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रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजाने में मशगूल था : श्वेता दीप्ति

 

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

हिमालिनी  अंक अगस्त 2020। सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का जीवन मंगलमय बनें और कोई भी दुःख का भागी न बने । हे भगवन हमें ऐसा वर दो ! बस इस मंत्र के जाप के साथ हमें ईश्वर का ही सहारा है । आज के समय में देश और देश के प्रतिनिधि की जो हालत है उससे तो बस लगता है कि इस मंत्र का जाप करने से ही शायद नेपाल की जनता का कल्याण हो जाए । वैसे भी कभी कहीं पढ़ा था कि सती के शाप से शापित यह देश बाबा पशुपतिनाथ की कृपा से ही चल रहा है । जिसे कभी–कभी मानने का भी दिल कर जाता है । क्योंकि आपदाओं को झेलकर भी हम साँसें लेते ही हैं, चाहे उन साँसों पर कितना ही बोझ क्यों ना हो ।

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सम्पूर्ण विश्व में कोविड का कहर बढ़ रहा है, जिसका असर नेपाल पर भी दिखने लगा है । डॉक्टर खुल कर बोल रहे हैं कि वो आने वाले समय में इस महामारी से निबटने में असक्षम साबित होंगे । डॉक्टर, नर्स, प्रहरी, सुरक्षा कर्मचारी सभी बड़ी तादाद में संक्रमित हो रहे हैं क्योंकि वो सुविधा से वंचित हैं । परन्तु सरकार देश को इस संकट से उबारने के लिए सिर्फ लॉकडाउन का सहारा ले रही है । वैसे भी सरकार इस मसले पर असफल ही रही है । अगर इस बीच कुछ हो रहा है तो वह है, इस महामारी के नाम पर किसी भी हाल में अपने–अपने बैंक अकाउंट को भरने की कवायद । चाहे वह दवा खरीदने के नाम पर हो या अस्पताल की व्यवस्था के नाम पर हो या अपने ही नागरिकों को विदेशों से लाने के लिए अनुमति और टिकट के नाम पर हो । आम जनता मर रही है पर सरकारी तंत्र पूरी ईमानदारी के साथ अपनी स्थिति मजबूत करने में लगे हुए हैं ।

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जब पूरा विश्व इस महामारी से निबटने के लिए वैक्सिन बनाने और जीवन बचाने के लिए प्रयासरत है तभी हमारी सरकार कुर्सी बचाने की कोशिश में परेशान थी, रोज की बैठक, रूठना–मनाना और मुँह छुपाना । वैसे फिलहाल लगता है कि कुर्सी बच गई है, परन्तु शक्ति बटवारे के इस खेल में देश को क्या–क्या झेलना बाकी है वो तो आने वाला समय बताएगा । वर्तमान में तो हम वर्चुअल मीटिंग और सहायता के वादे के सहारे इस महामारी से बचने का इंतजार कर रहे हैं । सहायता भी ऐसी जिसके लिए हमें एक के चार कीमत चुकाने पड़ें हैं और आगे भी चुकाने पड़े गें अगर जिन्दा रहना है तो । आइए ! हम भी यह उम्मीद करें कि आने वाले दिनों में हमारी साँसें भी बची रहेंगी । इतना ही नहीं महामारी के साथ ही प्राकृतिक आपदा रोज साँसों को छीन रही है । सिन्धुपालचौक की हृदयविदारक घटना सररकार की अक्षमता का उदाहरण है । जान बचाने की गुहार भी सरकार के कानों तक नहीं पहुँच पाई जिसकी कीमत गाँववालों ने अपनी जान देकर चुकाई । कहाँ हैं हमारे प्रतिनिधि ? आज के दौर में हम सिर्फ मौत का आँकड़ा गिन रहे हैं और जेहन में यह वाक्य गूँज रहा है—रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजाने में मशगूल था । (सम्पादकीय्)

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