्न के शुरुआती चरण में करना चाहिए। मध्याह्न का शुरुआती चरण दिन के सप्तम से नवम मुहूर्त तक होता है। अतः 31 अगस्त से उत्तम 1 सितंबर वाला अनंत चतुर्दशी व्रत अधिक उत्तम होगा।

अनंत चतुर्दशी व्रत और पूजा विधि

आराकाशा के अग्नि पुराण के अध्ययन ग्रंथों में अनंत चतुर्दशी व्रत के महत्व का वर्णन मिलता है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा करने का विधान है। यह पूजा दोपहर के समय की जाती है। इस व्रत की पूजन विधि इस प्रकार है-
1.  इस दिन प्रातःकाल स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें और पूजा स्थल पर कलश स्थापना करें।
2.  कलश पर अष्टदल कमल की तरह बने बर्तन में कुश से निर्मित अनंत की स्थापना करें या आप चाहें तो भगवान विष्णु की तस्वीर भी लगा सकते हैं।
3.  इसके बाद एक धागे को कुमकुम, केसर और हल्दी से रंगकर अनंत सूत्र तैयार करें, इसमें चौदह गांठें लगी होनी चाहिए। इसे भगवान विष्णु की तस्वीर के सामने रखें।
4.  अब भगवान विष्णु और अनंत सूत्र की षोडशोपचार विधि से पूजा शुरू करें और नीचे दिए गए मंत्र का जप करें। पूजन के बाद अनंत सूत्र को बाजू में बांध लें।
अनंत संसार महासुमद्रे मग्रं समभ्युद्धर वासुदेव।
अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्रानंतसूत्राय नमो नमस्ते।।
5.  पुरुष अनंत सूत्र को दांये हाथ में और महिलाएं बांये हाथ में बांधे। इसके बाद ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए और सपरिवार प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।
आराकाशा के अध्ययन ग्रंथों के अनुसार महाभारत काल से अनंत चतुर्दशी व्रत की शुरुआत हुई। यह भगवान विष्णु का दिन माना जाता है। अनंत भगवान ने सृष्टि के आरंभ में चौदह लोकों तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पाताल, भू, भुवः, स्वः, जन, तप, सत्य, मह की रचना की थी। इन लोकों का पालन और रक्षा करने के लिए वह स्वयं भी चौदह रूपों में प्रकट हुए थे, जिससे वे अनंत प्रतीत होने लगे। इसलिए अनंत चतुर्दशी का व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और अनंत फल देने वाला माना गया है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ यदि कोई व्यक्ति श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करता है, तो उसकी समस्त मनोकामना पूर्ण होती है। धन-धान्य, सुख-संपदा और संतान आदि की कामना से यह व्रत किया जाता है।

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अनंत चतुर्दशी व्रत कथा :-
महाभारत की कथा के अनुसार कौरवों ने छल से जुए में पांडवों को हरा दिया था। इसके बाद पांडवों को अपना राजपाट त्याग कर वनवास जाना पड़ा। इस दौरान पांडवों ने बहुत कष्ट उठाए। एक दिन भगवान श्री कृष्ण पांडवों से मिलने वन पधारे। भगवान श्री कृष्ण को देखकर युधिष्ठिर ने कहा कि, हे मधुसूदन हमें इस पीड़ा से निकलने का और दोबारा राजपाट प्राप्त करने का उपाय बताएं। युधिष्ठिर की बात सुनकर भगवान ने कहा आप सभी भाई पत्नी समेत भाद्र शुक्ल चतुर्दशी का व्रत रखें और अनंत भगवान की पूजा करें।
इस पर युधिष्ठिर ने पूछा कि, अनंत भगवान कौन हैं? इनके बारे में हमें बताएं। इसके उत्तर में श्री कृष्ण ने कहा कि यह भगवान विष्णु के ही रूप हैं। चतुर्मास में भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर अनंत शयन में रहते हैं। अनंत भगवान ने ही वामन अवतार में दो पग में ही तीनों लोकों को नाप लिया था। इनके ना तो आदि का पता है न अंत का इसलिए भी यह अनंत कहलाते हैं अत: इनके पूजन से आपके सभी कष्ट समाप्त हो जाएंगे। इसके बाद युधिष्ठिर ने परिवार सहित यह व्रत किया और पुन: उन्हें हस्तिनापुर का राज-पाट मिला।
शुभम बिहार यज्ञ ज्योतिष आश्रम के ओर से आप आप सबको अनंत चतुर्दशी की बहुत बहुत शुभकामनाएं, भगवान विष्णु के कृपा आशीर्वाद से सबके जीवन में सुख और समृद्धि आए।
सबका राज्य वैभव प्राप्त हो.. आचार्य राधाकान्त शास्त्री,

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आचार्य राधाकान्त शास्त्री,ब्रह्म वाणी यज्ञ ज्योतिष आश्रम कालीबाग बेतिया, संपर्क – 9934428775

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